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एक उत्कृष्ट छान्दसिक प्रयोग - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'


छंदों पर पहले बहुत प्रयोग होते थे। परमादरणीय प्रातः-स्मरणीय काव्य-गुरु कविरत्न श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी ‘प्रीतम’ जी का एक अनूठा प्रयोग पढ़िएगा । इस प्रयोग में कवि ने ‘श्री स्वामी हरिदास जी’ इस वाक्य को ले कर प्रयोग किया है। 26 मात्रिक इस साधारण छन्द में कवि ने एक-एक अक्षर को एक-एक पंक्ति समर्पित की है। प्रत्येक पंक्ति जिस अक्षर से आरम्भ हो रही है उसी अक्षर पर उस पंक्ति का समापन भी हो रहा है। उदाहरणार्थ वाक्य’श्री स्वामी हरिदास जी’ का प्रथम अक्षर है ‘श्री’। छन्द की पहली पंक्ति के आरम्भ एवं अंत में इस अक्षर यानि ‘श्री को रखा गया है। आनन्द लीजिये।

श्री - स्यामा रस दान दियौ पाई तब निधि -श्री
स्वा - गत तब तिन कियों निरख छवि बीसौ बि -स्वा
मी - ठौ या ते और न कछु है अन्तरया - मी
ह - र दिन पल छिन निरत रहत रस ही पै सुख ल -ह
रि - स मुनि जाकौ पार न पायौ व्रत तप करि क -रि
दा- मन लीनों थाम बसे हिय स्याम सर्व -दा
स- रबस रस में रँगे पगे रस ही में सरब -स
जी - वन धन सर्वस्व प्राण बिहारिन हैं -जी
§   
इस दूसरे छन्द में अष्टाक्षरी का और भी सुन्दर प्रयोग है। छन्द की पहली पंक्ति अष्टाक्षरी के प्रथम अक्षर से आरम्भ एवम् अष्टाक्षरी के अन्तिम अक्षर पर समाप्त होती है। यानि आठ पंक्तियों वाले इस छन्द के आरम्भ की सभी पंक्तियों के प्रथमाक्षरों को क्रम से पढने पर हम 'श्री स्वामी हरिदास जी ' पढते हैं। ऐसे ही इस छन्द की आठवीं पंक्ति से पहली पंक्ति तक के अन्तिम अक्षरों को क्रम से पढने पर भी हम 'श्री स्वामी हरिदास जी ' इस अष्टाक्षरी को पढ पाते हैं। अद्भुत।

श्री- निधि कौ प्रागट्य भयौ निधिबन के मधि -जी
स्वा- रत स्यामा स्याम किये तिन नें अपने ब -स
मी- न मेख ना रही बसे हिय सदा सर्व -दा
ह- र पल छिन रस पियौ रूप माधुर्य सु जिय भ -रि
रि- धि सिधि बारत केलि कला पै कला सकल जँ -ह
दा- न कियौ रस बही रसिक वर रस अनुगा -मी
स - ब विधि रस बस रहे जगत में बीसौ बि -स्वा
जी- वन प्राण बिहारि बिहारिनि 'प्रीतम' के -श्री


के प्रथम अक्षर से आरम्भ हएवम् क

होली के सवैया - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

मग आज अचानक भेंट भई दोउ दैन चह्यौ एक-एक कों चुक्का
इत ‘प्रीतम’प्यारे नें बाँह धरी, उत प्यारी नें मार्यौ अबीर कौ बुक्का
कर छाँड़ि तबै दृग मींजें लगे, यों लगाय कें आपुनो तीर पै तुक्का
अलि गाल मसोस गई मुसकाय जमाय कें पीठ पे ज़ोर सों मुक्का
[सुन्दरी सवैया]


आई हों दीठि [नज़र] बचाय सबै बिनु तेरे हहा मोहि चैन न आबै
बेगि करौ जो करौ सो करौ, कर कें निबरौ तन मैन सताबै
पै इक बात सुनौ कवि ‘प्रीतम’ प्यार में ख़्वार की दैन न भाबै
होरी खिलाउ तौ ऐसें खिलाउ कि मो सों कोउ कछु कैन न पाबै
[मत्तगयन्द सवैया]

आउते बसंत कंत संत बन बैठे री - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

चाँह चित चाँहक की चाँहि कें चतुर चारु,
चाउ ते चली कर चरचित इकैठे री

पाउते सु 'प्रीतम' के हाव दरसाउ भूरि
भाउते करौंगी मिल मन के मनेंठे री

जाउते बिलोके तौ बरन कछु औरें बन्यौ

ग्राम सुधार - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

सुघरे मकान होंय, चहुंधा उद्यान होंय,
सब ही समान होंय, ध्यान होंय काम में।

 छोटे परिवार होंय, ब्रिच्छ हू हज़ार होंय,
होंय व्हाँ बजार, मिलें - वस्तु सत्य दाम में।

कूप होंय, ताल होंय, सुंदर चौपाल होंय,
बाल हू खुसाल होंय, खेलें केलि धाम में।

'प्रीतम' अपार अन्न-धन के भण्डार होंय,
होंय यों सुधार यथा सीघ्र गाम-गाम में।।
:- यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'
['राष्ट्र हित शतक' से साभार]

लघु उद्योगन तें गरीबन सँभार होत - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

लघु उद्योगन तें गरीबन सँभार होत
प्यार होत समृद्धि औ संपति के पाये ते

छोटे परिवारमें दुलार होत संतति कौ
सार औ सँभार होत दो ही सुत* जाये ते

सिच्छा के प्रचार ही ते पावन विचार होत
कोऊ ना लाचार होत बुद्धि बिकसाये ते

'प्रीतम' अपार अन्न-धन कौ भण्डार होत
सुख कौ अधार होत खेत हरियाये ते

*यहाँ 'दो सुत' का अभिप्राय 'दो बच्चों' से है 

:- यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'
['राष्ट्र हित शतक' से साभार]

एकता अधार राष्ट्र-भाषा एक भारती - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'



फल की सफलता में मूल ही अधार होत
मूल कौ अधार बीज, बीज धरा धारती

धरा उरबरा हेतु नीर है अधार सार
नीर की अधार, नभ - घटा वारि ढारती

'प्रीतम' विवेक, ता की - बुद्धि त्यों अधार रही
बुद्धि की अधार सिच्छा - नेकता उभारती

नेकता अधार प्यार, एकता की माल गुहै
एकता अधार राष्ट्र - भाषा एक भारती 


:- यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

श्री राधा आराध्य सुगम गति आराधन की - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

राधा रानी और तुलसी पूजा







श्री राधा आराध्य सुगम गति आराधन की।
जो अति अगम अपार न है मति जहँ निगमन की।
ज्ञान मान की खान ध्यान धारा भगतन की।
प्रिय 'प्रीतम' की प्रान प्रमान पतित पावन की।।


शिव स्तुति - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'
11.05.1931 - 14.03.2005
गुरुदेव श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी 'ठाले-बैठे' पर पहली बार।
श्री गणेश, 'गणेश पिता शिव जी' की स्तुति से कर रहे हैं। आने वाले
समय में एक एक कर के हम 'प्रीतम' जी विरचित 'दैव-स्तुति', 
'ऋतु वर्णन', 'समस्या-पूर्ति', 'सामाजिक सरोकार', राष्ट्र हित 
चिन्तन'  तथा ऐसे अनेक विषयों से जुड़े छंदों को भी पढ़ेंगे।