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आलेख - ये अंग्रेजी स्कूलों की हिंदी - ममता श्रवण अग्रवाल

मित्रों, हो सकता है आप में से कोई अंग्रेजी स्कूल में हिंदी के शिक्षक हों और आपको ये बात न अच्छी लगे इसीलिए लिए मैं अग्रिम क्षमा चाहती हूँ. 

आलेख - नदी और नारी की समानता – सुनीता चौधरी

नदी और नारी
, दोनों ही सृष्टि की जीवनदायिनी धारा हैं। दोनों का अस्तित्व मानव समाज और प्रकृति के लिए अपरिहार्य है।

'गुनाहों का देवता' और 'रेत की मछली' - एक तफ्तीश – हरगोविन्द विश्वकर्मा

'गुनाहों का देवता' का आदर्शवादी चंदर असल में 'रेत की मछली' में अपराधी शोभन है...

भारतीयता के मूल तत्व से ओत-प्रोत व्यक्तित्व यानि रमेश कँवल

 25 अगस्त, 1953 को जितौरा, पियरो, आरा, बिहार में जन्मे आदरणीय रमेश कँवल जी भी उन चुनिन्दा लोगों में शामिल हैं जिनकी कि ऊर्जा कोविड के बाद कई गुना बढ़ गयी. सामान्यतः

वंदन शुभ अभिवन्दन - रमेश कँवल

 हमारे यहाँ बहुत पहले से गणपति, सरस्वती और गुरुवन्दन की परिपाटी रही है . किसी भी कवि गोष्ठी या कवि सम्मलेन का श्रीगणेश विधिवत दीप प्रज्ज्वलित करने के उपरान्त माँ शारदे की वन्दना के साथ होता रहा है. किसी भी कवि की प्रथम परीक्षा यही मानी जाती थी कि उसने माँ शारदे की वन्दना में

एक और कदम हिंदी गज़ल की ओर – एम. एल. गुप्ता आदित्य

कुछ सप्ताह पहले  हिंदी गजलों की एक पुस्तक आई है “धानी चुनर”। इस पुस्तक के लेखक हैं नवीन सी चतुर्वेदी, जो अनेक विधाओं व भाषाओँ में सृजन करने वाले कवि / लेखक हैं। इस पुस्तक का श्रीगणेश गणपति, शारदे, शिव, राम, कृष्ण, जगदम्बा एवं गुरू वन्दना जैसी ईश आराधनाओं के साथ किया गया है, जो

हिंदी गजल के प्रति आस्था का उद्घोष हैं 'धानी चुनर' की हिन्दी गजलें - देवमणि पाण्डेय



नवीन चतुर्वेदी के नए गजल संग्रह का नाम है धानी चुनर। इससे पहले ब्रज गजलों के उनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इस संग्रह में 87 रसीली एवं व्यंजनात्मक हिंदी गजलें शामिल हैं। संग्रह की पहली गजल में उन्होंने हिंदी गजल के प्रति अपनी आस्था का उद्घोष किया है- 


ओढ़कर धानी चुनर हिंदी गजल
बढ़ रही सन्मार्ग पर हिंदी गजल
देवभाषा की सलोनी संगिनी
मूल स्वर में है प्रवर हिंदी गजल
 
हिंदी भाषा के पास संस्कृत की परंपरा से प्राप्त विपुल शब्द संपदा है। नवीन जी ने इस शब्द संपदा का सराहनीय उपयोग किया है। ऐसे बहुत से शब्द हैं जो हमारी बोलचाल से बाहर होकर हमारी स्मृति या शब्दकोश तक सीमित हो गए हैं। नवीन जी ने इनको गजलों में पिरो कर संरक्षित करने का नेक काम किया है। तदोपरांत और अंततोगत्वा ऐसे ही शब्द हैं। गजल में इनकी शोभा देखिए-
 
हृदय को सर्वप्रथम निर्विकार करना था
तदोपरांत विषय पर विचार करना था
 
अंततोगत्वा दशानन हारता है राम से
शांतिहंता शांति दूतों को हरा सकते नहीं
 
फ़िराक़ गोरखपुरी ने एक बातचीत में कहा था कि हिंदुस्तान में ग़ज़ल को आए हुए अरसा हो गया। अब तक उसमें यहां की नदियां, पर्वत, लोक जीवन, राम और कृष्ण क्यों शामिल नहीं हैं? कवि नवीन चतुर्वेदी ने अपने हिंदी गजल संग्रह 'धानी चुनर' में फ़िराक़ साहब के मशवरे पर भरपूर अमल किया है। उनकी हिंदी गजलों में हमारी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ हमारे पौराणिक चरित्र राम सीता, कृष्ण राधा, शिव पार्वती आदि अपने मूल स्वभाव के साथ शामिल हैं। हमारी आस्था के केंद्र में रहने वाले ये पात्र अपनी विशेषताओं के साथ बार-बार नवीन जी की हिन्दी गजलों में आते हैं और हमारी सोच एवं सरोकार का हिस्सा बन जाते हैं-
 
