बेच दो ईमान तुम, दुनिया की दौलत लूट लो - नीलकण्ठ तिवारी

बेच दो ईमान तुम, दुनिया की दौलत लूट लो
मैं ग़रीबी में पाला ईमान केवल चाहता हूँ
तुम धरा के फूल नभ के चाँद-तारे लूट लो
मैं धरा की धूल का वरदान केवल चाहता हूँ

ऐ विषैली प्यास वालो! तुम सदा प्यासे रहोगे
खून तुम इन्सानियत का ही सदा पीते रहोगे
मैं स्वयं जलती चिता हूँ –
आग अपनी ही पियूँगा
मैं चिता से चाँदनी का दान केवल चाहता हूँ

चाहिये मेवा तुम्हें, तुम ढोंग सेवा का रचाओ
झूठ के बाज़ार में दूकान तुम अपनी सजाओ
बीन लो तिनके सभी तुम
हर सिसकती झोंपड़ी के
मैं तो टैंकों में छिपा तूफ़ान केवल चाहता हूँ

तुम बुरे कामों से माँगो भीख ऊँचे नाम की
मरघटों में भी सजाओ सेज तुम आराम की
राख़ बन कर किन्तु मैं तो मरघटों की खाक से
प्रेम-मन्दिर का नया निर्माण केवल चाहता हूँ

निर्बलों की लाश पर तुम
स्वार्थ को नङ्गा नचाओ
और दिन के रक्त से तुम
रात अपनी जगमगाओ
जिन आँसुओं से कृष्ण ने धोये सुदामा के चरण
उन आँसुओं का मैं सबल

बलिदान केवल चाहता हूँ

:- नीलकण्ठ तिवारी

दोहे – बी. के. शर्मा ‘शैदी’

 तुलसी पूजे कामिनी, कैसा शान्त स्वभाव
रीति-काल का रूप है भक्ति-काल के भाव

कैसी हुई महावरी, उस कदम्ब की छाँव
जल में होती के हिलें, मँहदी वाले पाँव

प्रियतम नयनों में बसे, जब हों पलकें बन्द
जैसे – मोती सीप में; कलियों में मकरन्द

मिला पुराने बक्स में, आज तुम्हारा पत्र
यादों की शहनाइयाँ, गूँज उठीं सर्वत्र

अधरों पर निश्छल हँसी, तन की मादक लोच

तुलसी की चौपाइ में, कालिदास की सोच 

:- बी. के. शर्मा ‘शैदी’

