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रूचि हो जो राजनीति में तो लड़िये चुनाव

घर-द्वार, परिवार से बड़ी न जीत हार,
स्वीकार या अस्वीकार, संस्कार निभाइए.

सोते जागते हमेशा, आबरू का ध्यान रखें,
आबरू के लिए सब कुछ ही लुटाइए.

धरती पे रहें  पाँव, खेलें न कदापि दाँव,
धूप हो या छाँव, काँव-काँव न सुनाइये.

रूचि हो जो राजनीति में तो लड़िये चुनाव,
राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये. 



समस्या पूर्ति मंच द्वारा घनाक्षरी छन्द पर आयोजित आयोजन के दौरान लिखा था इसे.  प्रकाशित अब कर रहा हूँ.

बनिए जो आगेवान, काम करिए महान

बात-बात पे बहस, करे तहस नहस,
बात करिए सरस, कस के न बोलिए|

मन में रहे न बैर, तो सदा रहेगी खैर,
अपना हो या कि गैर, गुण ही टटोलिए|

छोड़ के बुराइयों को, जोड़ के भलाइयों को
ओढ़ के बधाइयों को, फूले-फूले डोलिए|

बनिए जो आगेवान, काम करिए महान
तारीफ करें सुजान, ऐसी राह खोलिए||

शब्दार्थ:-
आगेवान = नेतृत्व करने वाला / वाले
सुजान - बुद्धिमान व्यक्ति / सज्जन

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रस-छंद-अलंकार के प्रेमियों के हितार्थ:-

यह अनुप्रास अलंकार युक्त घनाक्षरी छन्द है|
छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास, लाटानुप्रास, अन्त्यानुप्रास तथा श्रुत्यानुप्रास
ये पांच भेद हैं अनुप्रास अलंकार के और ये पाँचो के पाँचो प्रकार
इस एक ही छंद में मौजूद हैं|
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३ घनाक्षरी / कवित्त छन्द

समस्या पूर्ति मंच द्वारा आयोजित घनाक्षरी छंद सम्बंधित समस्या पूर्ति के लिए लिखे गए तीन घनाक्षरी छंद 


हिंदी 

माना कि विकास, बीज - से ही होता है मगर
इस का प्रयोग किए- बिना, बीज फले ना|

इस में मिठास हो तो, अमृत समान लगे
खारापन हो अगर, फिर दाल गले ना|

इस का प्रवाह भला कौन रोक पाया बोलो
इस का महत्व भैया टाले से भी टले ना|

चाहे इसे पानी कहो, चाहे इसे ज्ञान कहो
सार तो यही है यार 'नार' बिन चले ना||


समस्या पूर्ति मंच पर की घनाक्षरी छंद वाली समापन पोस्ट में प्रकाशित मेरे दो छन्द 

गुजराती

ઢોકળાં-ખમણ, ભૂંસું, ચેવડા મસાલેદાર,
ફાફડા, ઘારી, જલેબી-ગાંઠિયા પ્રસિદ્ધ છે.

પેંડા તો મલાઈદાર, ઘેરદાર ઘાંઘરો, ને-
કાઠિયાવાડી પાટલા-સાતિયા પ્રસિદ્ધ છે.

કૉક જગ્યા માયાવતી, સોનિયા, જયલલિતા,
કૉક જગ્યા ટાટા વાણી રાડિયા પ્રસિદ્ધ છે.

