तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - पहली किश्त

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन
और

आप सभी के सक्रिय सहयोग से आज हम पदार्पण कर रहे हैं कुण्डलिया छंद पर केन्द्रित तीसरी समस्या पूर्ति के पहले चरण में| अग्रजों की राय का सुपरिणाम ये हुआ कि आशा के अनुरूप कई रचनाधर्मियों ने इस छंद के प्रति अपना रुझान व्यक्त किया है| कई सारी रचनाएँ प्राप्त हुई हैं, और कई सारी रचनाएँ मार्ग में हैं|

आइये श्री गणेश करते हैं भाई महेंद्र वर्मा जी के कुण्डलिया छंदों के साथ:-
कम्प्यूटर इस दौर की, सबसे अद्भुत खोज ।
करता सबका काम यह, गंगू हो या भोज ।।
गंगू हो या भोज, सभी हैं निर्भर इस पर ।
यत्र तत्र है वास, मकां हो या हो दफ्तर ।
कभी शिष्य बन जाय, कभी बन जाता ट्यूटर ।
सुख दुख का है साथ, बिरादर है कम्प्यूटर ।।

भारत माता की सुनो, महिमा अपरम्पार ।
इसके आंचल से बहे, गंग जमुन की धार ।।
गंग जमुन की धार, अचल नगराज हिमाला ।
मंदिर मस्जिद संग, खड़े गुरुद्वार शिवाला ।।
विश्वविजेता जान, सकल जन जन की ताकत ।
अभिनंदन कर आज, ध न्य है अनुपम भारत ।।

और इस के बाद पढ़ते हैं तिलक राज कपूर जी की कुण्डलिया

सुन्‍दरियॉं करने लगीं, कम्‍प्‍यूटर से वार|
अधरों से छुरियॉं चलें, नैनन चले कटार||
नैनन चले कटार, बहुत है विपदा भारी|
भारत को ना भाय, लगी ऐसी बीमारी|
कह 'राही' कविराय, नारियॉं बनीं मछरियॉं|
कम वस्‍त्रों में छाय, रहीं बन कर सुंदरियाँ||


और इस खेप के तीसरे और आखिरी कवि समीर लाल जी

भारत मेरा देश है, इस पर मुझको नाज़|
चुनी हुई सरकार में, भ्रष्टन का है राज||
भ्रष्टन का है राज सभी मिल कर के लूटें|
पकड़ जाँय औ तुर्त, सभी बाइज़्ज़त छूटें|
कहत कवी शरमाय, झूठ में इन्हें महारत|
हालत ऐसी मगर, देश ऊँचा है भारत||

कंप्यूटर के सामने, बैठो पाँव पसार|
खबरें पढ़िए, पत्नि से - आँख छुपा कर यार|
आँख छुपा कर यार, मांग टी, आहें भरिये|
ताकि कहे वो बस्स, और अब काम न करिए|
कह 'समीर' कविराय, सफल भइये ये मंतर|
पूँजो उस के पाँव, दिया जिसने कंप्यूटर||


कवियों की फोटो यथावत कॉपी पेस्ट किए हैं| ज्यादा जानकारी न होने की वजह से आकार वगैरह में कुछ खास नहीं कर पाया हूँ| शीघ्र मिलेंगे दूसरी खेप की कुंडलियों के साथ| तब तक आप इन छंदों का आनंद लें और इन पर अपनी बहुमूल्य टिप्पणी रुपिन पुष्पों की वर्षा करें|

राम नवमी की शुभकामनायें

SHRI RAM


सभी साहित्य रसिकों को आज के पावन पर्व 'राम नवमी' की हार्दिक शुभ कामनाएँ|

हिन्दू धर्म के परम आराध्य देव, हमारे मन मन्दिर में सदा ही निवास करने वाले ऐसे मर्यादा पृरुषोत्तम भगवान श्री राम जी की अद्भुत लीला को जो यह बाल मन समझ पाया है, उसे शब्दाङ्कित करने का प्रयास किया है|

चौदह बरस वनवास स्वीकार कर के
वन-वन भटके जो वनवासी वेश में

अङ्गद-सुग्रीव-जामवन्त #जैसे दिग्गजों के-
साथ तालमेल, साध ले जो परदेश में

सुनिये 'नवीन'- लोक भावना को मान दे के,
प्राण प्रिय जानकी को, त्याग* दे निमेष में

ऐसे जनवादी-लोक हितकारी राम जी की,
फिर से ज़रूरत है आज इस देश में

छन्द:- घनाक्षरी कवित्त [इसे वृत्त के रूप में भी मान्यता प्राप्त है]