अगर अमृत गटकना हो तो कतराते हैं माहेश्वर
मगर विषपान करना हो तो आ जाते हैं माहेश्वर
 
निरंतर सद्गुणों का उन्नयन करते हुए रघुवर
यती बनकर जिए पल पल जतन करते हुए रघुवर
 
किसी भी रचनाकार का एक दायित्व यह भी होता है कि वह समाज के कुछ विशिष्ट मुद्दों को रेखांकित करे ताकि दूसरों के मन में भी सकारात्मक सोच का उदय हो। इसी सामाजिक सरोकार के तहत नवीन चतुर्वेदी ने कई गजलों में स्त्री अस्मिता को रेखांकित करने की अच्छी कोशिश की है-
 
हे शुभांगी कोमलांगों का प्रदर्शन मत करो
ये ही सब करना है तो संस्कार वाचन मत करो
सृष्टि के आरंभ से ही तुम सहज स्वाधीन थीं
क्यों हुई परवश विचारो, मात्र रोदन मत करो
 
सामाजिक सरोकार के इसी क्रम में नवीन जी ने पुरुषों की मानसिकता को भी उद्घाटित किया है-
 
व्यर्थ साधो बन रहे हो, कामना तो कर चुके हो
उर्वशी से प्रेम की तुम, याचना तो कर चुके हो
 
जैसे नटनागर ने स्पर्श किया राधा का मन
उसका अंतस वैसी ही शुचिता से छूना था
 
इन गजलों में नयापन है, ताज़गी है और कथ्य की विशिष्टता है। ये गजलें उस मोड़ का पता देती हैं जहां से हिंदी गजल का एक नया कारवां शुरू होगा-
 
दुखों की दिव्यता प्रत्येक मस्तक पर सुशोभित है
समस्या को सदा संवेदना की दृष्टि से देखें
 
वो जो दो पंक्तियों के मध्य का विवरण न पढ़ पाए
उसे पाठक तो कह सकते हैं संपादक कहें कैसे
 
नवीन चतुर्वेदी की हिंदी गजलें प्रथम दृष्टि में शास्त्रीय संगीत की तरह दुरूह लगती हैं। मगर जब आप इन के समीप जाते हैं, इन्हें महसूस करते हैं तो इनमें निहित विचारों और भावनाओं की ख़ुशबू से आपका मन महकने लगता है। ये कहना उचित होगा कि नवीन चतुर्वेदी की हिंदी गजलें किसी संत के सरस प्रवचन की तरह हैं जो हमारे अंतस को आलोकित करती हैं और मन को भी आह्लादित करती हैं। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए मैं नवीन सी. चतुर्वेदी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
 
इस किताब के प्रकाशक हैं आर. के. पब्लिकेशन मुंबई। उनका संपर्क नंबर है- 90225-21190, 98212-51190
 
आपका-
देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

'लव की हॅप्पी एंडिंग' एवं 'कुछ दिल की कुछ दुनिया की' - पुस्तक समीक्षा

अब जरूर हम मथुरा को ठीकठाक सा एक टाउन कह सकते हैं मगर 1990 के आसपास मथुरा इतना डिवैलप नहीं हुआ था । हालाँकि रिफायनरी आ चुकी थी, टाउनशिप बस चुकी थी, कॉलोनियों की बात हवाओं में तैरने लगी थी फिर भी 1990 का मथुरा 1980 के मथुरा से बहुत अधिक उन्नत नहीं लगता था ।

उस मथुरा की एक गली में जन्मी हुई लड़की की शादी महानगर में होती है । मथुरा के संस्कारों को मस्तिष्क में और महानगर वाले पतिदेव के अहसासात को दिल में सँजोये हुए वह गुड़िया बाबुल का घर छोड़ कर पी के नगर के लिए निकल पड़ती है । जिस तरह कहते हैं न कि दुनिया गोल है उसी तरह गृहस्थी की दुनिया भी सभी जगह और सभी के लिए गोल-मोल ही होती है । उस गोल-मोल दुनिया में यह लड़की डटकर परफोर्म करती है, दूरदर्शन, सी एन एन, सी एन बी सी, डी डी भारती और आई बी एन से मीडिया अनुभव ग्रहण करते हुए कालान्तर में एक सफल लेखिका बन कर राष्ट्रीय पटल पर छा जाती है । इस लड़की का घर का नाम गुड़िया ही है और अब भारतीय साहित्य-जगत इसे अर्चना चतुर्वेदी के नाम से जानता है । उत्कृष्ट कोटि की व्यंग्य लेखिका अर्चना जी का साहित्यिक प्रवास उत्तरोत्तर ऊर्ध्व-गामी रहा है । ब्रजभाषा और हिन्दी दौनों ही क्षेत्रों में आप की रचनाओं को पाठकों का अपरिमित स्नेह प्राप्त हुआ है । आप की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आपको अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं ।

