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कवि की नज़र से बच सका हो, कौन सा वो मर्म है

उद्घोषणा पढ़िये 'समस्या - पूर्ति' वाले मंच की।
हरिगीतिका में छन्द रच कर, भेजिये अविलम्ब ही।।

'अनुरोध' - 'उत्सव' औ 'कसौटी', शब्द तीन दिये गये।
आह्वान है सब से, करें, अभि-नव प्रयोग नये नये।१।


बीसों विषय हैं अनछुए, निज - रुचि मुताबिक छांटिए।
अर्जित तजुर्बा-जानकारी, साथ सब के बाँटिए।।

रचते समय हो मूड जैसा, रस वही ले लीजिये।
गर हो मुनासिब, आप छंदों - को अलंकृत कीजिये।२।


कविधर्म रचनाधर्म, कवि का - कर्म, रचनाकर्म है।
कवि की नज़र से बच सका हो, कौन सा वो मर्म है।।

हो वक़्त कोई भी, सदा ही, नब्ज, कवि-कर में रही।
संसार को जो दे दिशा, कवि - सत्य में तो है वही।३।

[हरिगीतिका छन्द]

समस्या पूर्ति मंच -पाँचवी समस्यापूर्ति - हरिगीतिका छन्द - घोषणा

राहुल द्रविड़ द ग्रेट क्रिकेटर

राहुल द्रविड़ का नाम ले कर, आइये बातें करें|
हर दम कि जिन के चेहरे से, फूल खुशियों के झरें||
वो टीम के अन्दर रहें, या - फिर, जुदा हों टीम से|
हमने सुने अब तक न उन से, शब्द कड़वे नीम से||

इस मीडिया ने जब कि सब कुछ, जाँच औ परखा लिया|
'दी वाल' को दीवाल जैसा, नाम तब ही तो दिया||
इस ओर हर बोलर द्रविड़ को, देख कर डरता रहा|
तो उस तरफ बल्ला द्रविड़ का, स्कोर बुक भरता  रहा||

यह ज़िंदगी है दोस्त,कब ये, एक जैसी रह सकी|
राहुल द्रविड़ की ज़िंदगी में - भी, समय था अनलकी||
जब वक़्त रूठा हो, न कोई - बात बन पाए कभी|
आलोचना के वश भ्रमित हो, बोलने लगते सभी||

इक दौर था जब द्रविड़ के बिन, टीम चलती थी नहीं|
इक दौर था जब द्रविड़ के बिन, दाल गलती थी नहीं||
इक दौर फिर आया अचानक, द्रविड़ अपना खो गया|
हिन्दोसतां की टीम से ही, नाम गायब हो गया||

पर स्वाभिमानी आदमी कब,  भाव देता वक़्त को|
'कर्मेष्ठ', कर्मों से हिला दे, इंद्र के भी तख़्त को|
दिन रात मेहनत की, न परवा की, ज़रा भी 'निंद' की|
कुछ वक़्त बीता था, कि राहुल, शान था फिर हिंद की||

इस हाल के इंग्लेंड दौरे - के नतीज़े देखिये|    
उस के मुताबिक़ फिर द्रविड़ की, कामयाबी लेखिये||
  'दी वाल' तो दीवाल है भई, क्या कहें उस के लिए|
हम तो कहेंगे बस यही, जब - तक जिए, 'वट' से जिए|| 



[छन्द - हरिगीतिका]

श्री गणेश वंदना

SHRI GANESH

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वन्‍दहुँ विनायक, विधि-विधायक, ऋद्धि-सिद्धि प्रदायकम्।
गजकर्ण, लम्बोदर, गजानन, वक्रतुण्ड, सुनायकम्।।
श्री एकदन्त, विकट, उमासुत, भालचन्द्र भजामिहम।
विघ्नेश, सुख-लाभेश, गणपति, श्री गणेश नमामिहम ।।

नवीन सी. चतुर्वेदी

[इस हरिगीतिका छंद को स्वर दिया है भाई श्री राजेन्द्र स्वर्णकार जी ने]

Youtube Link:- https://www.youtube.com/watch?v=MVeJargL3eI

हरिगीतिका छन्द विधान

हरिगीतिका छन्द विधान 

सोलह गिनें मात्रा, रुकें फिर, सांस लेने के लिए|
फिर बाद उस के आप मात्रा - भार बारह लीजिए||

चरणान्त में लघु-गुरु, तुकान्तक, चार पंक्ति विधान है|
हरिगीतिका वह छन्द है जो, महफ़िलों की शान है||