#एक यशस्वी राजा की प्रतापी सन्तान का पारिवारिक सुख शान्ति के लिए वनवास स्वीकार करना, वन में कई कष्टों को झेलना| वहाँ कई लोगों के कल्याण के लिए काम भी करना| वहीं मोह के वशीभूत हो कर उन की पत्नी का हरण हो जाना| पत्नी को ढूँढने के क्रम में एक मानव का वानर प्रजाति से गठबन्ध करना............................... भगवान श्री राम जी ने अपने जीवन के द्वारा हमारे लिए अनगिनत ऐसे उदाहरण उपस्थित किए हैं कि यदि गहनता से उन का अध्ययन किया जाए तो जीवन के कई क्लिष्ट क्लेशों का सहजता से हल प्राप्त किया जा सकता है|


* यहाँ मेरा तात्पर्य है कि जो व्यक्ति जन नायक है उसे जन भावना का सम्मान करते हुए अपनी सब से प्रिय वस्तु को त्यागने के लिए भी तत्पर रहना चाहिए, जो कि आज के तथाकथित जन-नायकों में दिखती ही नहीं है| यह घटना एक प्रतीक मात्र है, इसे नारी कल्याण से जोड़ कर देखने का कष्ट न करें|

कुंडली उर्फ कुण्डलिया छन्द - समस्या पूर्ति की घोषणा

एक बार फिर से सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

ये पिछली बार की होली और दोहा छंदों की वो अनवरत वर्षा तो सदा सदा के लिए स्मृति में दर्ज हो गयी| पिछली पोस्ट में हमने रोला छंद के बारे में बातें कीं| उस के बाद शास्त्री जी और पुर्णिमा जी ने सुझाव दिया कि भाई दोहा और रोला की चर्चा के बाद, रोला छन्द की बजाय सीधे कुंडली छंद पर ही रचनाएँ आमंत्रित करो ना......

बात तो दोनों ही अग्रजों ने सही कही| तो अलग से रोला छन्द की बजाय सीधे कूच करते हैं कुंडली उर्फ कुण्डलिया की तरफ| हमें नहीं लगता कि भारतीय जन-मानस के सबसे चहेते छंदों में से एक इस छंद के बारे में कुछ बताने की आवश्यकता है, फिर भी शास्त्री जी की आज्ञा के मुताबिक थोड़ा बहुत लिख देते हैं| और साथ ही इसी पोस्ट में समस्या पूर्ति की घोषणा भी कर देते हैं|

कुंडली उर्फ कुण्डलिया छन्द

प्रख्यात कवि 'गिरिधर' जी की कुण्डलियों से भला कौन अनभिज्ञ है| आइए उन की ही एक कुंडली को पढ़ते हैं और उसी कुण्‍डलिया के ज़रिए इस छन्‍द के विधान को समझते हैं|

साईं बैर न कीजियै; गुरु, पण्‍डित, कवि, यार|
२२ २१ १ २१२=१३/ ११ ११११ ११ २१=११
बेटा, बनिता, पौरिया, यज्ञ करावन हार||
२२ ११२ २१२ = १३ / २१ १२११ २१ = ११
यज्ञ करावन हार, राज मंत्री जो होई|
२१ १२११ २१ = ११ / २१ २२ २ २२ = १३
जोगी, तपसी, बैद, आप कों तपें रसोई|
२२ ११२ २१ = ११ / २१ २ १२ १२२ = १३
कहँ गिरिधर कविराय, जुगन सों यों चल आई|
११ ११११ ११२१ =११ / १११ २ २ ११ २२ = १३
इन तेरह कों तरह, दिएं बन आवै साईं||
११ २११ २ १११=११/ १२ ११ २२ २२ = १३

उपरोक्त कुण्‍डलिया को पढ़ कर प्रतीत होता है कि:

१. ये मात्रिक छन्‍द है|
२. पहली दो पंक्ति दोहा की हैं|
३. तीसरी से छठी पंक्ति रोला की हैं|
४. दोहे के आख़िरी चरण का रोला का प्रथम चरण बनना अनिवार्य|
५. रोला चार चरण का होता है| रोला छंद के बारे में जानकारी इस के पहली पोस्ट में दी हुई है ही| अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें|
५. कुण्‍डलिया के शुरू और अंत के शब्द समान होने चाहिए| प्राचीन काल से इस छन्‍द को यूँ ही लिखा गया है| जैसे कि गिरिधर कविराय जी की ऊपर की कुंडली में 'साईं' शब्द छन्द के शुरू और आखिर में आ रहा है|

और अब समस्या पूर्ति की घोषणा

इस बार समस्या पूर्ति की पंक्ति के बजाय हम ले रहे हैं तीन शब्द|
सभी सम्माननीय रचनाधर्मियों से सविनय निवेदन है कि वे अपनी रुचि के अनुसार किसी एक शब्द को ले कर एक या एक से अधिक शब्दों को लेते हुए एक से अधिक कुण्डलिया छन्द प्रस्तुत करें| जो भी शब्द लें वह उस कुंडली छंद के शुरू और आखिर में दोनों जगह आना चाहिए|