पिछले दिनों आप की दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं । पहली पुस्तक “लव की हॅप्पी एंडिंग” जो कि हास्य कहानी संग्रह है और दूसरी पुस्तक “कुछ दिल की कुछ दुनिया की” किस्सा गोई पर आधारित है । अर्चना चतुर्वेदी प्रसन्नमना लेखिका हैं, दिल से लिखती हैं, मज़े ले-ले कर लिखती हैं, इसीलिए इन्हें पढ़ने वाले इन्हें बार-बार पढ़ना चाहते हैं ।





इन पुस्तकों को भावना प्रकाशन से मँगवाया जा सकता है ।

भावना प्रकाशन – फोन नम्बर – 8800139685, 9312869947

हम ग़ालिबो-नज़ीर नहीं बन सके तो क्या

 

हम ग़ालिबो-नज़ीर नहीं बन सके तो क्या
शेरो-सुख़न में हमने गुज़ारी तमाम उम्र
उर्दू ज़बाँ पै अपना भी है क़र्ज़ दोसतो
हमने इसी की ज़ुल्फ़ सँवारी तमाम उम्र

हिमाचल प्रदेश के भाषा व संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित उर्दू साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका “ जदीद फ़िक्रो-फ़न” का 102 वाँ अंक प्राप्त हुआ । पत्रिका के मुख्य सम्पादक हैं डॉ. पंकज ललित और अतिथि सम्पादक हैं श्री विजय कुमार अबरोल उर्फ़ ज़ाहिद अबरोल साहब । आदरणीय लालचन्द प्रार्थी उर्फ़ चाँद कुल्लुवी साहब को अपनी उपरोक्त पंक्तियाँ समर्पित कर के अपने सम्पादकीय को शुरू करते हुए अबरोल साहब ने भूत-वर्तमान और भविष्य की अच्छी पड़ताल की है । विशेषतः इन्हों ने विवेच्य अंक में उन रचनधर्मियों को विशेषतः स्थान दिया है जो किसी न किसी कारणवश भीड़ से दूर रहते हैं । उर्दू की इस पत्रिका के 26 पन्ने देवनागरी लिपि में हैं और 86 पन्ने नस्तालीक रस्म-उल-ख़त (पर्शियन स्क्रिप्ट जिसे हम उर्दू समझते हैं ) में हैं । मैं चूँकि पशियन स्क्रिप्ट से अनभिज्ञ हूँ इसलिए बस देवनागरी लिपि वाले हिस्से का ही रसास्वादन कर सका हूँ ।
 
इस पत्रिका से कुछ चुनिन्दा अशआर
 
मैं पहले ख़ौफ़ फैलाता हूँ फिर यह सोचता हूँ
परिन्दे मेरे आँगन में उतरते क्यों नहीं हैं
: अयाज़ अहमद तालिब
 
हमारी आँखें हमारी कहाँ हैं हो कर भी
वही है देखना हम को जो रब दिखाता है
“ कृष्ण कुमार “तूर”
 
तेरे मकान के बेलों लदे दरीचे पर
ये किसकी रूह का ताइर तवाफ़ करता है
“ राजिन्दर नाथ “राहबर”
 
रहते थी जिसके हाथ हमेशा कपास में
बेचारा मर गया नये कपड़ों की आस में
“ ज़मीर दरवेश
 
अब्र ख़ुशियों का अगर जम कर नहीं बरसा तो क्या
ग़म के बादल भी बहुत जल्दी धुआँ हो जाएँगे
: आबशार आदम
 
बहुत से लोग हवादिस में मारे जाते हैं
हर आदमी का जनाज़ा नहीं निकलता है
: “कशिश” होशियारपुरी
 
एक पोरस भी तो रहता है हमारे अन्दर
जो ‘सिकन्दर’ को ‘सिकन्दर’ नहीं रहने देता
: द्विजेंद्र द्विज
 
