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एक और कदम हिंदी गज़ल की ओर – एम. एल. गुप्ता आदित्य

कुछ सप्ताह पहले  हिंदी गजलों की एक पुस्तक आई है “धानी चुनर”। इस पुस्तक के लेखक हैं नवीन सी चतुर्वेदी, जो अनेक विधाओं व भाषाओँ में सृजन करने वाले कवि / लेखक हैं। इस पुस्तक का श्रीगणेश गणपति, शारदे, शिव, राम, कृष्ण, जगदम्बा एवं गुरू वन्दना जैसी ईश आराधनाओं के साथ किया गया है, जो

हिन्दी उर्दू भाषाएँ व लिपियाँ - नवीन

"फ़ारसी लिपि (नस्तालीक़) सीखो नहीं तो हम आप की ग़ज़लों को मान्यता नहीं देंगे" टाइप जुमलों के बीच मैं अक्सर सोचता हूँ क्या कभी किसी जापानी विद्वान ने कहा है कि "हाइकु लिखने हैं तो पहले जापनी भाषा व उस की 'कांजी व काना' लिपियों को भी सीखना अनिवार्य है"। क्या कभी किसी अंगरेज ने बोला है कि लैटिन-रोमन सीखे बग़ैर सोनेट नहीं लिखने चाहिये।

मेरा स्पष्ट मानना है कि:-

कोई भी रस्म-उल-ख़त* वह ज़मीन है जिस पर।
ज़ुबानें पानी की मानिन्द रक़्स करती हैं॥
*लिपियाँ

उर्दू अगर फ़ारस से आयी होती तब तो फ़ारसी लिपि की वकालत समझ में आती मगर यह तो सरज़मीने-हिन्दुस्तान की ज़ुबान है भाई। इस का मूल स्वरूप तो देवनागरी लिपि ही होनी चाहिये - ऐसा मुझे भी  लगता है। हम लोगों ने रेल, रोड, टेम्परेचर, फ़ीवर, प्लेट, ग्लास, लिफ़्ट, डिनर, लंच, ब्रेकफ़ास्ट, सैलरी, लोन, डोनेशन जैसे सैंकड़ों अँगरेजी शब्दों को न सिर्फ़ अपनी रोज़मर्रा की बातचीत का स-हर्ष हिस्सा बना लिया है बल्कि इन को देवनागरी लिपि ही में लिखते भी हैं। इसी तरह अरबी-फ़ारसी लफ़्ज़ों को देवनागरी में क्यों नहीं लिखा जा सकता। उर्दू के तथाकथित हिमायतियों को याद रखना चाहिये कि देवनागरी लिपि उर्दू ज़ुबान के लिये संजीवनी समान है।

कुदरत का कानून तो यह ही कहता है साहब।
चिपका-चिपका रहता हो वह फैल नहीं सकता॥
मज़हब और सियासत से भाषाएँ मुक्त करो।
चुम्बक से जो चिपका हो वह फैल नहीं सकता॥

आय लव टु राइट एण्ड रीड उर्दू इन देवनागरी लिपि - यह आज की हिंगलिश है जिसे धड़ल्ले से बोला जा रहा है - लिहाज़ा लिख कर भी देख लिया।

अगर उच्चारण के आधार पर कोई बहस करना चाहे तो उसे पचास-साठ-सत्तर यानि अब से दो-तीन पीढियों पहले के दशकों की फ़िल्मों में शुद्ध संस्कृत निष्ठ हिन्दी और ख़ालिस पर्सियन असर वाली उर्दू के मज़ाहिया इस्तेमालों पर एक बार नज़रे-सानी कर लेना चाहिये। कैसा-कैसा माख़ौल उड़ाया गया है जिस पर आज भी हम जैसे भाषा प्रेमी भी अपनी हँसी रोक नहीं पाते।

बिना घुमाये-फिराये सीधी -सीधी दो टूक बात यही है कि उर्दू विभिन्न विभाजनों के पहले वाले संयुक्त  हिन्दुस्तान की ज़ुबान है जिस की मूल लिपि देवनागरी को ही होना चाहिये - ऐसा मुझे भी लगता है। जैसे हम लोग चायनीज़, जर्मनी आदि स्वेच्छा से सीखते हैं उसी तरह फ़ारसी लिपि को सीखना भी  स्वेच्छिक होना चाहिये - बन्धनकारक कदापि नहीं।

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क्षेत्रीय भाषाओं से हिन्दी को नुकसान - नवीन

लोहड़ी, पोंगल और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ। 

एक महत्वपूर्ण विषय पर स्वस्थ-विमर्श हेतु सभी साथियों से निवेदन। 

पूरे देश में आज कल जहाँ एक तरफ़ भोजपुरी व अवधी को भाषाओं की सूची (आठवीं अनुसूची) में स्थान दिलवाने हेतु प्रयास चल रहे हैं वहीं दूसरी ओर कुछ विद्वान इस के विरोध में भी उठ खड़े हुये हैं। 

जो पक्ष में हैं वह अपने अस्तित्व, अपने पुरखों की पहिचान को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। जो विपक्ष में हैं उन का कहना है कि अगर क्षेत्रीय भाषा-बोलियों को सूची में शामिल किया गया तो हिन्दी अपना दर्ज़ा खो देगी एवम् उस की जगह उर्दू ले लेगी। 