तीन शब्द :-
१. कम्प्यूटर
२. सुन्दरियाँ
३. भारत

सभी साहित्य रसिकों से सविनय निवेदन है कि वे अपनी अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

यमुना

SHRI YAMUNA JI

आज यमुना छठ है यानि यमुना जी का जन्म दिवस| हम मथुरास्थ माथुर चतुर्वेदी यमुना पुत्र कहे जाते हैं| तो अपनी माँ यमुना महारानी के चरण कमलों में श्रद्धा सुमन स्वरूप कुछ छन्द अर्पित करता हूँ:-


सूरज की तनया हौ, जम की बहन आप
माथुर मुनीसन की मातु हौ सुहासिनी

ब्रज की बसुन्धरा कों, आपनें कृतार्थ कियौ
स्याम जू की स्यामा, प्रेम पुञ्ज की प्रकासिनी

चौदह भुवन माँहि आपको प्रताप, तीनों -
लोकन में आप भक्ति भाव की बिकासिनी

छूटें जम-फन्द, मिटें द्वन्द औ अनन्द रहें
आप की कृपा सों श्री जमने कलि-नासिनी



मोहन की मुरली की मधुरता सी मधुर,
स्याम-बर्न सान्त-चित्त बारी श्री जमुना जी

रसिक सिरोमनि के रङ्ग रँगी सहचरी,
सदा स्याम ज़ू कों सुभकारी श्री जमुना जी

नटखट कन्हैया के पाँइन पखारिबे कों,
गिरिबर कलिन्द सों पधारीं श्री यमुना जी

सर्ब-सुखकारी, दुख-दर्द-कष्ट हारी, नँद-
नन्द जू कों प्यारी हैं हमारी श्री यमुना जी



कूड़ा करकट नहीं मैला तलछट नहीं
साफ़-सुथरा चमकदार तल चाहिये

यमुना को मुद्दा नहीं जमना-मैया जो कहें
सुनवाई में नवीन ऐसे दल चाहिये

किसी से भी पूछ लीजै सारे ही कहेंगे यही
अब और वादे नहीं बस हल चाहिये

मोहन की मुरली की मीठी-मीठी तान जैसा
मधुर-मधुर यमुना में जल चाहिये


नम: कृष्ण तुर्य प्रियाम

पत्रकारिता यानि, आम इन्साँ का जीवन

जर्नलिस्ट भी यार, देखिए गजब करें हैं|
टी.वी. पे दिन रात, अब क्रिकेटी खबरें हैं|
क्या करते हो यार, हद्द तुमने कर डाली|
अच्छी ख़ासी न्यूज, लगे है चम्मच वाली|१|

ये निकले, वो पहुँच गये, वो बोल रहे हैं|
नाच रहे वो, कूद रहे वो, डोल रहे हैं|
ये खाया, वो पेय पिया, वो कपड़ा पहना|
ये माता, वो बाप, भाई वो उनकी बहना|२|

राजनीति में आप, 'हेय' जिसको कहते हो|
खुद वैसे ही ढोल, बजाते क्यों रहते हो|
बीत गया अब खेल, वर्ल्ड कप जीत गये हम|
बस भी करिए यार, ताकि दम में आए दम|३|

लेकिन यार रवीश, आप जो काम कर रहे|
सही अर्थ में जर्नलिज़्म का नाम कर रहे|
पत्रकारिता यानि, ग़ूढ बातों पे चिंतन|
पत्रकारिता यानि, आम इन्साँ का जीवन|४|

रोला छंद के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

भद्रजनों की रीत नहीं ये संगाकारा

हार गए जो टॉस, किसलिए उसे नकारा|
भद्रजनों की रीत, नहीं ये संगाकारा|
देखी जब ये तुच्छ, आपकी आँख मिचौनी|
चौंक हुए स्तब्ध, जेफ क्रो, शास्त्री, धोनी|1|

तेंदुलकर, सहवाग, ना चले, फर्क पड़ा ना|
गौतम और विराट, खेल खेले मर्दाना|
धोनी लंगर डाल, क्रीज़ से चिपके डट के|
समय समय पर दर्शनीय, फटकारे फटके|2|

जब सर चढ़े जुनून, ख्वाब पूरे होते हैं|
सब के सम्मुख वीर, बालकों से रोते हैं|
दिल से लें जो ठान, फिर किसी की ना मानें|
हार मिले या जीत, धुरंधर लड़ना जानें|3|

त्र्यासी वाली बात, अब न कोई बोलेगा|
सोचेगा सौ बार, शब्द अपने तोलेगा|
अफ्रीका, इंगलेंड, पाक, औसी या लंका|
सब को दे के मात, बजाया हमने डंका|4|