अब वो भी दिन में तारे दिखलाते हैं
जिनकी थाली में कल चाँद उतारा था
: नववीत शर्मा
 
यादों के गुलशन में यूँ तो रंग-बिरंगे फूल भी हैं
लेकिन फिरते हैं काँटों को सीने से चिपकाए लोग
: कृष्ण कुमार “नाज़”
 
ऐ वतन! अहले-वतन उनको भुला देते हैं
जो तेरा क़र्ज़ चुकाते हुए मर जाते हैं
“ सुभाष गुप्ता “शफ़ीक़”
 
कहाँ पर वार करना है पराया क्या ही जाने
कहाँ से दुर्ग ढहना है ये अपना जानता है
: जावेद उलफ़त
 
मोहल्ले वालों का सर फोड़ना है बात अलग
फटेगी शर्ट तो समझोगे तुम रफ़ू क्या है
: टी. एन. राज़
 
पहली सफ़ों में आज गुलूकार आ गये
कितना बड़ा मज़ाक़ हुआ शाइरी के साथ
: काशिफ़ अहसन
 
इस पत्रिका के सम्पादकीय में श्री विजय कुमार अबरोल उर्फ़ ज़ाहिद अबरोल साहब ने लिखा है कि 1982 में परलोक सिधार चुके चाँद कुल्लुवी साहब का देवनागरी लिपि में शेरी मजमूआ अभी भी प्रकाशन के लिए प्रतीक्षारत है । इस के अलावा भी अबरोल साहब ने इस बात से जुड़ी और भी बातों पर इशारे किए हैं । जो नहीं लिखा है उसे भी कोई भी ललितकला प्रेमी सहज ही समझ सकता है । आओ हम सभी आशा करें कि अबरोल साहब के प्रयासों को सफलता मिले ।

प्रशंसा एक रोग है - रत्नेश मिश्रा

प्रशंसा एक रोग है, करने वाला भी रोगी, करवाने वाला भी रोगी। दुर्योग से यह रोग हर दौर में सत्ता- प्रतिषठान के केंद्र में रहा है। पहले राजदरबारों में दरबारी लोग होते थे, कवि होते थे जो राजा की प्रशंसा में गीत रचते थे, गाते थे, राजा खुश होता था और ऐसे लोगों को अशर्फियों और धन-दौलत से नवाजता था।

 

राजसत्ता बदल गई, लोकशाही का समय आया लेकिन न तो सत्ता का मूल चरित्र बदला और न ही खुशामद के रास्ते लाभ उठाने वाले लोगों का। अपनी सुविधा के लिए आप मौका और दस्तूर के हिसाब से 'प्रशंसा' शब्द को 'चापलूसी'  से रिप्लेस कर सकते हैं। आलोचनात्मक टिप्पणी करना तो जैसे दु्श्मनी को दावत देना हो गया है।

 

अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा उपहार है। यह आजादी हमें जिम्मेदार लोगों से प्रश्न करने का हक देती है। स्वस्थ लोकतंत्र में 'सवाल' और 'आलोचना' एक औषधि की तरह है। इससे सरकार और जिम्मेदार लोगों पर अंकुश रहता है। स्वस्थ आलोचना उन्हें सतर्क और सावधान रहना सिखाती है। लेकिन इन सभी का अगर दुरुपयोग होने लगे तो चीजें बद से बदतर भी होने लगती हैं।

 

मुंशी प्रेमचंद ने अपने एक लेख 'जीवन और साहित्य में घृणा का स्थान' में समझाते हुए लिखा कि-  अगर दया, करुणा, प्रशंसा और भक्ति का दुरुपयोग किया जाने लगे, तो वह दुर्गुण हो जायेंगे। अंधी दया अपने पात्र को पुरुषार्थ-हीन बना देती है, अंधी करुणा कायर, अंधी प्रशंसा घमंडी और अंधी भक्ति धूर्त।  इसी निबंध में प्रेमचंद यह भी समझाते हैं कि- निंदा, क्रोध और घृणा ये सभी दुर्गुण हैं, लेकिन मानव जीवन में से अगर इन दुर्गुणों को निकाल दीजिए, तो संसार नरक हो जायेगा।

 

यह निंदा का ही भय है, जो दुराचारियों पर अंकुश का काम करता है। यह क्रोध ही है, जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है और यह घृणा ही है जो पाखंड और धूर्तता का दमन करती है। निंदा का भय न हो, क्रोध का आतंक न हो, घृणा की धाक न हो तो जीवन विश्रृंखल हो जाय और समाज नष्ट हो जाय।

 