दोहे – सुशीला शिवराण

 देख ज़हर इंसान का, नहीं नाग ही दंग॥
गिरगिट भी हैरान हैं, देख बदलते रंग।

मन की पीड़ा का यहाँ, कौन करे एहसास।
पत्थर की चट्टान से व्यर्थ नमी की आस ॥

तन-मन से सींचा जिसे, उस बगिया का फूल।
मज़दूरी देने लगा, गया भावना भूल॥

जिसकी छाया मे पली, पा कर शीत बयार ।
उस ही तरू को खा गई, दीमक खरपतवार॥

धन-दौलत की चाह में, भटके लोग तमाम।

विद्‍या जैसा धन कहाँ, गुरुपद जैसा धाम॥

:- सुशीला शिवराण

दोहे – सुमन सरीन

 जग में ढूँढा प्रेम, तो, अब तक अचरज होय
कान्हा तो लाखों मिले, मीरा मिली न कोय

क्वारेपन के रतजगे, बहकी-बहकी बात
छत पर हाये भीगना, सारी सारी रात

खाकी वर्दी देख कर, बौराया उन्माद
जिस दिन लौटा डाकिया, सारा दिन बर्बाद

पीपल के पत्ते बँधी, चिट्ठी की सौगात
भौजी करे ठिठोलियाँ, रहे लगाये गात

महुये के रस से भरे, बड़े-बड़े दो नैन
घुङ्घर वाले बाल ने, लूटा दिल का चैन

होली में भिजवा दिया, बैरी ने सन्देश
फिर तो फागुन रूठ कर, जा पहुँचा परदेश

इक कचनारी आग में, तपे गुलाबी-गाल
किस ने फेंका है भला – ये सम्मोहन-जाल

लाल चूड़ियों से बजे, भरे-भरे दो हाथ

दो पल में ही हो गया, जीवन भर का साथ   

:- सुमन सरीन

दोहे – शैलेन्द्र शर्मा

 मौसम के कोडे पडे , सूखा बेबस ताल
और कुदाले पूछतीं अब कैसा है हाल

थीं अपनी मजबूरियाँ , टूटे उम्र तमाम
वर्ना बह कर धार संग होते  शालिग्राम

जिनके कारन नट बने करतब किये हजार
निगल गयी वो रोटियाँ सपनों का संसार

अधरो पर चिपकी रहे देढ इंच मुस्कान
ऐसे चेहरो से बचा मुझको दयानिधान

है ऐसी अनुभूति कुछ , रोम-रोम प्रत्यंग
तडपे-उछले गिर पडे , ज्यो परकटा विहंग

दावा करते नेह का , किंतु चुभोते डंक
रिश्तो ने छोडा किसे क्या राजा क्या रंक

रिश्तो के संसार का यह कैसा दस्तूर
ज्यो ज्यो घटती दूरियाँ , दिल से होते दूर

जो रिश्ता जितना अधिक अपने रहा करीब
जडी उसी ने पीठ पर उतनी बडी सलीब

अपनो ने ही है दिया कुछ ऐसा अपनत्व
मन मे खारे सिन्धु सा, बढता गया घनत्व

एक किये जिसके लिये घाटी और पहाड
वही नीड लगता कभी खुद को जेल तिहाड

गाँव शहर मे आजकल दिखते यही चरित्र
पोर पोर मे विष भरा ऊपर महके इत्र

उन रिश्तो से कीजिये , हर पल छिन अनुबन्ध

जिन रिश्तो से विश्व मे फैले धूप सुगन्ध

:- शैलेन्द्र शर्मा

छन्द और मुक्तक - सागर त्रिपाठी

सवैया
गङ्गा में पाप धुलें जग के पर पावन नीर मलीन न होगा
 कर्ण सा स्वर्ण लुटाता रहे पर दानी कभी धनहीन न होगा
सौम्य-उदार-विनीत न हो धनवान कभी वो कुलीन न होगा
 स्नेह की गागर से भरिये कभी सागर ये जलहीन न होगा
मत्त-गयन्द सवैया
सात भगण + दो गुरू 

मुक्तक

प्रसव का भार तो बस माँ ही वहन करती है
वक्ष में दुग्ध का सिहराव सहन करती है
इक जनानी ही धरा पर है धरोहर ऐसी
अपनी सन्तान पे अस्तित्व दहन करती है

भर दे हृदय के घाव वो मरहम निकालिये
हारे-थके दिलों में बसे ग़म निकालिये
अब युद्ध की रण-नीति में बदलाव लाइये
रण-दुन्दुभी से हो सके – सरगम निकालिये 


सागर त्रिपाठी – 9920052915

दोहे – नवीन सी. चतुर्वेदी

 घाटे का सौदा रहा, बारिश का व्यापार।
गरजे तो सौ-सौ जलद, बरसे बस दो-चार॥

इस दुनिया को छोड़ कर, उस दुनिया का नाम।
जाने किस ने रख दिया, परम-धाम, सुख-धाम॥

वही हमारी ज़िन्दगी, और वही मामूल।
ज्यों तर कपड़े तार पर चाट रहे हों धूल।।

न तो बादलों का वजन, न ही धरे कुहसार।
लेकिन पलकें ढो रहीं लाखों टन का भार॥

न तो निम्न है तम जहाँ, न ही प्रकाश महान।
ऐसे इक दरबार के हाक़िम हैं रहमान॥

अपने मन के गाँव के, सिर्फ़ यही सिरमौर।
अँगना, पौरी, देहरीबचपन वाले दौर।।

फिर बेशक़ तू भाड़ की, कमी गिनाना लाख।
लेकिन पहले भाड़ के भुने चने तो चाख।।

अक्षर मेरा इष्ट है, शक्ति, शब्द-सन्धान।
गुर सीखे वाल्मीकि से, ये मेरी पहिचान॥

हम ने पूछा हाट से, क्या है हमरा मोल। 
तारीफ़ों के पुल बँधे, प्रश्न हो गया गोल॥ 

तन-धारी होते सदा, तन के ही आसक्त।
पूज रहे आकार को, निराकार के भक्त॥


बाग़-बाग़ गुलजार है, राग-राग मधु-राग ।
जाग, जाग कर, जाग* कर, जाग-जाग नर जाग ॥
* यज्ञ / कर्म के सन्दर्भ में