छन्द - रोला

पाक दिल जीत घर गया

तेंदुलकर, सहवाग, कोहली, गौतम, माही|
रैना सँग युवराज, कामयाबी के राही|
नहरा और मुनाफ़, इक दफ़ा फिर से चमके|
भज्जी संग जहीर, खेल दिखलाया जम के|१|

हारा मेच परन्तु, पाक दिल जीत घर गया|
एक अनोखा काम, इस दफ़ा पाक कर गया|
नफ़रत का हो अंत, प्यार वाली हो बिगिनिंग|
शाहिद ने ये बोल, बिगिन कर दी न्यू ईनिंग|२|

अब अंतिम है मेच, दिल धड़कता है पल छिन|
सब के सब बेताब, हो रहे घड़ियाँ गिन गिन|
कैसा होगा मेच, सोचते हैं ये ही सब|
बोल रहे कुछ लोग, जो नहीं अब, तो फिर कब|३|

तेंदुलकर तुम श्रेष्ठ, मानता है जग सारा|
आशा तुमसे चूँकि, खास अंदाज तुम्हारा|
तुम हो क्यूँ जग-श्रेष्ठ, आज फिर से बतला दो|
मारो सौवाँ शतक, झूमने का मौका दो|४|

भारत में किरकेट, बोलता है सर चढ़ के|
सब ने किया क़ुबूल, प्रशंसा भी की बढ़ के|
अपनी तो ये राय, हार हो या फिर विक्ट्री|
खेलें ऐसा खेल, जो क़ि बन जाए हिस्ट्री|५|

छन्द : रोला
विधान ११+१३=२४ मात्रा

उफ़ ये थर्टीफर्स्टेनिया और रोला छन्द पर चर्चा

उफ़ ये थर्टीफर्स्टेनिया| हर साल आता है और गुजर जाता है| ये भी जैसे कि एक पर्व बन चुका है, होली दीवाली की तरह| अधिकतर लोगों से जुड़ा होता है ये अलग अलग स्वरूपों में|

इस बार की होली यादगार होली रही| समस्या पूर्ति मंच पर 'होली का त्यौहार' बहुत जोरदार तरीके से मना| वातायन पर भी जहाँ एक ओर हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरीशचंद्र जी की ग़ज़ल पढ़ने को मिली वहीं दुष्यंत कुमार और धर्मवीर भारती जी के बीच का ग़जलिया पत्राचार भी उन दिनों की साहित्यिक नोंक झोंक की यादें ताज़ा करा गया| ठाले बैठे पर तो लालम लाल रंग थे ही|

आप सभी ने इस होली का मज़ा कइयों गुना बढ़ा दिया| वैसे तो हम में से ज़्यादातर, अभी क्रिकेट के महाकुंभ यानि कि वर्ल्ड कप के फाइनल मेच के ख़यालों में खोए हुए हैं उस के बाद भारतीय नववर्ष / संवत्सर आ रहा है| कई सारे दफ़्तरों में तो शनि / रवि / सोम छुट्टियों वाला माहौल है| उस के बाद मंगलवार ओन्वार्ड्स हम लोग रेगयुलर लाइफ की पटरी पर लौटेंगे, मोस्ट प्रोबेबली|

लगे हाथों कुछ बातों की शुरुआत कर देते हैं| जैसा क़ि हमने पहले भी व्यक्त किया क़ि अगली समस्या पूर्ति रोला छंद पर होने वाली है सो आइए बेसिक बातों की शुरुआत करते हैं रोला छंद की, बहुत ही संक्षेप में; और सभी विद्वत्जनों से फिर से सविनय अनुरोध करते हैं क़ि वे अपने अपने आलेख [रोला छन्द पर] प्रस्तुत करने की कृपा करें| उस के बाद हम घोषणा करेंगे समस्या पूर्ति की पंक्ति की|

रोला छंद

१. चार पंक्तियों वाला होता है रोला छंद
२. रोला छन्द की हर पंक्ति दो भागों में विभक्त होती है
३. रोला छन्द की हर पंक्ति के पहले भाग में ११ मात्रा अंत में गुरु लघु [२१] या लघु लघु लघु [१११] अपेक्षित
४. रोला छन्द की हर पंक्ति के दूसरे भाग में १३ मात्रा अंत में गुरु गुरु [२२] / लघु लघु गुरु [११२] या लघु लघु लघु लघु [११११] अपेक्षित| कई सारे विद्वानों का मत है क़ि रोला की पंक्ति की समाप्ति गुरु गुरु [२२] से ही होनी चाहिए|
५. रोला छन्द की किसी भी पंक्ति की शुरुआत में लघु गुरु लघु [१२१] के प्रयोग से बचना चाहिए, इस से लय में व्यवधान उत्पन्न होता है|