कहते हैं प्रशंसा के घाव बड़े गहरे होते हैं, लेकिन यह लोग कहते भर हैं, अब इसका कोई मतलब नहीं रह गया है आजकल। पूरे कुएं में भांग पड़ी है, 'आत्ममुग्धता' इस दौर की सबसे बड़ी पूंजी है। प्रशंसा अब घाव नहीं करती, आपके सोचने के तरीके को बदल देती है। दिमाग में 'स्टीरियो टाइप' का निर्माण करती है। प्रशंसा, आलोचना, सवाल और टिप्पणी के संदर्भ में जो भूमिका मैं बना रहा हूं, उसके केंद्र में आज का मीडिया है।  

 

प्रशंसा जब किसी 'माध्यम' में हो और हद से ज्यादा हो तो समझ लीजिए जान बूझकर एक छवि गढ़ने की कोशिश की जा रही है। इसमें और भी कई चीजें शामिल हैं मसलन यह सब किस एजेंडे के तहत किया जाता है। संचार सिद्धांतों में शामिल 'एजेंडा सेटिंग थ्योरी' मीडिया के ऐसे चरित्र की पड़ताल करती है। इसके तहत खबरों के क्रम को व्यक्ति, समूह अथवा राजनीतिक दलों के हितों के अनुसार खास एजेंडे के तहत सेट किया जाता है। न कि न्यूज सेंस के आधार पर।

 

जिस एजेंडे को आगे बढ़ाना होता है उससे संबंधित खबरों पर मीडिया फोकस करता है, क्रम में उसे सबसे आगे रखता है और जिस खबर को महत्व नहीं देना है उसे या तो सबसे पीछे रखता है या कई बार रखता ही नहीं। 'एजेंडा सेटिंग थ्यौरी' के अनुसार जिन ख़बरों को क्रम में पीछे रखा जाता है अथवा उनकी प्रस्तुति को कमजोर किया जाता है, टारगेट ऑडियंस के मानस पटल पर उनकी प्रभावोत्पादकता कम हो जाती है।

 

दुनिया के सबसे घातक लड़ाकू विमानों में शुमार राफेल की पहली खेप बुधवार को आखिरकार भारत पहुंच गई। यह खुशी की बात है कि राफेल के भारतीय सेना में शामिल होने से देश की सुरक्षा चाक-चौबंद होगी, हमारी सेना और मजबूत होगी। 

 

यह रूटीन काम था, विमान का सौदा हो चुका था, उसे भारत आना ही था। लेकिन विमान की लैंडिंग से संबंधित खबर को सनसनी बनाकर उत्तेजनापूर्ण ढंग से पेश करना, भारतीय टीवी मीडिया की अगंभीर छवि को उजागर करता है।  ऐसा करना उन परिस्थितियों में जायज होता जब राफेल लड़ाकू विमान भारत में ही बने होते।

'सवाल' भारतीय मीडिया से गायब हो रहे हैं।  

 

देश कई तरह के संकट से जूझ रहा है। कोरोना संक्रमण के चलते अर्थव्यवस्था के धराशायी होने के चलते युवाओं के रोजगार छिन रहे हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत मीडिया में कुछ और है जमीन पर कुछ और। बिहार कोरोना से बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और बाढ़ की दोहरी मार झेल रहा है। असम में भी बाढ़ की भयानक स्थिति है। ये सभी मुद्दे मीडिया के केंद्र में होने चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है। ये मुद्दे व्यवस्था जनित विसंगतियों को उजागर करेंगे, सरकार को सचेत करेंगे, इससे सरकारी मशीनरी में सक्रियता आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।  

 

टीवी पर बहसों के नाम जहर उगला जा रहा है। दलगत राजनीति में अपनी विचारधारा के अनुरूप एक-दूसरे की आलोचना करना तो एक हद तक जायज भी है लेकिन अब आलोचना की जगहें खत्म हो चुकी हैं। लोग पक्ष-विपक्ष न होकर एक दूसरे के दुश्मन हो चुके हैं।  टीआरपी के लिए टीवी पर रोज युद्ध जैसी स्थितियां जानबूझकर निर्मित की जाती हैं। यहां तक कि लोगों ने टीवी पर एक-दूसरे को मां-बहन की गालियां देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।  

 

मीडिया के कवरेज में आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं।  मीडिया समाज केंद्रित न होकर व्यक्ति-केंद्रित होता जा रहा है। कुछ नाटकीयता और अतिरंजना के साथ कार्यक्रम परोस कर दर्शकों को लुभाने की कोशिशें बदस्तूर जारी हैं। यह सही है कि मीडिया समाज का चौथा स्तम्भ होने के साथ- साथ एक व्यवसाय भी है, इसलिए उसे अपने व्यावसायिक हितों के अनुरूप भी काम करना होता है लेकिन वर्तमान में मीडिया का जो रूप है हमारे सामने है, वह विभत्स है।

