3 August 2011

संसार उस के साथ है जिस को समय की फ़िक्र है

सदियों पुरानी सभ्यता को बीस बार टटोलिए|
किसको मिली बैठे बिठाये क़ामयाबी बोलिए|
है वक़्त का यह ही तक़ाज़ा ध्यान से सुन लीजिए|
मंज़िल खड़ी है सामने ही, हौसला तो कीजिए||

चींटी कभी आराम करती आपने देखी कहीं|
कोशिश ज़दा रहती हमेशा, हारती मकड़ी नहीं|
सामान्य दिन का मामला हो, या कि फिर हो आपदा|
जलचर, गगनचर कर्म कर के, पेट भरते हैं सदा||

गुरुग्रंथ, गीता, बाइबिल, क़ुरआन, रामायण पढ़ी|
प्रारब्ध सबको मान्य है, पर - कर्म की महिमा बड़ी|
ऋगवेद की अनुपम ऋचाओं में इसी का ज़िक्र है|
संसार उस के साथ है जिस को समय की फ़िक्र है||

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ये ऊपर की पंक्तियाँ छन्द - हरिगीतिका पर हैं
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ये पंक्तियाँ 2212 x 4 की बहर वाली ग़ज़ल [बहरे रजज़ मुसमन सालिम] के अनुरूप तो हैं;
परन्तु, हरिगीतिका फॉर्म में होने के कारण ग़ज़ल की शर्तों के अनुरूप नहीं हैं|
जो लोग ग़ज़ल में महारत रखते हों और ये छन्द लिखना चाहते हों,
उनकी मदद स्वरूप एक उदाहरण मात्र है ये|
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7 comments:

  1. चींटी कभी आराम करती आपने देखी कहीं|
    कोशिश ज़दा रहती हमेशा, हारती मकड़ी नहीं|
    सामान्य दिन का मामला हो, या कि फिर हो आपदा|
    जलचर, गगनचर कर्म कर के, पेट भरते हैं सदा||bahut badhiyaa

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  2. विषय और छन्द प्रयोग, दोनों ही अनुपम हैं, पढ़कर बह जाने का मन करने लगता है।

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  3. कर्म की ओर प्रवृत्त करती प्रेरक पोस्ट ,समय बड़ा बलवान और कीमती है ,अच्छी पोस्ट ..कृपया यहाँ भी - http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/2011/08/blog-post_04.html
    और यहाँ भी -http://veerubhai1947.blogspot.com/और यहाँ भी -http://sb.samwaad.com/

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  4. बेहद प्रेरणादाई और सकारात्मक पोस्ट

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  5. हरिगीतिका के लिए कमर कसली है नवीन जी

    कर्म की व्याख्या आपने अलग ढंग से की है-
    गुरुग्रंथ, गीता, बाइबिल, क़ुरआन, रामायण पढ़ी|
    प्रारब्ध सबको मान्य है, पर - कर्म की महिमा बड़ी|
    ऋगवेद की अनुपम ऋचाओं में इसी का ज़िक्र है|
    संसार उस के साथ है जिस को समय की फ़िक्र है||

    आपकी श्रेष्ठ रचना से प्रेरणा मिली है …
    हार्दिक बधाई !

    शुभकामनाओं मंगलकामनाओं सहित…
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  6. गुरुग्रंथ, गीता, बाइबिल, क़ुरआन, रामायण पढ़ी|
    प्रारब्ध सबको मान्य है, पर - कर्म की महिमा बड़ी|

    बहुत बढ़िया सर।


    सादर

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