પણ આખી દુનિયા માં જેમનું પ્રતાપ, ઍ તો,
ગુજરાતી ગરવા ને ડાંડિયા પ્રસિદ્ધ છૅ

देवनागरी लिपि के साथ

ढोकला-खमण, भुसू, चेवडा मसालेदार,
फाफडा, धारी, जलेबी-गांठिया प्रसिद्ध छे|

पेंडा तो मलाईदार, घेरदार घांघरो, ने-
काठियावाडी पाटला-सातिया प्रसिद्ध छे|

कोक जग्या मायावती, सोनिया, जय-ललिता,
कोक जग्या टाटा वाणी राडिया प्रसिद्ध छे|  

पण आखी दुनिया मां जेमनुं प्रताप, ए तो,
गुजराती गरवा ने डांडिया प्रसिद्ध छे||

[इस गुजराती छंद में मदद स्वरूप भाई पंकज त्रिवेदी जी का आभार]


मराठी

भारतात दुसरा शहेर आहे कोण असा,
जागृत चौवीस तास ज्याची पहिचान हो|  

कुठल्याही भागातून, आला इथे जे इसम,
इकडच्या कायमी तो झाला इनसान हो|  

देशातील सर्वाधिक राजस्व च्या मानकरी,  
जगातील रुचिकर कारोबारी स्थान हो|

छोटी-मोठी घटना बिघाड काय करणार,
मी मुंबईकर, माझा मुंबई महान हो||

सरलार्थ

भारत में ऐसा दुसरा कौन सा शहर है
जिसे कभी न सोने वाले शहर की पहिचान हासिल हो  

किसी भी कोने से यहाँ जो भी इन्सान आता है
वो हमेशा के लिये यहाँ का हो जाता है  

देश में सब से ज्यादा राजस्व भरने का गौरव हासिल है इसे  
दुनिया का पसन्दीदा कारोबारी स्थान है

छोटी-मोटी घटना क्या बिगाड लेंगी  
मैं मुंबईकर हूं, मेरा शहर मुंबई महान है

घनाक्षरी छन्द - षडऋतु वर्णन - गरमी की लू जमाती 'लप्पड़' करारा सा

पावस में नाचता है, तन-मन तक-धिन,
शरद का चंद्र लगे, सबको दुलारा सा|

हेमन्त खिलाये गुड - संग बाजरे की रोटी,
शिशिर में पानी लगे, हिमनद धारा सा|

वसंत की ऋतु है जो, कहें उसे ऋतुराज,
धरती की माँग बीच, लगे ये सितारा सा|

हापुस खिलाने हमें, गरमी आती है पर,
गरमी की लू जमाती - 'लप्पड़' करारा सा||




ऋतु क्रम इस प्रकार होता है:-
वसंत
ग्रीष्म
वर्षा
शरद
शिशिर
हेमन्
छन्द की अंतिम पंक्ति के मद्देनजर, उपरोक्त छन्द में, ऋतु क्रम निर्वाह को प्राथमिकता नहीं दी गई है|

इस छन्द को आप १६+१५ = ३१ या ८+८+८+७=३१ अक्षर गणना के अनुसार ले सकते हैं|

घनाक्षरी छन्द - गौना भला शीत का

विद्या वो भली है जो हो क्षमता के अनुसार,
मान व सम्मान भला लगे सद-रीत का|

रिश्ते हों या नाते सभी, सीमा तक लगें भले,
गायन रसीला भला, भव-हित गीत का|

शूरता लगे है भली समय की 'कविदास',
उम्र की जवानी भली, संग सच्चे मीत का|

श्रद्धा वाली भक्ति भली, सम्भव विरक्ति भली,
रोना भला मौके का व गौना भला शीत का||


समस्या पूर्ति मंच पर आगामी समस्या पूर्ति के मद्देनजर, अपने अग्रजों के परामर्श के अनुसार, अपने एक पुराने ब्रज भाषा के छन्द को हिन्दी में परिवर्तित करते हुए - अक्षर गणना विधान के एक और उदाहरण के तौर पर इसे यहाँ प्रस्तुत किया गया है| यह अक्षर गणना घनाक्षरी छन्द के प्रचलित आधुनिक प्रारूप [फॉर्मेट] के मुताबिक है:-


