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किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है


हमें इस आन का थोथा गुमान थोड़ी है ।
ये देवभूमि है ईराक़-ईरान थोड़ी ह

शुरू ही ‘हिन्दु’ से होता है इसका पावन नाम ।
ये सिर्फ़ नाम का हिन्दोसतान थोड़ी है ॥

सहिष्णुता व सदाचार लक्ष्य हैं इसके ।
बग़ावतों के लिये संविधान थोड़ी है ॥

हैं संविधान की नज़रों में सब समान, मगर ।
असम, असम है, हिमाचल समान थोड़ी है ॥

विरोध करने का अधिकार सबको है, लेकिन ।
उठापटक के लिये प्रावधान थोड़ी है ॥

हरेक बात पै ही मोल-भाव क्यों करना ।
ये अपना देश फलों की दुकान थोड़ी है ॥

हम इसकी 'बीम' पै 'हैमर' चला नहीं सकते ।
ये अपना घर भी है केवल मकान थोड़ी है ॥

जो इसपै वार करेगा वो फल भी भुगतेगा ।
“किसी के बाप का हिन्दोसतान थोड़ी है" ॥

Navin C. Chaturvedi

माँ सरस्वती के चालीस नाम वाली सरस्वती वन्दना - नवीन

हे मरालासन्न वीणा-वादिनी माँ शारदे।

वागदेवी, भारती, वर-दायिनी माँ शारदे॥

 

श्वेत पद्मासन विराजित, वैष्णवी माँ- शारदे।

हे प्रजापति की सुता, शतरूपिणी माँ शारदे।।

 

चंद्रिका, सुर-वंदिता, जग-वंदिता, वागेश्वरी।

कामरूपा, चंद्रवदना, मालिनी माँ शारदे॥

 

अम्बिका, शुभदा, सुभद्रा, चित्रमाल्यविभूषिता।

शुक्लवर्णा, बुद्धिदा, सौदामिनी माँ शारदे॥

 

दिव्य-अंगा, पीत, विमला, रस-मयी, भामा, शिवा।

रक्त-मध्या, विंध्यवासा, गोमती माँ शारदे॥

 

पद्म-निलया, पद्म-नेत्री, रक्तबीजनिहंत्रिणी।

धूम्रलोचनमर्दना, अघ-नासिनी माँ- शारदे॥

 

हे महाभोगा, परा, पथभ्रष्ट जग सन्तप्त है।

वृष्टि कीजै प्रेम की, अनुराग की माँ शारदे॥

 

नवीन सी चतुर्वेदी

देशभक्ति की कविताएँ / मुक्तक

मेरा हिन्दोसताँ सब से अलग सब से निराला है।
ये ख़ुशबूओं का गहवर है बहारों का दुशाला है।
अँधेरो तुम मेरे हिन्दोसताँ का क्या बिगाड़ोगे।
मेरा हिन्दोसताँ तो ख़ुद उजालों का उजाला है॥

ये ऋषियों का तपोवन है फ़क़ीरों की विरासत है।
ये श्रद्धाओं का संगम है दुआओं की इबारत है।
भले ही हर तरफ़ नफ़रत का कारोबार है लेकिन। 
ये इक ऐसा क़बीला है जिसे सब से मुहब्बत है॥

बुजुर्गों से वसीयत में मिले संस्कार उगलती है।
समन्वय से सुशोभित सभ्यता का सार उगलती है।
ज़माने भर के सारे तोपखाने कुछ नहीं प्यारे।
हमारे पास ऐसी तोप है जो प्यार उगलती है॥

हमारा दिल दुखा कर जाने क्या मिलता है लोगों को।
हमें यों आज़मा कर जाने क्या मिलता है लोगों को।
ये ऐसा प्रश्न है जिस का कोई उत्तर नहीं मिलता।
तिरंगे को जला कर जाने क्या मिलता है लोगों को॥

हम आपस में लड़ेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी।
अगर झगड़े बढेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी।
अगर अब भी नहीं समझे तो फिर किस रोज़ समझेंगे।
सियासत में पड़ेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी॥

जो मंजिल तक पहुँचते हैं वे रस्ते कैसे देखेंगे।
जो घर को घर बनाते हैं वे रिश्ते कैसे देखेंगे।
अगर झूठी शहादत में फ़ना होती रही नस्लें।
तो फिर हम लोग पोती और पोते कैसे देखेंगे॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

ब्रज-गजल - अबू उभरै तौ है हिय में, गिरा के रूठवे कौ डर - नवीन

ब्रज-गजल - रूठवे कौ डर 
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अबू उभरै तौ है हिय में - गिरा1 के रूठवे कौ डर। 
मगर अब कम भयौ है - शारदा के रूठवे कौ डर॥