मैं समझता रहा हूँ कि उर्दू भाषा या बोली न हो कर एक लहजा (pattern) है जो नस्तालीक़ (फ़ारसी स्क्रिप्ट) और देवनागरी के साथ-साथ रोमन में भी लिखी जाती है। यक़ीन जानिये इसे हिब्रू में भी लिखा जा सकता है। इसी तरह संस्कृत को भी बहुत पहले से नस्तालीक़ व रोमन आदि लिपियों में लिखा जाता रहा है। 

मैं समझता रहा हूँ कि भले ही आजकल हिंगलिश लहजा (pattern) सर चढ कर बोल रहा है मगर यह एक स्वतन्त्र भाषा या बोली नहीं है - कम-अज़-कम अब तक तो नहीं ही है। 

मैं समझता रहा हूँ कि भाषा-बोली एवम् लिपि दो अलग विषय-वस्तु हैं। आज दुनिया की तमाम भाषाएँ रोमन में भी लिखी जा रही हैं। मगर इस के चलते सारी दुनिया का ब्रिटेनीकरण तो नहीं हो गया। 

मैं समझता रहा हूँ कि ब्रजभाषा एक समय पूरे संसार की साहित्यिक भाषा रही है। मगर अफ़सोस आज ब्रजभाषा चर्चाओं में नहीं है। शायद समय को यही स्वीकार्य हो। शायद ब्रजभाषा सद्य-प्रासंगिक स्तरों  से बचते हुये संक्रमण काल की प्रतीक्षा कर रही हो। 

मैं समझता रहा हूँ कि आज भी हम तथाकथित हिन्दी-उर्दू भाषी व्यक्ति, तथाकथित हिन्दी-उर्दू की बजाय, अवधी-भोजपुरी-राजस्थानी-ब्रज-हिमाचली-गुजराती-मराठी आदि ही अधिकांशत: बोलते हैं। या फिर हिन्दुस्तानी या हिंगलिश या इंगलिश। दक्षिण भारत का मुसलमान तुलू-कन्नड़-तमिल आदि बोलता है। बांग्लादेश में आज भी बंगाली बोली जाती है। 

मैं समझता रहा हूँ कि यदि हमारी हिन्दवी या हिन्दुस्तानी ज़ुबान को तथाकथित हिन्दी या उर्दू के दायरों में न बाँटा जाता तो कहीं ज़ियादा बेहतर होता।  

विमर्श का केन्द्र - क्षेत्रीय बोलियों को सूची में शामिल करने से हिन्दी को होने वाले नुकसान - है। 

आप सभी साथियों से निवेदन है कि इस स्वस्थ-विमर्श में अपने मूल्यवान विचारों को अवश्य रखें। 

सादर, 

नवीन सी• चतुर्वेदी 


9967024593 
13.01.2016

अपनी वही ज़ुबान, जो कि हो हिन्दुस्तानी





अङ्ग्रेज़ी में दागते, हिन्दी के गुणगान
उदघोषक हैं टॉप के, ऊँची उन की शान
ऊँची उन की शान, ज्ञान की खान लुटाते
करें प्रज्वलित दीप, और फिर 'पैग' चढाते
देखा जब यह खेल, हो गए हम भी crazy
हिन्दी वाली 'आय' और खर्चे 'अङ्ग्रेज़ी’

हिन्दी, हिन्दी, हिन्दवी, गूँजे चारों ओर 
हिन्दी-हिन्दुस्तान का, दुनिया भर में शोर
दुनिया भर में शोर, होड़ सी मची हुई है
पहले पहुँचे कौन, शर्त सी लगी हुई है
करो नहीं तुम भूल, समझ कर इस को चिन्दी
गूगल, माय्क्रोसोफ्ट, आज सिखलाते हिन्दी

हिन्दी में ही देखिये, अपने सारे ख़्वाब
हिन्दी में ही सोचिये, करिये सभी हिसाब
करिये सभी हिसाब, ताब है किस की प्यारे
ऐसा करते देख, आप को जो दुत्कारे
एप्लीकेशन-फॉर्म, भले न भरें हिन्दी में
पर अवश्य परिहास-विलाप करें हिन्दी में

हिन्दी भाषा से अगर, सचमुच में हो प्रेम
तो फिर मेरे साथ में, अभी लीजिये नै'म
अभी लीजिये नै'म, सभी मुमकिन हिस्सों में
हिन्दी इस्तेमाल - करें सौदों-क़िस्सों में
छोटी सी बस मित्र यही अपनी अभिलाषा
दुनिया में सिरमौर बने यह  हिन्दी भाषा

हिन्दुस्तानी बोलियों, को दे कर सम्मान
अङ्ग्रेज़ी को भी मिले, कहीं-कहीं पर स्थान
कहीं-कहीं पर स्थान, तभी भाषा फैलेगी
पब्लिक ने इन्ट्रेस्ट लिया, तब ही पनपेगी
भरी सभा के मध्य, बात कहते ऐलानी
अपनी वही ज़ुबान, जो कि है हिन्दुस्तानी



[हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में]