रोला छन्द के कुछ उदाहरण:-

हिंद युग्म - दोहा गाथा सनातन से साभार:-:-

नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है.
२२११ ११२१=११ / १११ ११ ११ २११२ = १३
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है.
२१२१ ११ १११=११ / २१२ २२११२ = १३
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं
११२ २१ १२१=११ / २१ २२ २११२ = १३
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है.
२२११ ११२१ =११ / २१११ २२११२ = १३


शिवकाव्य.कोम से साभार:-

अतल शून्य का मौन, तोडते - कौन कहाँ तुम|
१११ २१ २ २१ = ११ / २१२ २१ १२ ११ = १३
दया करो कुछ और, न होना मौन यहाँ तुम|
१२ १२ ११ २१ = ११ / १ २२ २१ १२ ११ = १३
नव जीवन संचार, करो , फिर से तो बोलो|
११ २११ २२१ = ११ / १२ ११ २ २ २२ = १३
तृषित युगों से श्रवण, अहा अमरित फिर घोलो||
१११ १२ २ १११ = ११ / १२ १११११ ११ २२ = १३

रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी के ब्लॉग उच्चारण से साभार:-

समझो आदि न अंत, खिलेंगे सुमन मनोहर|
११२ २१ १ २१ = ११ / १२२ १११ १२११ = १३
रखना इसे सँभाल, प्यार अनमोल धरोहर|
११२ १२ १२१ = ११ / २१ ११२१ १२११ = १३


कवि श्रेष्ठ श्री मैथिली शरण गुप्त जी द्वारा रचित साकेत का द्वादश सर्ग तो रोला छन्द में ही है और उस की शुरुआती पंक्तियों पर भी एक नज़र डालते हैं:-

ढाल लेखनी सफल, अंत में मसि भी तेरी
२१ २१२ १११ = ११ / २१ २ ११ २ २२ = १२
तनिक और हो जाय, असित यह निशा अँधेरी
१११ २१ २ २१ = ११ / १११ ११ १२ १२२ = १३

इसी रोला छंद की तीसरी और चौथी पंक्तियाँ खास ध्यान देने योग्य हैं:-
ठहर तभी, क्रिश्णाभिसारिके, कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१२१२ = १६ / २११ ११ २ = ८
बढ़ संजीवनि आज, मृत्यु के गढ़ पर चढ़ जा
११ २२११ २१ = ११ / २१ २ ११ ११ ११ २ = १३

तीसरी पंक्ति में यदि यति को प्रधान्यता दी जाए तो यति आ रही है १६ मात्रा के बाद| कुल मात्रा १६+८=२४ ही हैं| परंतु यदि हम 'क्रिष्णाभिसारिके' शब्द का संधि विच्छेद करते हुए पढ़ें तो यूँ पाते हैं:-

ठहर तभी क्रिश्णाभि-सारिके कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१ = ११ / २१२ २११ ११ २ = १३

अब कुछ अपने मन से| छंद रचना को ले कर लोगों में फिर से जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से एकत्रित हो रहे हैं हम और आप यहाँ पर| हम में से कई सारे न सिर्फ़ बहुत ही सफलता से ग़ज़ल कह रहे हैं बल्कि उनकी तख्तियों को आसानी से समझ भी जाते हैं| एक्जेक्टली शायद न भी हो, पर कुछ कुछ ये नीचे दिए गये वज्ञ [काल्पनिक] भी रोला छंद लिखने में मदद कर सकते है, यथा:-

अपना तो है काम, छंद की बातें करना
फइलातुन फइलात फाइलातुन फइलातुन
२२२ २२१ = ११ / २१२२ २२२ = १३

भाषा का सौंदर्य, सदा सर चढ़ के बोले
फाईलुन मफऊलु / फईलुन फइलुन फइलुन
२२२ २२१ = ११ / १२२ २२ २२ = १३

रोला छन्द संबन्धित कुछ अन्य उदाहरणों के लिए यहाँ पर क्लिक करें :-



तख्तियों के जानकार इस बारे में और भी बहुत कुछ हम लोगों से साझा कर सकते हैं|

बहुत लंबा न खींचते हुए फिलहाल यहाँ विराम लेते हैं और इंतेज़ार करते हैं आप लोगों के विचारों का| कई सारे लोग सोनेट और रुबाई को भी रोला से जोड़ते हुए बातें करते हैं.......................................