सलौने-साँवरे नटखट बिरज में जब सों तू आयौ। 
न जानें काँ गयौ - परमातमा के रूठवे कौ डर॥

सुदामा और कनुआ की कथा सों हम तौ यै सीखे। 
विनय के पद पढावै है - सखा के रूठवे कौ डर॥

कोऊ मानें न मानें वा की मरजी, हम तौ मानें हैं। 
हमें झुकवौ सिखावै है - सभा के रूठवे कौ डर॥

हहा अब तौ ठिठोली सों जमानौ रूठ जावें है। 
कहूँ गायब न कर डारै - ठहाके - रूठवे कौ डर॥

निरे सत्कर्म ही थोड़ें करावै माइ-बाप'न सों। 
कबू छल हू करावै है – सुता2 के रूठवे कौ डर॥

हमें तौ नाँय काऊ 'और' कों तकलीफ है तुम सों। 
डरावै है तुम्हें वा ही 'तथा' के रूठवे कौ डर॥

घनेरे लोग बीस'न बेर कुनबा कों डला कह'तें। 
डरावै है सब'न कों या डला के रूठवे कौ डर॥

'नवीन' इतिहास में हम जाहु नायक सों मिले, वा के। 
मगज में साफ देख्यौ - नायिका के रूठवे कौ डर॥

गिरह कौ शेर:- 
बड़ी मुस्किल सों रसिया रास कों राजी भयौ, लेकिन। 
"लली कौ जीउ धसकावै लला के रूठवे कौ डर"॥

1 वाणी, सरस्वती 2 बेटी


नवीन सी. चतुर्वेदी 

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं - नवीन

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं। 
दिल-नशीं के दिल को कमतर आँकना अच्छा नहीं॥ 

जिस की आँखों में हमारे ही हमारे ख़ाब हों। 
उस की पलकों पर उदासी टाँकना अच्छा नहीं॥ 

उस की ख़ामोशी को भी सुनना, समझना चाहिये। 
हर घड़ी बस अपनी-अपनी हाँकना अच्छा नहीं॥ 

एक दिन दिल ने कहा जा ढाँक ले अपने गुनाह। 
हम ने सोचा आईनों को ढाँकना अच्छा नहीं॥ 

प्यार तो अमरित है उस के रस का रस लीजै 'नवीन'। 
बैद की बूटी समझ कर फाँकना अच्छा नहीं॥

नवीन सी. चतुर्वेदी 

भैया अपनी ब्रजभासा की हालत अच्छी नाँय - नवीन



भैया! अपनी ब्रजभासा की हालत अच्छी नाँय
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हम खुस हैं लेकिन मैया की हालत अच्छी नाँय। 
कनुप्रिया रवि की तनुजा१ की हालत अच्छी नाँय॥ 

कौन सौ म्हों लै कें मनमोहन के ढिंग जामें हम।
वृन्दा के वन में वृन्दा२ की हालत अच्छी नाँय॥

गोप-गोपिका-गैया-बछरा-हरियाली-परबत।
नटनागर तेरे कुनबा की हालत अच्छी नाँय॥ 

बस इतनौ सन्देस कोऊ कनुआ तक पहुँचाऔ। 
श्याम! कदम्बन की छैंया की हालत अच्छी नाँय॥ 

सूधे-सनेह के मारग सों ऐसे-ऐसे गुजरे। 
मिटौ तौ नाँय मगर रस्ता की हालत अच्छी नाँय॥ 

झूठे-झकमारे लोगन की ऐसी किरपा भई।  
आज सत्यभाषी बट्टा३ की हालत अच्छी नाँय॥ 

जो'उ 'नवीन' उपाय है सकें, करने'इ होमंगे। 
भैया! अपनी ब्रजभासा की हालत अच्छी नाँय॥ 

१ यमुना २ वृन्दा यानि तुलसी का वन वृन्दावन ३ दर्पण


नवीन सी चतुर्वेदी 
ब्रज-गजल

ब्रज गजल - नवीन

फोकट में भन्नाय रए हौ - हत का ऐ। 
खुद्द'इ गाल बजाय रए हौ - हत का ऐ॥
ज्ञानि'न कों भरमाय रए हौ - हत का ऐ। 
घी कों तेल बताय रए हौ - हत का ऐ॥
किसमत सों हीरा पायौ सो फेंक दियौ। 
मोति'न पै मगराय रए हौ - हत का ऐ॥
सैमइ कों तौ देखत ही म्हों फेरत हौ। 
चख-चख मैगी खाय रए हौ - हत का ऐ॥
बाहर बोलत हौ रोटि'न के लाले हैं। 
भीतर पाग पगाय रए हौ - हत का ऐ॥
जा कों देखत उलटी आवत हैं, ता कों। 
जमना में पधराय रए हौ - हत का ऐ॥
गोवरधन की महिमा हू बिसराय दई। 
सपरेटा चढवाय रए हौ - हत का ऐ॥
जहँ तुलसी कौ राज रह्यौ उन कुंज'न में। 
कंकरीट बिछवाय रए हौ - हत का ऐ॥
लक्ष्मी, काली, दुर्गा मैया के भगतौ।
बेटि'न कों बिदराय रए हौ - हत का ऐ॥
गैया कों मैया मानौ हौ तौ फिर चों। 
कट्टीघर खुलवाय रए हौ - हत का ऐ॥
ऐ 'नवीन' जी हम कों तौ बस यै बतलाउ। 
विजया कब छनवाय रए हौ - हत का ऐ॥