विद्या वो भली है जो हो
११ १ ११ १ १ १ = ८
क्षमता के अनुसार,
१११ १ ११११ = ८
मान व सम्मान भला
११ १ १११ ११ = ८
लगे सद-रीत का|
११ ११ ११ १ = ७
रिश्ते हों या नाते सभी,
११ १ १ ११ ११ = ८
सीमा तक लगें भले,
११ ११ ११ ११ = ८
गायन रसीला भला,
१११ १११ ११ = ८
भव-हित गीत का|
११ ११ ११ १ = ७
शूरता लगे है भली
१११ ११ १ ११ = ८
समय की 'कविदास',
१११ १ ११११ = ८
उम्र की जवानी भली,
११ १ १११ ११ = ८
संग सच्चे मीत का|
११ ११ ११ १ = ७
श्रद्धा वाली भक्ति भली,
११ ११ ११ ११ = ८
सम्भव विरक्ति भली,
१११ १११ ११ = ८
रोना भला मौके का व
११ ११ ११ १ १ = ८
गौना भला शीत का||
११ ११ ११ १ = ७

गौना - गवना -
ज़्यादातर लोगों को पता होगा कि पहले समय में विवाह के बाद कन्या कि विदाई नहीं होती थी| कुछ सालों बाद जब लड़का योग्य हो जाता, तब लड़की को उस के ससुराल गृहस्थ जीवन जीने के लिए भेजा जाता था| उस विदाई को ही हमारे यहाँ मथुरा में गौना यानि कि गवना कहते हैं|
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इस छन्द को वर्तमान दौर में आदरणीय सोम ठाकुर जी ने प्रचुर मात्र में लिखा और बोला / गाया है| आज कल कवि सम्मेलनों में भी इस छन्द की धूम रहती है|
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आचार्य सलिल जी के परामर्श के अनुसार इस छन्द के दूसरे चरण के पहले अर्ध भाग में थोड़ा सुधार किया है:-

पहले यूँ था:-
मान व सम्मान भी भ-
-ला है सद-रीत का

अब यूँ है:-
मान व सम्मान भला
लगे सद-रीत का
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आदरणीय तिलक भाई साब अपनी आवाज़ में इस छन्द की एक ऑडियो क्लिप यहीं इस पोस्ट पर लगाने वाले हैं, जिस से इस छन्द की रचना और गेयता को समझने में हमें और भी सुविधा होगी|

राम नवमी की शुभकामनायें

SHRI RAM


सभी साहित्य रसिकों को आज के पावन पर्व 'राम नवमी' की हार्दिक शुभ कामनाएँ|

हिन्दू धर्म के परम आराध्य देव, हमारे मन मन्दिर में सदा ही निवास करने वाले ऐसे मर्यादा पृरुषोत्तम भगवान श्री राम जी की अद्भुत लीला को जो यह बाल मन समझ पाया है, उसे शब्दाङ्कित करने का प्रयास किया है|

चौदह बरस वनवास स्वीकार कर के
वन-वन भटके जो वनवासी वेश में

अङ्गद-सुग्रीव-जामवन्त #जैसे दिग्गजों के-
साथ तालमेल, साध ले जो परदेश में

सुनिये 'नवीन'- लोक भावना को मान दे के,
प्राण प्रिय जानकी को, त्याग* दे निमेष में

ऐसे जनवादी-लोक हितकारी राम जी की,
फिर से ज़रूरत है आज इस देश में

छन्द:- घनाक्षरी कवित्त [इसे वृत्त के रूप में भी मान्यता प्राप्त है]

#एक यशस्वी राजा की प्रतापी सन्तान का पारिवारिक सुख शान्ति के लिए वनवास स्वीकार करना, वन में कई कष्टों को झेलना| वहाँ कई लोगों के कल्याण के लिए काम भी करना| वहीं मोह के वशीभूत हो कर उन की पत्नी का हरण हो जाना| पत्नी को ढूँढने के क्रम में एक मानव का वानर प्रजाति से गठबन्ध करना............................... भगवान श्री राम जी ने अपने जीवन के द्वारा हमारे लिए अनगिनत ऐसे उदाहरण उपस्थित किए हैं कि यदि गहनता से उन का अध्ययन किया जाए तो जीवन के कई क्लिष्ट क्लेशों का सहजता से हल प्राप्त किया जा सकता है|


