भाव जभी उदगार बन - सहज, पूछते क्षेम|
अनुभूति की कोख से, तभी जन्मता प्रेम||
तभी जन्मता प्रेम, नेम से फलता बढ़ता|
सरोकार के साथ, गगन सा ऊँचा चढ़ता|
रहता दिल में, ख़ाता गुस्सा, पीता नफ़रत|
लेता कुछ ना, हरदम देने को ही उद्यत||
चल फिर हम तुम प्रेम से, करें प्रेम की बात|
प्रेम सगाई विश्व में, सर्वोत्तम सौगात||
सर्वोत्तम सौगात, घात ना करती है ये|
कैसा भी हो जख्म, फटाफट भरती है ये|
प्रेम बिना पुरुषार्थ - विनाशक, नारि - निरंकुश|
प्रेम बढ़ा कर लेता, नर, हाथी पर अंकुश||
अनुभूति की कोख से, तभी जन्मता प्रेम||
तभी जन्मता प्रेम, नेम से फलता बढ़ता|
सरोकार के साथ, गगन सा ऊँचा चढ़ता|
रहता दिल में, ख़ाता गुस्सा, पीता नफ़रत|
लेता कुछ ना, हरदम देने को ही उद्यत||
चल फिर हम तुम प्रेम से, करें प्रेम की बात|
प्रेम सगाई विश्व में, सर्वोत्तम सौगात||
सर्वोत्तम सौगात, घात ना करती है ये|
कैसा भी हो जख्म, फटाफट भरती है ये|
प्रेम बिना पुरुषार्थ - विनाशक, नारि - निरंकुश|
प्रेम बढ़ा कर लेता, नर, हाथी पर अंकुश||