होली के छन्द - नवीन

सभी साहित्य रसिकों का पुन: सादर अभिवादन और होली की शुभकामनाएँ

मन मलङ्ग, हुलसै हिया, दूर होंय दुख-दर्द|
सावन तिरिया झूमती, फागुन फडकै मर्द|

कहे सुने का बुरा न मानो ये होली का महीना है

पर्वों के गुलिस्तान "हिन्दुस्तान" में हर दिन कोई न कोई पर्व मनता ही रहता है| फिलहाल होली के पर्व ने माहौल को रंगीन बनाया हुआ है| पिछली बार की तरह इस बार भी होली के कुछ रंगों [दोहे, कवित्त, सवैया] के साथ आपके सामने उपस्थित हूँ|

नोक-झोङ्क भरी बातचीत – 1 [दोहे]

नायक:-
नीले, पीले, बेञ्जनी; हरे, गुलाबी लाल|
इन्द्र-धनुष के बाप हैं, गोरी तेरे गाल||

नायिका:-
रङ्गों की परवा न कर, देख दिलों दे हाल|
मैं भी लालम लाल हूँ, तू भी लालम लाल||

नायक:-
होली का त्यौहार है, कर न इसे बेरङ्ग|
साफ़ी को कस के पकड़, आ छनवा ले भङ्ग||

नायिका:-
होली के त्यौहार का, जमा हुआ है रङ्ग|
छन आएगी बाद में, घुट तो जाए भङ्ग||


नोक झोंक भरी बातचीत - २

नायक:-
गोरे गोरे गालन पे मलिहों गुलाल लाल,
कोरन में सजनी अबीर भर डारिहों|

सारी रँग दैहों सारी, मार पिचकारी, प्यारी,
अङ्ग-अङ्ग रँग जाय, ऐसें पिचकारिहों|

अँगिया, चुनर, नीबी, सुपरि भिगोय डारों,
जो तू रूठ जैहै, हौलें-हौलें पुचकारिहों|

अब कें फगुनवा में कहें दैहों छाती ठोक,
राज़ी सों नहीं तौ जोरदारी कर डारिहों||
[घनाक्षरी]

नायिका [अ]:-
फूले फूले गाल मेरे पिचकाय डारे और
अङ्गन में रङ्गन की जङ्ग सी लगाय दई

अँगिया कों छोड़ तू तौ सारी हू न रँग पायौ
अच्छे-खासे जोबन की कुगत बनाय दई

बड़ी-बड़ी बातें करीं, सपने दिखाये ढेर
शेर जहाँ बिठानौ हो बकरी बिठाय दई

नेङ्क हाथ लगते ही फूट गयी पिचकारी
ख़ैर ही मनाय तेरी इज्ज़त बचाय दई
[घनाक्षरी]

नायिका [ब]:-
पिय गाल बजाबन बन्द करौ, अरु ढीली करौ हठधर्म की डोरी
ढप-ढ़ोल-मृदङ्ग बजाए घने, झनकाउ अबै हिय-झाँझर मोरी
अधरामृत रङ्गन सों लबरेज़ तकौ तौ कबू यै निगाह निगोरी
इक फाग की राह कहा तकनी, तुमें बारहों मास खिलावहुं होरी
[सुन्दरी सवैया]


साँवरे ने होरी में बावरी सी कर डारी

नैनन सों बात कही चितचोर छलिया नें,
मुसकाय, उकसाय - बोल कें - सुकुमारी|
कमल-गुलाबन सी उपमा दईं तमाम,
माखन-मिसरी-मीठी-मादक-मनोहारी|
होरी कौ निमंत्रण पठायौ ललिता के संग,
खोर साँकरी गई इकल्ली, मो मती मारी|
देख कें अकेली मोय, प्रेम रंग में डुबोय,
साँवरे ने होरी में बावरी सी कर डारी||
[कवित्त]

साँची ही सुनी है बीर महिमा महन्तन की

इत कूँ बसन्त बीत्यौ, उत कूँ बौरायौ कन्त
सन्त भूल्यौ सन्तई कूँ मन्तर पढ्यौ भारी

पाय कें इकन्त मो सूँ बोल्यौ रति-कन्त कीट
खूब है गढ़न्त तेरे अङ्गन की हो प्यारी

तदनन्तर ह्वै गयौ मतिवन्त – रति वन्त
करि कें अनन्त यत्न बावरी कर डारी

साँची ही सुनी है बीर महिमा महन्तन की
साल भर ब्रह्मचारी, फागुन में लाचारी
[कवित्त]

लट्ठ खाय गोरिन सों घर लौट आमें हैं

महीना पच्चीस दिन दूध-घी उड़ामें और  
जाय कें अखाडें दण्ड-बैठक लगामें हैं|
 
मूछन पे ताव दै कें जङ्घन पे ताल दै कें
नुक्कड़-अथाँइन पे गाल हू बजामें हैं|
 
पिछले बरस बारौ बदलौ चुकामनौ है,
पूछ मत कैसी-कैसी योजना बनामें हैं|
 
लेकिन बिचारे बीर बरसाने पौंचते ही,
लट्ठ खाय गोरिन सों घर लौट आमें हैं||
[घनाक्षरी]