* यहाँ मेरा तात्पर्य है कि जो व्यक्ति जन नायक है उसे जन भावना का सम्मान करते हुए अपनी सब से प्रिय वस्तु को त्यागने के लिए भी तत्पर रहना चाहिए, जो कि आज के तथाकथित जन-नायकों में दिखती ही नहीं है| यह घटना एक प्रतीक मात्र है, इसे नारी कल्याण से जोड़ कर देखने का कष्ट न करें|

यमुना

SHRI YAMUNA JI

आज यमुना छठ है यानि यमुना जी का जन्म दिवस| हम मथुरास्थ माथुर चतुर्वेदी यमुना पुत्र कहे जाते हैं| तो अपनी माँ यमुना महारानी के चरण कमलों में श्रद्धा सुमन स्वरूप कुछ छन्द अर्पित करता हूँ:-


सूरज की तनया हौ, जम की बहन आप
माथुर मुनीसन की मातु हौ सुहासिनी

ब्रज की बसुन्धरा कों, आपनें कृतार्थ कियौ
स्याम जू की स्यामा, प्रेम पुञ्ज की प्रकासिनी

चौदह भुवन माँहि आपको प्रताप, तीनों -
लोकन में आप भक्ति भाव की बिकासिनी

छूटें जम-फन्द, मिटें द्वन्द औ अनन्द रहें
आप की कृपा सों श्री जमने कलि-नासिनी



मोहन की मुरली की मधुरता सी मधुर,
स्याम-बर्न सान्त-चित्त बारी श्री जमुना जी

रसिक सिरोमनि के रङ्ग रँगी सहचरी,
सदा स्याम ज़ू कों सुभकारी श्री जमुना जी

नटखट कन्हैया के पाँइन पखारिबे कों,
गिरिबर कलिन्द सों पधारीं श्री यमुना जी

सर्ब-सुखकारी, दुख-दर्द-कष्ट हारी, नँद-
नन्द जू कों प्यारी हैं हमारी श्री यमुना जी



कूड़ा करकट नहीं मैला तलछट नहीं
साफ़-सुथरा चमकदार तल चाहिये

यमुना को मुद्दा नहीं जमना-मैया जो कहें
सुनवाई में ‘नवीन’ ऐसे दल चाहिये

किसी से भी पूछ लीजै सारे ही कहेंगे यही
अब और वादे नहीं बस हल चाहिये

मोहन की मुरली की मीठी-मीठी तान जैसा
मधुर-मधुर यमुना में जल चाहिये


नम: कृष्ण तुर्य प्रियाम

होली के छन्द - नवीन

सभी साहित्य रसिकों का पुन: सादर अभिवादन और होली की शुभकामनाएँ

मन मलङ्ग, हुलसै हिया, दूर होंय दुख-दर्द|
सावन तिरिया झूमती, फागुन फडकै मर्द|

कहे सुने का बुरा न मानो ये होली का महीना है

पर्वों के गुलिस्तान "हिन्दुस्तान" में हर दिन कोई न कोई पर्व मनता ही रहता है| फिलहाल होली के पर्व ने माहौल को रंगीन बनाया हुआ है| पिछली बार की तरह इस बार भी होली के कुछ रंगों [दोहे, कवित्त, सवैया] के साथ आपके सामने उपस्थित हूँ|

नोक-झोङ्क भरी बातचीत – 1 [दोहे]

नायक:-
नीले, पीले, बेञ्जनी; हरे, गुलाबी लाल|
इन्द्र-धनुष के बाप हैं, गोरी तेरे गाल||

नायिका:-
रङ्गों की परवा’ न कर, देख दिलों दे हाल|
मैं भी लालम लाल हूँ, तू भी लालम लाल||

नायक:-
होली का त्यौहार है, कर न इसे बेरङ्ग|
साफ़ी को कस के पकड़, आ छनवा ले भङ्ग||