 

खबरों को रोचक बनाने के सकारात्मक उपायों का आजमाया जाना गलत नहीं है लेकिन उसे विभत्स बनाकर, उसमें उत्तेजना और अमर्यादित भाषा का प्रयोग न केवल निंदनीय है बल्कि आपराधिक भी है। 

 

रत्नेश मिश्रा

(अमर उजाला काव्य कैफ़े)

मैंने भी मस्जिद तोड़ी है - अरमान आसिफ़ इक़बाल

मैंने भी मस्जिद तोड़ी है...जी हां, जब मेरी उम्र तकरीबन 16-17 साल की रही होगी...हमारे यहां एक पुरानी मस्जिद थी, जिसे बाद में नया किया गया...उस मस्जिद के एक हिस्से में मुस्लिम परिवार कई सालों से रह रहा था...बताया जाता था कि ये परिवार उस शख़्स का था जो कभी मस्जिद की देखभाल किया करते थे...उनके इंतकाल के बाद उनका परिवार मस्जिद के उस हिस्से में रहता रहा...परिवार में ग़रीबी के साथ-साथ लड़कियां भी थीं...परिवार पर आरोप था कि उनका चाल-चलन ठीक नहीं और ग़लत कामों में मुब्तला है...ख़ैर परिवार को मस्जिद से निकालने के लिए पूरा समुदाय एक था...परिवार मस्जिद छोड़ने को राज़ी नहीं था...कोर्ट-कचहरी और मुक़दमें तक बात पहुंच गई...आख़िर कोर्ट ने फ़ैसला मस्जिद की इंतज़ामिया कमेटी के हक़ में सुनाया और परिवार को उस हिस्से को ख़ाली करने का आदेश दिया...लेकिन परिवार इस लायक़ नहीं था कि कहीं और बसेरा कर सके...लिहाज़ा उन्होंने जगह नहीं छोड़ी...

दूसरी तरफ जर्जर हो रही मस्जिद की तामीर का काम शुरू हो चुका  था...लेकिन उस हिस्से में काम रुका था जिसमें वो परिवार रहता था...इंतज़ामिया कमेटी ने परिवार से समझौते की कोशिश की और उन्हें दूसरी जगह दिलाने की बात कही, पर मस्जिद मुख्य बाज़ार में होने की वजह से इस जगह की हैसियत कहीं ज़्यादा थी...हम सब नए-नए लड़के नमाज़ पढ़ने मस्जिद में जाया करते थे...एक दिन तय हुआ कि मस्जिद के उस हिस्से को भी गिराया जाएगा जिसमें परिवार रहता है...जुमे की नमाज़ के बाद का वक़्त रखा गया...सब सामान तैयार कर लिया गया...कुदाल, फावड़ा, सबकुछ...आख़िरकार हम सबने मिलकर मस्जिद के उस हिस्से को गिरा दिया...वो परिवार अब सड़क पर था...रो रहा था...चिल्ला रहा था...पर सब बेकार..

मेरे इस काम के बारे में मेरे घरवालों को इल्म नहीं था..ये सब मेरा फ़ैसला था जो मैंने कुछ लोगों के कहने पर किया..जब घरवालों को पता चला तो उन्होंने अच्छे से ख़बर ली...घटना के बाद कई दिनों तक मुझे नींद नहीं आई...हमेशा लगता रहा जैसे मैंने सवाब (पुण्य) के लिए कोई गुनाह तो नहीं कर दिया...शहर में और भी मस्जिदें थीं जहां मैं नमाज़ पढ़ सकता था...एक वही क्यों..उस दिन से मैंने सोच बदली और धर्म को दूसरे नज़रिए से देखना शुरू किया...हो सकता है इंतज़ामिया कमेटी अपनी जगह सही हो, पर मैं आज भी वो मंज़र सोचता हूं तो पछतावा होता है...क्या हमसे अपराध कराया गया था...

जी हां...हम जैसे नौजवान जो मंदिर या मस्जिद इबादत के लिए जाते हैं और हमारी श्रद्धा का फ़ायदा उठा लिया जाता है...हमें पता भी नहीं चल पाता हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं...कहने का मक़सद ये है कि जिस भी धर्म के नौजवान हों उनकी आस्था को अपराध में न बदला जाए..और नौजवानों से गुज़ारिश है कि वो अपनी आस्था को अपराध में न तब्दील होने दें...

