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SP2/2/11 मधुमय जीवन का यही; सत्य, सार-संक्षेप - शेषधर तिवारी


नमस्कार

बी एस एन एल वालों की नींद अब तो खुल जानी चाहिये, नहीं तो फिर दोष न दें अगर भाई धर्मेन्द्र कुमार सज्जन किसी गुनाहगार को अगर दौड़ा-दौड़ा कर मारें तो............ हाँ भाई पिछली पोस्ट की टिप्पणी में चेतावनी दी है उन्होंने। हिंदुस्तान में इण्टरनेट आज भी बड़ी समस्या है, ख़ास कर नॉन-मेट्रो सिटीस में। आज जब की विकास सीधा-सीधा इण्टरनेट से जुड़ा है तो हमारे नीति-नियन्ताओं को अपनी कुम्भकर्णी नींद से जागना चाहिये।

पहले समस्या-पूर्ति आयोजन से ही हमारे साथ जो साथी जुड़े हुये हैं उन में भाई शेषधर तिवारी जी भी शामिल हैं। इलाहाबाद में रहते हैं, thatsme.in चलाते हैं और आजकल फेसबुक से उकताये जैसे लग रहे हैं। शेष धर जी उन रचनाधर्मियों में से हैं जिन्हों ने उस उम्र में साहित्यिक साधना आरम्भ की जब आदमी नाती-पोतों को स्कूल बस तक छोड़ने की ड्यूटी निभाने वाला हो जाता है। जिस तरह सौरभ जी से मञ्च ने चिन्तन-परक दोहों के लिये निवेदन किया था, तिवारी जी से कुछ पारिवारिक दृश्य उपस्थित करते दोहों की अपेक्षा की और तिवारी जी ने हमारी प्रार्थना का सम्मान  रख लिया। आज की पोस्ट में पढ़ते हैं भाई शेष धर जी के दोहे :-

उनकी आँखों में पढ़ा, स्नेह-सिक्त सन्देश
आश्वासन पाकर मिटे, मन के  सारे क्लेश

मधुमय जीवन का यही; सत्य, सार-संक्षेप
आती है मधुमास में, नव-सुगन्ध की खेप

बेटे को देखे बिना, लेती माँ पहचान
माँ की आँखों को मिला, दिव्य-दृष्टि का दान

विधि ने पुस्तक में लिखे जीवन के आयाम
कवियों के परिशिष्ट में है अपना भी नाम

सम्मत साक्षी के बिना मिलता किसको न्याय
दूषित मन की साधना, निष्फल होती जाय
 
मछली चारा जानि के, काँटा निगलत जात
मछुआरे को दिख रहे; पैसा, मच्छी-भात

सात जनम के साथ पर, करता हूँ विश्वास
अपना है यह सातवाँ, आगे तुलसीदास

नाम बड़ों का हो गया, करके छोटा काम
हनुमत को देते नहीं क्यूँ गिरिधर सा नाम

कर देता यदि वह फलित, हर माँ का आसीस
फिर पत्थर के सामने, कौन झुकाता सीस

हम सब ने मिल कर किया, कुदरत से खिलवाड़
फल उसका है सामने, सर पर गिरा पहाड़

मरुथल में फैले पड़े, रेता के अम्बार
मेरे जैसों का बसा, क्या अद्भुत संसार
 
बिटिया आयी मायके, बोले शुभ शुभ बोल
माँ की आँखें पारखी, मन को लीन्हा तोल

धर अधरन पर आँगुरी, बूझी मन की प्यास
गीली अँखियन में दिखीं, कुपित ननदिया-सास

बिटिया को हिय से लगा अँखियाँ लीन्हीं मूँद
मन की पीड़ा बह चली, बन आँसू की बूँद

अन्तिम तीन दोहों ने कलेज़ा चीर के रख दिया। बहुत अच्छी तरह से माँ-बिटिया के बीच के कन्सर्न्स को चित्रित किया है आप ने। विविध रंगों से सजे इन दोहों पर दिल खोल कर दाद दीजिएगा। अब हमारे पास तीन [दिगम्बर नासवा भाई और शरद तैलंग जी व् धर्मेन्द्र कुमार सज्जन भाई की] पोस्ट्स बाकी हैं। साथियों से निवेदन है कि अपने दोहे एक-दो दिन में भेजने की कृपा करें, आयोजन अब समापन की ओर अग्रसर है। एक बात आप लोगों ने भी नोट की होगी शायद और वह यह कि इस बार की विशेष दोहे की घोषणा कुछ अधिक जटिल रही।



इस आयोजन की घोषणा सम्बन्धित पोस्ट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
आप के दोहे navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें   