नायिका:-
होली के त्यौहार का, जमा हुआ है रङ्ग|
छन आएगी बाद में, घुट तो जाए भङ्ग||


नोक झोंक भरी बातचीत - २

नायक:-
गोरे गोरे गालन पे मलिहों गुलाल लाल,
कोरन में सजनी अबीर भर डारिहों|

सारी रँग दैहों सारी, मार पिचकारी, प्यारी,
अङ्ग-अङ्ग रँग जाय, ऐसें पिचकारिहों|

अँगिया, चुनर, नीबी, सुपरि भिगोय डारों,
जो तू रूठ जैहै, हौलें-हौलें पुचकारिहों|

अब कें फगुनवा में कहें दैहों छाती ठोक,
राज़ी सों नहीं तौ जोरदारी कर डारिहों||
[घनाक्षरी]

नायिका [अ]:-
फूले फूले गाल मेरे पिचकाय डारे और
अङ्गन में रङ्गन की जङ्ग सी लगाय दई

अँगिया कों छोड़ तू तौ सारी हू न रँग पायौ
अच्छे-खासे जोबन की कुगत बनाय दई

बड़ी-बड़ी बातें करीं, सपने दिखाये ढेर
शेर जहाँ बिठानौ हो बकरी बिठाय दई

नेङ्क हाथ लगते ही फूट गयी पिचकारी
ख़ैर ही मनाय तेरी इज्ज़त बचाय दई
[घनाक्षरी]

नायिका [ब]:-
पिय गाल बजाबन बन्द करौ, अरु ढीली करौ हठधर्म की डोरी
ढप-ढ़ोल-मृदङ्ग बजाए घने, झनकाउ अबै हिय-झाँझर मोरी
अधरामृत रङ्गन सों लबरेज़ तकौ तौ कबू यै निगाह निगोरी
इक फाग की राह कहा तकनी, तुमें बारहों मास खिलावहुं होरी
[सुन्दरी सवैया]


साँवरे ने होरी में बावरी सी कर डारी

नैनन सों बात कही चितचोर छलिया नें,
मुसकाय, उकसाय - बोल कें - सुकुमारी|
कमल-गुलाबन सी उपमा दईं तमाम,
माखन-मिसरी-मीठी-मादक-मनोहारी|
होरी कौ निमंत्रण पठायौ ललिता के संग,
खोर साँकरी गई इकल्ली, मो मती मारी|
देख कें अकेली मोय, प्रेम रंग में डुबोय,
साँवरे ने होरी में बावरी सी कर डारी||
[कवित्त]

साँची ही सुनी है बीर महिमा महन्तन की

इत कूँ बसन्त बीत्यौ, उत कूँ बौरायौ कन्त
सन्त भूल्यौ सन्तई कूँ मन्तर पढ्यौ भारी

पाय कें इकन्त मो सूँ बोल्यौ रति-कन्त कीट
खूब है गढ़न्त तेरे अङ्गन की हो प्यारी

तदनन्तर ह्वै गयौ मतिवन्त – रति वन्त
करि कें अनन्त यत्न बावरी कर डारी

साँची ही सुनी है बीर महिमा महन्तन की
साल भर ब्रह्मचारी, फागुन में लाचारी
[कवित्त]

लट्ठ खाय गोरिन सों घर लौट आमें हैं

महीना पच्चीस दिन दूध-घी उड़ामें और  
जाय कें अखाडें दण्ड-बैठक लगामें हैं|
 
मूछन पे ताव दै कें जङ्घन पे ताल दै कें
नुक्कड़-अथाँइन पे गाल हू बजामें हैं|
 
पिछले बरस बारौ बदलौ चुकामनौ है,
पूछ मत कैसी-कैसी योजना बनामें हैं|
 
लेकिन बिचारे बीर बरसाने पौंचते ही,
लट्ठ खाय गोरिन सों घर लौट आमें हैं||
[घनाक्षरी]