 

अरमान आसिफ़ इक़बाल

कोरोना काल और फेसबुक लाइव सेशन - ब्रजभाषा व्यंग्यालेख

जय श्री कृष्ण । राधे राधे ।

 

भैया यै भूतनी कौ करोना जो न दिखावै सो थोरौ है । यानें जीव-जिनावर’न पै बड़ी किरपा करी है । कबूतर’न कों मुक्तगगन में विचरिवे कौ लाइसेंस दै दियौ है और मनुष्य’न कों फ्लैट’न में यानि कबूतर’न के दड़व’न में कैद कर दियौ है । दारू-गुटखा भलें ही महँगे कर दिये हैं मगर पेट्रोल-डीजल यानि तेल’न कौ तेल निकार दीनों है । रोज-रोज लेक्चर पेलिवे वारे नेत’न कों भाषण’न के लाले परवाय दीने हैं तौ घर-घर बैठे वॉट्सऐप-फेसबुक वीर’न के हाथ’न में माइक पकराय दीने हैं ।

 

फेसबुक सों याद आयौ कि आजकल फेसबुक लाइव की फैसन चल निकसी है । जहाँ देखौ वहीं फेसबुक लाइव । कहुँ फेसबुक-ग्रुप’न पै लाइव सेशन चल रहे हैं तौ कहूँ फेसबुक पेज’न पै; और भैया जिनकों कोउ भाव नाँय दै रह्यौ वे अपने चेला-चपाटे’न के थ्रू अवतरित है रहे हैं । लाइव-सेशन’न के कछु प्रेमी विन भँगडि’न के जैसे हैं जिन्हें न तौ कोउ बगीची-अखाड़े वारौ बुलाय रह्यौ है और न ही वे बिचारे रोज-रोज चेला-चपाटे’न के लिएँ फ्री की छनवाय सकें । तौ भैया ऐसे पीर-फकीर अपने-अपने छज्जे-छजली यानि अपनी-अपनी टाइमलाइन’न सों अभिव्यक्त है रहे हैं ।

 

अच्छा, एक बात और देखी कि लाइव सेशन काहु भी ग्रेड कौ होय यानि भलें ही कोऊ नफीरी-बैंड-बाजे वारी बरात होय या कड़ी-कड़क्का वारी या करोना काल की वर्च्युयल वेडिंग टाइप; हाजिरीन पाँच-पच्चीस या भौत सों भौत सौ-पचास ही दिखवे में आय रहे हैं । भैया जैसें सहालग’न में सब बराबर ऐसें ही करोना काल में हु सब बराबर । माल मिलै तौ भीर हु जुरै । जैसे जिजमान वैसे प्रावधान ।

 

जा तरियाँ ब्याउ-बरात’न में सब जगें रिस्ते निभाने परें ऐसें ही इन फेसबुक लाइव’न में हु भैया फोर्मेलिटी निभानी ही परै है । वेडिंग कार्ड की तरह पहिले सों सूचित कर दियौ जावै कि कौन सौ बकरा कब कहाँ शहीद होनों है । फिर सेम डे हु इन्फॉर्म कियौ जावै कि भैया भूल मत जइयौ आप कौ ही कार्यक्रम है आप कों जरूर आनों है ।

 

अब भैया हर दिन चार-चार पाँच-पाँच और कबू-कबू तौ लैन लगाय कें लाइव-सेशन होमें हैं । समय लगभग सबन्ह कौ सेम । अब बराती का करै वाय तौ सब सों रिस्ते निभाने हैं । या तौ वौ शहीद है चुकौ है जा में सब नें रिस्ते निभाये हुते या वा की या वा के घर के काहु की शहादत ड्यू है । यानि हर तरह सों रिस्ते तौ निभाने ही हैं ।

 

अभी कछ दिन पहिले की ही बात है साब हम बड़े बन-ठन कें मतलब मन ही मन में बन-ठन कें निछावर करिवे यानि लाइव-सेशन’न में हाजिर हैवे कों निकसे ।

 