:- नवीन सी. चतुर्वेदी

सोरठे – नवीन सी. चतुर्वेदी

 कन्या का कौमार्य - उस का ही जिम्मा नहीं।
सुनो गौर से आर्य! - ये हम पर भी फ़र्ज़ है॥

हरिक सार का सार - दो बातों में है निहित।
मधुकर की मनुहार - और कली का उन्नयन॥

सच पर नहीं विवाद - किन्तु झूठ ये भी नहीं।
हरिश्चन्द्र के बाद - सत्यवादिता कम हुई॥

डीजल वाली नाव - जब से हम खेने लेगे।
मत्स्य-मनस के घाव - दिन-दूने बढ़ने लगे॥

भरते हैं आलाप - मन-मृदंग सँग हर सुबह।
घोड़ों की पदचाप - बायसिकिल की घण्टियाँ॥

क्या बतलाऊँ यार - पहले हर दिन पर्व था।
पर अब तो त्यौहार - भी लगते हैं बोझ से॥

वो अपना अवसाद - भला भूलते किस तरह।
बारह वर्षों बाद - जिन को लाक्षागृह मिला॥

निष्कासन के तीर - ले कर सब तैयार हैं।लंका वाली पीर - कोई भी हरता नहीं॥

कैसे होती बन्द - पुरखों की छेड़ी बहस।
हम बोले मकरन्द - वो पराग पर अड़ पड़े॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

प्यार का दीप किसी राधा ने बाला होगा - महीपाल

प्यार का दीप किसी राधा ने बाला होगा
दूर मीरा पे गया उस का उजाला होगा

वो महल की हो कथा या कि व्यथा कुटिया की
उन्हीं जल-थल हुई आँखों का हवाला होगा

तुमने कैसे ऐ मुसम्मात फटे आँचल में
दूध और दर्द का सैलाब सँभाला होगा

फट गया होगा हिमालय का कलेज़ा घुट कर
तब किसी हुक ने गङ्गा को निकाला होगा

चाँद का सौदा किया घर में अमावस कर ली
दोस्त! क्या चाँद के टुकड़ों से उजाला होगा

बुत की पायल जो हसीं तुमने तराशी महिपाल
उस में बजने का गुमाँ किस तरह डाला होगा

:- महीपाल

बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 1122 22

अपनी-अपनी कारस्तानी - शैल चतुर्वेदी

अपनी-अपनी कारस्तानी
कहना-सुनना है बेमानी

मुखड़ा-मुखड़ा एक मुखौटा
आखर-आखर ग़लत-बयानी

मदिरा-मदिरा घूँट किसी को
कोई पुकारे पानी-पानी

रो कर पूछा – देश कहाँ है
हँस कर बोले – हम का जानी

हँसी बाँटते जीवन बीता
हम से कौन बड़ा है दानी

शब्द-शब्द से अर्थ निकाला
अर्थ मिला तो अक़्ल हिरानी

परिचय शैल हमारा इतना
उमर सयानी – पीर पुरानी 

:- शैल चतुर्वेदी

ऐसे भक्तों की भीड़ आई है सहमे-सहमे सभी नज़ारे हैं - श्री हरि

ऐसे भक्तों की भीड़ आई है सहमे-सहमे सभी नज़ारे हैं
ठिठकी-ठिठकी सी सरयू की लहरें ख़ौफ़ खाये हुये किनारे हैं

चादरें राम-नाम की ओढ़े दोस्त खञ्ज़र लिये पधारे हैं
दोस्ती के दरख़्त मुरझाये हाथ में मुल्ला जी के आरे हैं

इन की आवाज़ में भरी तल्ख़ी उन की तक़रीर में शरारे हैं
इस तरफ़ हैं घृणा के व्यापारी उस तरफ़ नफ़रतों के मारे हैं