खुशियों का स्वागत करे, हर आँगन हर द्वार|

कुछ ऐसा हो इस बरस, होली का त्यौहार||

बरसाने की लठामार होली

महीना पच्चीस दिन दूध-घी उड़ामें और  
जाय कें अखाडें दण्ड-बैठक लगामें हैं|
 
मूछन पे ताव दै कें जङ्घन पे ताल दै कें
नुक्कड़-अथाँइन पे गाल हू बजामें हैं|
 
पिछले बरस बारौ बदलौ चुकामनौ है,
पूछ मत कैसी-कैसी योजना बनामें हैं|
 
लेकिन बिचारे बीर बरसाने पौंचते ही,
लट्ठ खाय गोपिन सों घर लौट आमें हैं||

ढूँढ के छली को पेश कीजे दरबार में

आज सपने में ललिता ने ये दिया हुकुम,
ढूँढ के छली को पेश कीजे दरबार में|

दिलों को दुखाने की मिलेगी सज़ा उसे आज,
जुर्म इकबाल होगा अदालतेप्यार में|

प्रेम का कनून तोड़ा, राधा जी से मुँह मोड़ा,
बख्शा न जाएगा वो, छपा दो अख़बार में|

सभी जगा ढूँढा, पर, मिला नहीं श्याम, चूँकि-
बैठा था वो तो छुप के दिलेसरकार में||

[घनाक्षरी कवित्त]

कोई तो बताए कि ये कैसा लोकतंत्र है

सुखियों को और सुखी करने की है जुगाड़
दुखियों को और दुखी करने का मंत्र है|

खुलेआम लूटपाट करने का लाइसेंस
जन-धन हरने का स्व-चालित यंत्र है|

जेल [jail] वाला बेल [bail] वाला हर एक नागरिक
इलेक्शन लड़ने का जहाँ पे स्वतंत्र है|

लोकपाल जहाँ करे गोलमाल दे धमाल
कोई तो बताए कि ये कैसा लोकतंत्र है||

घनाक्षरी कवित्त - ब्रजभाषा में कवित्त - राजा होय चोर तो?

समाधान औसधि है - रोग के निवारन कों,
पे औसधि के रोग कों, औसधि कहा दीजिए?

धर्म की सुरच्छा हेतु नीति हैं अनेक किन्तु,
नीति की अनीतिता पे नीति कौन छीजिये?

भने 'कविदास' जो पे ब्याधी होइ सान्त, तो पे,
भर भर घूँट खूब बिस कों हू पीजिये!

चोर करे चोरी तो सुनावे सज़ा राजा, किन्तु,
राजा होय चोर, तो हवाल कौने कीजिए?

सावन के झूला का छन्द

ब्रजभाषा, घनाक्षरी छन्द

JHULA, RADHA KRISHN


 परम पुनीत, नीक, देह बगिया के बीच,
जोबन कौ ब्रिच्छ, कन-कन रस भीनों है|


ब्रिच्छ पै सनेह साख, साखन पै प्रीत-पात,
पातन कों छुऐ वात आनँद नवीनों है|


छोह की 'नवीन' डोर, फन्द नैन सैनन के,
झूलन के हेतु पाट हिरदे कों कीनों है।


देर न लगाओ अब झूलन पधारो बेगि,
राधिका लली नें श्याम झूला डार लीनों है||

करती हैं सब से ही, प्यार वीणा वादिनी


शब्द सागर मैं, स्वर पद्म पर विराजमान,
साजों का करती हैं, शृंगार वीणा वादिनी|

सरगम माध्यम से, लोगों के तन मन मैं,
करती आनन्द का, संचार वीणा वादिनी|

रागों की रिमझिम मैं, थापों की थिरकन पे,
नृत्य नाटिका का हैं, संसार वीणा वादिनी|

सदबुद्धि देती हैं औ, कुमति हर लेती हैं,
करती हैं सब से ही, प्यार वीणा वादिनी||