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सूचना:-

दोहा सागर
सामयिक दोहकारों से ३० - ३० प्रतिनिधि दोहे, परिचय (नाम, जन्म दिनांक / स्थान, माता-पिता-जीवन साथी का नाम, शिक्षा प्रकाशित पुस्तकें सर्जन विधाएं, पता, दूरभाष / चलभाष ई मेल आदि) तथा चित्र आमंत्रित हैं। इन्हें divyanarmada.blogspot.in में प्रकाशित किया जाएगा। जो साथी चाहेंगे उनके दोहे सहयोगाधार से प्रकाशित हो रहे दोहा सागर में संकलित-प्रकाशित किये जायेंगे। दोहे निम्न पते पर भेजें - salil.sanjiv@gmail.com

इस विषय पर सभी बात-व्यवहार डाइरेक्ट सलिल जी से ही किए जाएँ ..... 

संतोष का सुख तो हमेशा, झोंपड़ों को ही मिला

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन 


देखते ही  देखते १० कवियों के ५३ हरिगीतिका छंद पढ़ चुके हम अब तक। इस में सिद्धहस्त रचनाकार भी हैं और नौसिखिये भी। जीवन में पहली बार जिन्होंने हरिगीतिका छंद लिखे हैं, मंच उन का विशेष आभार व्यक्त करता है। इस आयोजन में हमने आध्यात्म - हास्य और शृंगार विषयक स्पेशल पोस्ट पढ़ीं, अब उसी क्रम में आज तिवारी जी भी एक स्पेशल पोस्ट ले कर आए हैं। घर कुटुम्ब की बातें हम सब जानते हैं, बतियाते भी हैं, परन्तु - अरे ये तो होता ही है इस में खास क्या - कह कर उन बातों को दरकिनार कर के साहित्य से दूर रखते हैं। जिन बातों की वज़ह से माहौल सतत प्रभावित होता रहता हो वो हल्की फुलकी बातें न हो कर बेहद गम्भीर बातें होती हैं और उन्हें निरंतर साहित्य में आते रहना चाहिए। शेषधर तिवारी जी ने इन बातों को केंद्र में रख कर अपने छंद भेजे हैं| विशेष बात ये कि 'अनुरोध', 'कसौटी' या 'त्यौहार' शब्द या कि उन के पर्यायवाची लिए बिना भी, छंद, इन शब्दों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।पहले हमने सोचा कि यह घोषणा के अनुरूप है या नहीं, फिर सोचा इस को पाठक माई-बाप की अदालत में पेश कर के देखते हैं। मंच के अनुसार यह एक सुन्दर प्रयोग है।

दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - शेषधर तिवारी, राकेश तिवारी [१३-१४]


सभी साहित्य रसिकों का पुन:सादर अभिवादन और धूल [रंग वाली होली] की शुभकामनाएँ

इस बार हम एक नहीं दो दो तिवारी बन्धुओं के दोहे पढ़ते हैं|


SheshDhar Tiwari

जली होलिका प्रे की, भस्म हुए संस्कार|
नफरत के रंगों रँगा, होली का त्यौहार||

मर्यादा सूली चढी, स्वार्थ सिद्धि ही धर्म|
होली में स्वाहा हुए, दया प्रीति सत्कर्म||

रहे कभी
संयुक्त अब, एकल हैं परिवार|
होली में भी अब कहाँ, जुड़ते हैं घर चार||

तन रंगे क्या होत है, मन रंगे तो जान|
राधा के कानन पड़े, बस मुरली की तान||

गालों पे लाली चढी, होठ गुलाबी होत|
कान्हा तुमने कौन विधि, रंग दियो है पोत||

जदुराई के अंग लगि, राधा सिमटत जात|
ज्यूँ लजात है हाँथ लगि, छुई मुई के पात||

मन मलीन, काया कलुष,
वाणी विष, उर घात|
इनसे बच कर जो मिले, वह जीवन सौगात||

इन्द्र धनुष सा ही रहे, जीवन ये सतरंग|
बिगड़े तो फिर फिर बने, मित्र रहें जो संग||

कान्हा के जब भी बढ़ें, हस्त कलश की ओर|
इत उत देखे राधिका, चले कोऊ जोर||

कान्हा गैया थन पकरि, जो मुह दीनी धार|
राधा अंखियाँ मीचती, करती मातु पुकार|१०|

जसुमति देखें ओट ते, लीला हरि की जान|
नैनन को शीतल रन, कानन कीन्ही दान|११|

राधा के तन जो पडी, धवल प्रीति की धार|
सभी मनाते कह इसे, होली का
त्यौहा|१२|
:- शेषधर तिवारी

विविध रंगों से रँगे इंद्रधनुषी दोहे हैं ये| सामजिक सरोकार, गाय के तन से सीधा दूध का पीना, कलश वाला दोहावाह तिवारी जी वाह| आज के दिन को और भी रंगीन कर दिया आपके दोहों ने| ख़ासकर संयुक्त और एकलपरिवार वाले दोहे ने तो विशेष रूप से प्रभावित किया है|