खुशियों का स्वागत करे, हर आँगन हर द्वार|

कुछ ऐसा हो इस बरस, होली का त्यौहार||

दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - शेषधर तिवारी, राकेश तिवारी [१३-१४]


सभी साहित्य रसिकों का पुन:सादर अभिवादन और धूल [रंग वाली होली] की शुभकामनाएँ

इस बार हम एक नहीं दो दो तिवारी बन्धुओं के दोहे पढ़ते हैं|


SheshDhar Tiwari

जली होलिका प्रे की, भस्म हुए संस्कार|
नफरत के रंगों रँगा, होली का त्यौहार||

मर्यादा सूली चढी, स्वार्थ सिद्धि ही धर्म|
होली में स्वाहा हुए, दया प्रीति सत्कर्म||

रहे कभी
संयुक्त अब, एकल हैं परिवार|
होली में भी अब कहाँ, जुड़ते हैं घर चार||

तन रंगे क्या होत है, मन रंगे तो जान|
राधा के कानन पड़े, बस मुरली की तान||

गालों पे लाली चढी, होठ गुलाबी होत|
कान्हा तुमने कौन विधि, रंग दियो है पोत||

जदुराई के अंग लगि, राधा सिमटत जात|
ज्यूँ लजात है हाँथ लगि, छुई मुई के पात||

मन मलीन, काया कलुष,
वाणी विष, उर घात|
इनसे बच कर जो मिले, वह जीवन सौगात||

इन्द्र धनुष सा ही रहे, जीवन ये सतरंग|
बिगड़े तो फिर फिर बने, मित्र रहें जो संग||

कान्हा के जब भी बढ़ें, हस्त कलश की ओर|
इत उत देखे राधिका, चले कोऊ जोर||

कान्हा गैया थन पकरि, जो मुह दीनी धार|
राधा अंखियाँ मीचती, करती मातु पुकार|१०|

जसुमति देखें ओट ते, लीला हरि की जान|
नैनन को शीतल रन, कानन कीन्ही दान|११|

राधा के तन जो पडी, धवल प्रीति की धार|
सभी मनाते कह इसे, होली का
त्यौहा|१२|
:- शेषधर तिवारी

विविध रंगों से रँगे इंद्रधनुषी दोहे हैं ये| सामजिक सरोकार, गाय के तन से सीधा दूध का पीना, कलश वाला दोहावाह तिवारी जी वाह| आज के दिन को और भी रंगीन कर दिया आपके दोहों ने| ख़ासकर संयुक्त और एकलपरिवार वाले दोहे ने तो विशेष रूप से प्रभावित किया है|

Rakesh Tewari

ऋतु आई ऐसी भली, हवा बसै रसधार|
शीत ऋतू चलती भई, आइ वसंत बहार|१|

बगियन झूलै मंजरी, फूल चढाए चाप|
विजयशाल ठनकन लगे, मदन चलें चुपचाप|२|

ठंडाई माथे चढी, चढ़े नैन रतनार|
विचरें दूजे लोक में, बिसरा यह संसार|३|

हरसिँगार-टेसू मिला, रंग किये तैयार|
उनमें मिले गुलाब जल, होली का त्यौहार|४|

लाल गुलाबी बैंगनी, उडै अबीर गुलाल|
भीगे हैं सब रंग में, अधर हो गए लाल|५|

बहुतै दिन रूठे रहे, पाले मन में रार|
रंग-राग में धुल गई, सारी अबकी बार|६|

तन-मन तर भए रंग में, उस होली में यार|
परब बरस गाढे परत, पहले से चटकार|७|

होली में फिर दिख गई, तेरी छवि इक बार|
अंतर्मन झंकृत हुआ, झन झन करते तार|८|

सारा आलम रंगमय, छोट-बूढ़ नर-नार|
जग से न्यारा एक है, होली का त्यौहार|९|

अजीब इत्तेफ़ाक है इस समस्या पूर्ति के पहले चक्र में पधारी निर्मला जी ने जीवन में पहली बार दोहे लिखे हैं| बकौल पंकज सुबीर - उन के लिए भी यह पहला ही मौका है| और अब राकेश भाई के अनुसार वो भी पहली बार ही दोहे लिख रहे हैं| इस से बड़ी खुशी की बात और क्या होगी| आप लोगों का छन्दों के प्रति रुझान देखते हुए लगता है कि आयोजन सही दिशा में जा रहा है| राकेश भाई आप ने वाकई गजब के दोहे लिखे हैं| बहुत बहुत बधाई|

दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - मयंक अवस्थी, रविकान्‍त पाण्‍डेय, शेखर चतुर्वेदी [१०-११-१२]