नवीन सी. चतुर्वेदी


ब्रज गजल

हमें हर बार थोड़े ही करिश्मा1 चाहिये साहब - नवीन

हमें हर बार थोड़े ही करिश्मा1 चाहिये साहब।  
सलीक़ा चाहिये साहब क़रीना2 चाहिये साहब॥  

बहुत ईमानदारी से कई लड़कों ने बतलाया। 
प्रियंका हो न हो लेकिन मनीषा3 चाहिये साहब॥ 

हमें रस्मो-रिवाज़ों ने कहाँ ला कर पटक डाला। 
कि बेटा हो न हो लेकिन तनूजा4 चाहिये साहब॥ 

नदी के तीर पर अद्भुत-अलौकिक शांति मिलती है। 
हताशा हो तो लाज़िम है बिपाशा5 चाहिये साहब॥   

पुराने चावलों की हर ज़माना क़द्र करता है। 
लता दीदी के युग में भी सुरैया चाहिये साहब॥ 

जिन्हें हूरों की हसरत हो वे जन्नत के मज़े लूटें। 
हमें अपने लिये तो सिर्फ़ हेमा6 चाहिये साहब॥  

नहीं हरगिज़ अंधेरों की सिफ़ारिश कर रहा हूँ मैं। 
‘नवीन’ इक सुब्ह की ख़ातिर – शबाना7 चाहिये साहब॥


1 चमत्कार 2 तरीक़ा, पद्धति manners 3 पढ़ी-लिखी / विदुषी 4 बेटी 5 नदी 6 पृथ्वी 7 रात

नवीन चतुर्वेदी

बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222


हवा का हाथ परों से जो मैं बँटाता हूँ- नवीन

हवा का हाथ परों से जो मैं बँटाता हूँ।
ये मुझ प फ़र्ज़ है साहब मैं इक परिन्दा हूँ॥
मेरा वुजूद है मौजूद हर जगह लेकिन।
मैं ख़ुश्बुओं में ठहरना पसन्द करता हूँ॥
मेरी उदास नज़र को न कोसिये साहब।
मैं बारिशों में तरसता हुआ पपीहा हूँ॥
करोड़ों साल भले उम्र हो चुकी है मगर।
मेरी नज़र में तो मैं अब भी एक बच्चा हूँ॥
जिसे पढा था किसी वालमीकि ने इक रोज़।
दरूने-वस्ल का हाँ मैं वही बिछड़ना हूँ॥
इक अपना जिस्म छुपाने की बदहवासी में।
ज़माने भर की तमन्नाएँ ओढ लेता हूँ॥
अज़ीब शौक़ हैं मेरे अज़ीब अफ़साने।
समुन्दरों को जला कर बुझा भी देता हूँ॥
हो जिसके पास जवाब उस से बात क्या करना।
मैं ख़ुद जवाब से उलटे सवाल करता हूँ॥
'नवीन' सम्त सफ़र हो तो मैं भी हूँ तैयार।
उसी पुराने सफ़र से तो कल ही लौटा हूँ॥



नवीन सी• चतुर्वेदी

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22

किसी की याद के सावन जब आहें भरते हैं - नवीन

किसी की याद के सावन जब आहें भरते हैं।
हम आँसुओं के हिंडोलों में ऐश करते हैं॥
हवा सिसकती है अब्रों की ओट में छुप कर।
तुम्हारे लम्स का जब उस से ज़िक्र करते हैं॥
जो देखते हैं उन्हें भी बहा के ले जाएँ।
ग़मों के दरिया इस अन्दाज़ से उतरते हैं॥
मुहब्बतों का हुनर सब के बस की बात नहीं।
फिसलनी सत्ह पे कम ही क़दम ठहरते हैं॥
डगर-डगर पे नगर की बशर-बशर है उदास।
गुहर बिखरने लगें तो बहुत बिखरते हैं॥
हिंडोला – एक तरह का झूला, अब्र – बादल, लम्स – स्पर्श, बशर – मनुष्य, गुहर – मोती