हर तरफ़ आँधियों का आलम है और गर्दिश में सब सितारे हैं
भूल कर भी न लोग कहते हैं तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं

:- श्री हरि

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून [दुगुन]
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22

वो भली थी, या बुरी, अच्छी लगी - दानिश भारती

वो भली थी, या बुरी, अच्छी लगी
ज़िन्दगी, जैसी मिली, अच्छी लगी

बोझ दिल का, घुल के सारा, बह गया 
आंसुओं की वो नदी अच्छी लगी

चांदनी का लुत्फ़ भी तब मिल सका
जब चमकती धूप भी अच्छी लगी

जाग उट्ठी ख़ुद से मिलने की लगन
आज अपनी बेखुदी अच्छी लगी

सबको, सब कुछ तो कभी मिलता नहीं 
इसलिए थोड़ी कमी अच्छी लगी 

दोस्तों की बेनियाज़ी देख कर
दुश्मनों की बेरुखी अच्छी लगी

आ गया अब जूझना हालात से
वक़्त की पेचीदगी अच्छी लगी

ज़हन में 'दानिश' उजाला छा गया
इल्मो-फ़न की रोशनी अच्छी लगी


:- दानिश भारती

बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 212

4 ग़ज़लें - मेराज फैज़ाबादी

रिश्तों की कहकशां सरे बाज़ार बेचकर
घर को बचा लिया दर-ओ -दीवार बेचकर

शोहरत की भूख हमको कहाँ लेके आ गयी
हम मुहतरम हुए भी तो किरदार बेचकर

वो शख्स सूरमा है ..मगर बाप भी तो है
रोटी खरीद लाया है तलवार बेचकर

जिसके क़लम ने मुद्दतों बोए हैं इन्क़लाब
अब पेट पालता है वो अख़बार बेचकर

अब चाहे जो सुलूक़ करे आपका ये शहर
हम गाँव से तो आ गये घर बार बेचकर
बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 221 2121 1221 212 


हम ग़ज़ल में तेरा चर्चा नहीं होने देते
तेरी यादों को भी रुसवा नहीं होने देते

कुछ तो हम खुद भी नहीं चाहते शुहरत अपनी
और कुछ लोग भी ऐसा नहीं होने देते

अज़मतें अपने चरागों की बचाने के लिए
हम किसी घर में उजाला नहीं होने देते

आज भी गाँव में कुछ कच्चे मकानों वाले
घर में हमसाये के फ़ाक़ा नहीं होने देते 

ज़िक्र करते हैं तेरा नाम नहीं लेते हैं 
हम समन्दर को जज़ीरा नहीं होने देते 

मुझको थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 1122 22


तेरे बारे में जब सोचा नहीं था 
मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था 

तेरी तस्वीर से करता था बातें 
मेरे कमरे में आईना नहीं था 

समन्दर ने मुझे प्यासा ही रखा 
मैं जब सहरा में था प्यासा नहीं था 

वो जिसने तोड़ दी सांसों की जन्जीर 
वह था मजबूर दीवाना नहीं था 

मनाने रूठने के खेल में हम 
बिछड़ जायेंगे मैं यह सोचा नहीं था 

सुना है बन्द कर ली उसने ऑंखें 
कई रातों से वह सोया नहीं था 

गुज़र जा इस तरह दुनिया से मेराज 
कि जैसे तू यहाँ आया नहीं था 
बहरे हज़ज  मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन ,
1222 1222 122  


किसी से यूँ भी कभी रस्मो राह हो जाये 
कि अपने आप से मिलना गुनाह हो जाये 

तअल्लुक़ात की इस दास्ताँ को तूल न दे 
यही बहुत है कि दो दिन निबाह हो जाये 

वह जिसने तेरी मुहब्बत खरीद ली जानाँ 
खुदा करे कि वही बादशाह हो जाये 

सुबूत हम से हमारी वफ़ा का जब मांगे 
तो उसका दिल ही हमारा गवाह हो जाये 

बलन्दियों पे नज़र आ रहे हैं कुछ बौने 
अजब नहीं कि ये दुनिया तबाह हो जाय
बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22  

:- मेराज फैज़ाबादी