Rakesh Tewari

ऋतु आई ऐसी भली, हवा बसै रसधार|
शीत ऋतू चलती भई, आइ वसंत बहार|१|

बगियन झूलै मंजरी, फूल चढाए चाप|
विजयशाल ठनकन लगे, मदन चलें चुपचाप|२|

ठंडाई माथे चढी, चढ़े नैन रतनार|
विचरें दूजे लोक में, बिसरा यह संसार|३|

हरसिँगार-टेसू मिला, रंग किये तैयार|
उनमें मिले गुलाब जल, होली का त्यौहार|४|

लाल गुलाबी बैंगनी, उडै अबीर गुलाल|
भीगे हैं सब रंग में, अधर हो गए लाल|५|

बहुतै दिन रूठे रहे, पाले मन में रार|
रंग-राग में धुल गई, सारी अबकी बार|६|

तन-मन तर भए रंग में, उस होली में यार|
परब बरस गाढे परत, पहले से चटकार|७|

होली में फिर दिख गई, तेरी छवि इक बार|
अंतर्मन झंकृत हुआ, झन झन करते तार|८|

सारा आलम रंगमय, छोट-बूढ़ नर-नार|
जग से न्यारा एक है, होली का त्यौहार|९|

अजीब इत्तेफ़ाक है इस समस्या पूर्ति के पहले चक्र में पधारी निर्मला जी ने जीवन में पहली बार दोहे लिखे हैं| बकौल पंकज सुबीर - उन के लिए भी यह पहला ही मौका है| और अब राकेश भाई के अनुसार वो भी पहली बार ही दोहे लिख रहे हैं| इस से बड़ी खुशी की बात और क्या होगी| आप लोगों का छन्दों के प्रति रुझान देखते हुए लगता है कि आयोजन सही दिशा में जा रहा है| राकेश भाई आप ने वाकई गजब के दोहे लिखे हैं| बहुत बहुत बधाई|

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेष धर तिवारी जी [4]

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेष धर तिवारी जी

सम्माननीय साहित्य रसिको

पहली और फिर पहली से दूसरी रचना आते आते काफ़ी वक्त लगा| अब साहित्य रसिकों को जैसे जैसे पता चल रहा है, वो अपनी अपनी रचनाएँ भेजने लगे हैं| इस शुभ कार्य में अपना अमूल्य योगदान देने के लिए आप सभी का पुन: पुन: आभार|

पहली समस्या पूर्ति 'चौपाई' की चौथी रचना हाजिर है आपके सामने| इस बार हम पढ़ते हैं एक ऐसे व्यक्ति को जो कि व्यवसाय से जुड़े होने के बावजूद साहित्य सेवा में लगे हुए हैं| इलाहाबाद की मिट्टी से जुड़े भाई श्री शेष धर तिवारी जी और मंचों से भी साहित्य की सेवा कर रहे हैं| आप अपना एक ब्लॉग [http://sheshdt.blogspot.com] भी चलाते हैं| प्रस्तुत रचना में आप के अनुभव की झलक स्पष्ट रूप से दृष्टि गोचर होती है|

एक दिवस आँगन में मेरे |
उतरे दो कलहंस सबेरे|
कितने सुन्दर कितने भोले |
सारे आंगन में वो डोले |१|

मैंने उनको खूब रिझाया |
दाना दुनका खूब खिलाया|
पर जब छूना चाहा मैंने |
फैलाए दोनों ने डैने |२|

उड़े गगन को छूना चाहें |
पायीं जैसे अपनी राहें|
अच्छी है यह प्रीत जगत की |
जैसे भगवन और भगत की |३|

दिल को मेरे तुम भाते हो |
जब भी मेरे घर आते हो|
दिल में मेरे रहते हो तुम |
कितने अच्छे लगते हो तुम|४|


सप्ताहांत में हम पढ़ेंगे एक नौजवान शायर की चौपाइयाँ|


देर से आने वाले साहित्य रसिकों को फिर से बताना चाहूँगा कि:-

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
हर चरण में १६ मात्रा

अधिक जानकरी इसी ब्लॉग पर उपलब्ध है|


सभी साहित्य रसिकों का पुन: ध्यनाकर्षण करना चाहूँगा कि मैं स्वयँ यहाँ एक विद्यार्थी हूँ, और इस ब्लॉग पर सभी स्थापित विद्वतजन का सहर्ष स्वागत है उनके अपने-अपने 'ज्ञान और अनुभवों' को हम विद्यार्थियों के बीच बाँटने हेतु| इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहले समस्या पूर्ति के बार में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:- समस्या पूर्ति: पहली समस्या पूर्ति - चौपाई