सब सों पहिलें झगड़ू झाँसवी के सेशन में गये । शायरी में इनकौ भौत बड़ौ नाम है साब । पचास माँगें और दस ते कम पै तौ ये यवे सहर में हु माइक हाथ में नाँय लेमें। कोरोना जो न करावै सो थोरौ । आजकल बिचारे फ्री में मुसायराय रहे हैं । तौ साब हमनें का देखौ कि झाँसवी साब पसीना-पसीना है रहे हुते । लै-दै कें 18 व्यूअर दिख रहे हुते । भैया कवि-सम्मेलन मुसायरे’न में तौ सामनें भलें ही पच्चीस हु न बैठे होंय परंतु विनकी दाद और बीच-बीच में खाज यानि तारी (कबू-कबू सरोता हाथ खुजायवे के लिएँ हु तारी बजायवे के उपक्रम करें हैं) की अवाज सुनि-सुनि कें माइकेश्वर में ऊर्जा कौ संचार होतौ रहै । फेसबुक लाइव में तौ पतौ ही नाँय चलै । हमनें जब झाँसवी साब कों झूला झूलते देखौ तौ वहाँ सों चुपचाप निकस लैवौ ही ठीक समझौ ।

 

फिर हम पहुँचे सुन्दरी संतो सीतापुरी के सेशन में । संतो जी भौत ही मलूक सायरा हैं साब । एकदम शोले की बसंती टाइप । बड़े ही लटके-झटके दिखाय कें काव्य पाठ करें हैं । इन के यहाँ साब पूरे पेंसठ व्युअर अपनी-अपनी बीन बजाते भए जमे भए दिखे । ये बीन बजामें और संतो जी झूम-झूम कें दिखामें सॉरी सॉरी काव्य पाठ करें । जहाँ पहिले सों ही पेंसठ बीन बज रही होंय वहाँ अपनी पींपनी की का बखत सो भैया हम वहाँ सों हु सटक लिये ।

 

अब हम पहुँचे एक नवोदित शायर जौन जयपुरी के सेशन में । हम एंट्री लै कें कछु सुनिवे कौ उपक्रम करते वा सों पहिलें ही जौन साब बोले अरे क्या बात है आज तो हमारी बज्म में नवीन साहब भी तशरीफ लाये हैं । भैया हम भोंचक्के रह गये । पिछली दो बरात’न में तौ काहु नें घास हु न डारी और यहाँ तौ आते ही वेलकम । मन प्रसन्न है गयौ साब । एक ही मिनट में हम अपने आप कों मीर-गालिब’न की पंगत में बिराजमान महसूसवे लगे । परन्तु भैया हमारी खुसी भौत देर तक टिक न सकी । अब तौ साब जौन जयपुरी साब हर शेर यै ही कह कें पढ़ें नवीन साब ये शेर बतौरे-खास आप की खिदमत में पेश कर रहा हूँ और शेर कैसे-कैसे हुते एक बानगी देखौ

 

तू चौदवीं का चाँद है न आफताब है ।

पर क्या करें गुलाबो तेरा बाप नवाब है ॥

 

अब साब ऐसे शेर’न पै का दाद देवें और कब तक दाद देवें । चुप रह जामें तौ पट्ठा टोकिवे लगै नवीन साब एम आय औडिबल? यानि नवीन साब क्या आप मुझे सुन पा रहे हैं? बड़े ही मरे मन सों कहनों परै वा साब वा । अपनी हालत ऐसी है गयी मानों घर सों तीन जगें निछावर करिवे कों निकसे होहु और पहिली अगयौनी (घुड़चढ़ी) में ही दूल्हे राजा के बाप नें आप कौ हाथ पकर लीनों होय । ऐसे में और करौ हु का जाय सकै । बस प्रतीक्षा करी जाय सकै काहु और रिसतेदार के आयवे की जा कौ हाथ पकारिवे के लिएँ दूल्हे राजा के पिता श्री हमारौ हाथ छोड़ें । सो भैया हमनें हु प्रतीक्षा करिवौ ही ठीक समुझौ । अगलौ शेर

 

दुखड़े भरी हैं ये जीवन की राहें ।

ऐसे में हमें चाहिए आप की बाँहें ॥

 

साब मन में आयौ कि साले कों पकरि कें द्वै-चार जमाय देंय फिर सुन्दरी संतो सीतापुरी जी की याद आय गयी । सोची या में तौ जमाय देउगे लल्ला परन्तु संतो की तरफ नेंक आँख हु तरेरी तौ वे पेंसठ बीन-बाज तुमारी खटिया खड़ी कर दिंगे । मन मसोस कें चुप्प रहिवौ ही नीकौ लगौ साब ।

 

कछु ही देर बाद ऊपर वारे नें हमारी सुन लीनी साब । यहाँ एक और रिस्तेदार आय कें टपकौ वहाँ हमारौ हाथ मुक्त भयौ और साब फिर कौन रुकै हम ये गये वे गये और नौ दो ग्यारह यानि अंतर्ध्यान है गये । जान बची और लाखों पाये । लौट कें कवि जी घर कों आये ।

 

नवीन सी चतुर्वेदी

मुम्बई
9967024593