सभी साहित्य रसिकों का पुन: सादर अभिवादन और होली की शुभकामनाएँ

दोहा छन्‍द पर आधारित दूसरी समस्या पूर्ति के पाँचवे सत्र में आप सभी का सहृदय स्वागत है|

Mayank Awasthi

रंग-भंग-हुड़दंग सँग, हास-रास-श्रिंगार|
क्या-क्या ले कर आ गया, होली का त्यौहार|१|

सब के रँग में रँग सभी, गये इस तरह डूब|
आज विविधता में हमें, दिखी एकता खूब|२|

तेरे रँग में रँग गया, आज अंग प्रत्यंग|
और पृथकता घुल गई, अपनेपन के संग|३|

भाई मयंक अवस्थी जी ने चौपाई छन्‍द पर आधारित पहली समस्या पूर्ति में भी मनभावन चौपाइयाँ प्रस्तुत की थीं और इस बार भी उन्होने अपनी कलम की जादूगरी से हमें मंत्र मुग्ध कर दिया है| ग़ज़ल में महारत रखने वाले मयंक भाई की छन्‍दों पर पकड़ उन के ज्ञान और अनुभव का जीता जागता उदाहरण है|


होली में रितुराज ने किया धरा को तंग|
अंग-अंग पर मल दिया धानी-धानी रंग|१|

नदी पार था चूमता, सूर्य धरा के गाल|
लहरों ने टोका तभी, हुआ शर्म से लाल|२|

सरसों ने पहना दिया, पीत पुष्प परिधान|
धरती दुल्हन सी सजी, कोयल गाये गान|३|

बने प्रीत खुद गोपिका, मन हो नंद-कुमार|
उर-अंतर प्रतिक्षण मने, होली का त्यौहार|४|

फागुन आया, प्रीत की, रिमझिम पड़े फ़ुहार|
नस-नस में उठने लगा, दिव्य प्रेम का ज्वार|5|

'पी' सम्मुख हैं सुंदरी, कर ले पूरन काज|
कंठहार-सी लग गले, छोड़ जगत की लाज|6|

रविकान्‍त जी ने तो होली की जो अद्भुत छटा दिखलाई है हमें, उस की जितनी तारीफ की जाए, कम ही है| प्रकृति की होली के इस बेशक़ीमती नज़ारे ने इस मंच को और भी अधिक गरिमा प्रदान की है| दिल से यही आवाज़ आ रही है दोस्त कि माँ शारदा आप पर सदा मेहरबान रहें|



भंग रंग आनंद मय, होली का त्यौहार|
ब्रज भूमि की देखिये, आनंद छटा अपार|१|

सन्मुख राजाधिराज के, ढप ढोलक की थाप|
रंगों में मन डूब के, कर मन हरि का जाप|२|

ब्रजवासिन के संग में, नटवर नन्द किशोर|
भक्ति प्रेम का अमिट रँग, बरस रहा चहुँ ओर|३|

मन के कलुष मिटाय के, जीवन कर साकार|
बड़े भाग्य से आत है, होली सा त्यौहार|४|


इस सत्र के तीसरे कवि हैं शेखर चतुर्वेदी| शेखर भाई आपने मथुरा की द्वारिकाधीश [राजाधिराज] जी के साक्षात दर्शन करा दिए| छन्‍द साहित्य के प्रति आप का रुझान इस बार भी प्रभावित करने में सक्षम रहा है| इन के जैसे और भी कवियों / कवियत्रियों को इस मंच से जुड़ना चाहिए|

अगली पोस्ट में मिलेगे कुछ और कवियों के साथ| तब तक आप इन दोहों के रंगों में सराबोर हो कर होली का आनंद लीजिए और अपने टिप्पणी रूपी पुष्पों की वर्षा कीजिए||

आप सभी को रंगों के इस महापर्व की ढेरों बधाइयाँ|

खुशियों का स्वागत करे, हर आँगन हर द्वार|
कुछ ऐसा हो इस बरस, होली का त्यौहार||

कोई लेखक किसी भी क़ौम का चेहरा नहीं होता - नवीन

हमें एक दूसरे से गर गिला शिक़वा नहीं होता
तो अंग्रेजों ने हम को इस क़दर बाँटा नहीं होता



नयों को हौसला भी दो, न ढूँढो ख़ामियाँ केवल
बड़े शाइर का भी हर इक बयाँ आला नहीं होता



हज़ारों साल पहले CCTV आ गई होती
अगर शकुनी युधिष्ठिर से जुआ खेला नहीं होता



अदब से पेश आना चाहिए साहित्य में सबको
कोई लेखक किसी भी क़ौम का चेहरा नहीं होता



ज़रा समझो कि 'कॉरपोरेट' भी कहने लगा है अब
गृहस्थी से जुड़ा इन्सान लापरवा' नहीं होता