नवीन सी. चतुर्वेदी
बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22


शम्म कुछ पल झिलमिलायी झिलमिला कर बुझ गयी - नवीन

शम्म कुछ पल झिलमिलायी झिलमिला कर बुझ गयी ।
ज़िन्दगानी मुस्कुरायी मुस्कुरा कर बुझ गयी ॥

माँ तुम्हारी शान में गर यह नहीं तो क्या कहें।
एक शख़्सीयत१ हमें जलना सिखा कर बुझ गयी॥

हम ने भी चाहा कि दुनिया को बदल देंगे मगर।
इक तमन्ना थी जो दिल में लौ लगा कर बुझ गयी॥

मुफ़लिसी२ की जोत हाये तूने ये क्या कर दिया।
क्यों अमीरे-शह्र३ की बातों में आ कर बुझ गयी॥

हम ने गंगा-घाट पर देखा ये नज़्ज़ारा ‘नवीन’।
तेज़-लौ पत्तल के दोने को जला कर बुझ गयी॥

१ व्यक्तित्व, किरदार २ ग़रीबी ३ नगरसेठ, धन दौलत वाला

नवीन सी. चतुर्वेदी
बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
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2122 2122 2122 212


चैन घटता जा रहा है क्या मुसीबत पाल ली - नवीन

चैन घटता जा रहा है क्या मुसीबत पाल ली।
दिल बहुत घबरा रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥
दिल लगाया दिल दिया दिल को दिलासे भी दिये।
अब समझ में आ रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥
जैसे-जैसे हुस्न की हम उलझनें सुलझा रहे।
इश्क़ उलझता जा रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥
आसमानों से भी आगे दर्द जा पहुँचा मगर।
ग़म सिमटता जा रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥
पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा गोशा-गोशा हर्फ़-हर्फ़।
हर घड़ी दुहरा रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥
ऐ ख़ुदा तेरी ख़ुदाई में फ़क़त हम ही नहीं।
सारा आलम गा रहा है क्या मुसीबत पाल ली॥

नवीन सी. चतुर्वेदी
बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
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मन मुताबिक़ इस तरह कुछ भी नहीं कहते ‘नवीन’

मन मुताबिक़ इस तरह कुछ भी नहीं कहते ‘नवीन’।
पोर भर की डोर को रस्सी नहीं कहते ‘नवीन’॥
हास और परिहास बढ कर बन रहा है अट्टहास ।
इस विनाशक तत्व को मस्ती नहीं कहते ‘नवीन’॥
इस लिये ही तो हमारी बेटियाँ खतरे में हैं।
छेड़ने वालों को हम कुछ भी नहीं कहते ‘नवीन’॥
किस तरह कोई करेगा इस ज़माने का इलाज।
लोग बीमारी को बीमारी नहीं कहते ‘नवीन’॥
हम वली* हैं हम कलन्दर कोई हम जैसा नहीं ।
और सब कहते हैं बस तुम ही नहीं कहते ‘नवीन’॥
*
महान सन्त
अब तखल्लुस* में तुम अपना नाम जड़ना छोड़ दो।
दूसरे की शर्ट को अपनी नहीं कहते ‘नवीन’॥
*
शायर का उपनाम / छप्प

नवीन सी. चतुर्वेदी
बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
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आ गये आगोश में कुछ देर शर्माने के बाद - नवीन

आ गये आगोश में कुछ देर शर्माने के बाद।
रहमतें बरसा रहे हैं कह्र बरपाने के बाद॥
इश्क़ ने आख़िर अँधेरों को दरस दिखला दिया।
रोज़ शम्एँ जल रही हैं शाम ढल जाने के बाद॥
गर समन्दर की नज़र से देखिये तो जानिये।
किर्चियों में बँट गया है चाँद बह जाने के बाद॥
हाय उन लमहात की नादानियों को क्या कहें।
कुछ नज़र आता नहीं जब कुछ नज़र आने के बाद॥
उफ़ वो होठों पर सजे बोसों की झीनी बारिशें।
तर-ब-तर कर के हमें अश्क़ों से नहलाने के बाद॥
यक-ब-यक रुकना हमारे हाथ में है ही नहीं।
यक-ब-यक मोती रुकें कैसे बिखर जाने के बाद॥
तब कहीं कुछ-कुछ ख़ज़ानों के इशारे खुल सके।
दूजा तहखाना खुला जब पहले तहखाने के बाद॥
तब तो शायद ही कोई सच के क़सीदे काढ़ता।
भूख मिट जाती अगर झूठी क़सम खाने के बाद ॥
और कब तक किस के सर से अपने सर को फोड़िये।
जब सिराना हो चुका मशहूर सिरहाने के बाद॥
क्या पता कल आप ख़ुद परवाना बन जायें ‘नवीन’।
और दिया बन जायँ हम जल-जल के मर जाने के बाद॥

नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
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2122 2122 2122 212