उदाहरण मात्रा गणना सहित  


सोलह गिनें मात्रा, रुकें फिर, 
२११ १२ २२ १२ ११ = १६ मात्रा, यति 

सांस लेने के लिए|
२१ २२ २ १२ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु 


फिर बाद उस के आप मात्रा - 
 ११ २१ ११ २ २१ २२ = १६ मात्रा, यति

भार बारह लीजिए||
२१ २११ २१२ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु


चरणान्त में लघु-गुरु, तुकान्तक, 
११२१ २ ११ ११ १२११ = १६ मात्रा, यति 
 
चार पंक्ति विधान है|
 २१ २१ १२१ २ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु

हरिगीतिका वह छन्द है जो, 
११२१२ ११ २१ २ २ = १६ मात्रा, यति 
 
महफ़िलों की शान है||
 १११२ २ २१ २ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु


हरिगीतिका छंद १६+१२=२८ मात्रा वाला छंद होता है| अंत में लघु गुरु अनिवार्य है| इस छंद का अलिखित नियम यह है कि इस की धुन -

ला ला ल ला 
ला ला ल ला ला 
ला ल ला 
ला ला ल ला 

के अनुरूप चलती है| यहाँ धुन वाले ला का अर्थ गुरु अक्षर न समझ कर २ मात्रा भार समझना चाहिए|

ठीक इसी तरह का एक और छंद है - उसे सार या ललित छंद के नाम से जाना जाता है| इस छंद में भी १६+१२=२८ मात्रा होती हैं| अंत में गुरु गुरु आते हैं| और इस सार / ललित छंद की धुन होती है - 

ला ला ला ला 
ला ला ला ला 
ला ला ला ला 
ला ला

यहाँ भी धुन वाले ला का अभिप्राय गुरु वर्ण से न हो कर २ मात्रा भार से है|

हरिगीतिका को कभी कभी कुछ व्यक्ति गीतिका समझने की भूल कर बैठते हैं| जब कि वह एक अलग ही छंद है| गीतिका में १४+१२=१६ मात्रा होती हैं| अंत में लघु गुरु| इस छंद की धुन होती है -

ला ल ला ला 
ला ल ला ला 
ला ल ला ला
ला ल ला 

यहाँ भी धुन वाले ला का अभिप्राय गुरु अक्षर न हो कर २ मात्रा भार है| गीतिका छंद का उदाहरण - "हे प्रभो आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिये"|

सरस्वती वन्दना


सरस्वती वन्दना


पद्मासनासीना, प्रवीणा, मातु, वीणा-वादिनी।
स्वर-शब्द-लय-सरगम-समेकित, शुद्ध-शास्वत-रागिनी॥
 
सब के हृदय सन्तप्त हैं माँ! निज-कृपा बरसाइये।
भटके हुए संसार को माँ! रासता दिखलाइये॥
 

यति-गति समो कर ज़िन्दगी में, हम सफल जीवन जिएँ।
स्वच्छन्द-सरिता में उतर कर, प्रेम का अमृत पिएँ॥
व्यवहार में भी व्याकरण सम, शुद्ध-अनुशासन रहें।
सुन कर जिन्हें जग झूम जाए, हम वही बातें कहें॥ 
 

इक और छोटी सी अरज है, शान्ति हो हर ठौर में।
परिवार के सँग हम खुशी से, जी सकें इस दौर में॥  
कह दीजिये अपनी बहन से, रह्म हम पर भी करें।
हे शारदे! वर दीजियेगा, हम सरसता को वरें॥


नवीन सी. चतुर्वेदी

छन्द हरिगीतिका




YouTube link :- Saraswati vandana - https://m.youtube.com/watch?v=hA3leJgE4Do

नवरात्रि का त्यौहार, मानव मात्र का त्यौहार है

मस्ती भरे आबाल बच्चे, नाचते अरु झूमते।
पावस अनंतर तरु सघन, जैसे धरा को चूमते।।

हर ओर सुख समृद्धि के ही, दृश्य दिखते हैं घने।
जैसे कि हलधर, देख अपनी - फसल, खुशियों से तने।१।


कर्मठ मनुज, करते दिखें, बस - कर्म की आराधना।
वाणी-हृदय- व्यवहार से, बस - शक्ति की ही साधना।।

जिसने इसे अपना लिया, उस - का सफ़ीना पार है।
नवरात्रि का त्यौहार, मानव - मात्र का त्यौहार है।२। 

हरिगीतिका छंद