'गुनाहों का देवता' और 'रेत की मछली' - एक तफ्तीश – हरगोविन्द विश्वकर्मा

'गुनाहों का देवता' का आदर्शवादी चंदर असल में 'रेत की मछली' में अपराधी शोभन है...

शादीशुदा शोभन अपनी प्रेमिका मीनल, जिसे वह बहन कहता है और जो उसे हर रक्षबंधन के पर्व पर राखी भी बांधती है, को लेकर अकेले कहीं नहीं जा सकता, क्योंकि भारतीय समाज युवा भाई-बहन को भी कहीं जाने और एक ही कमरे में ठहरने की इजाज़त नहीं देता। इसलिए शोभन अपनी पत्नी कुंतल को ढाल बनाकर साथ ले जाता है, और लोगों से बताता है कि मेरे साथ पत्नी कुंतल के अलावा मेरी बहन मीनल भी आई हैं। अगर पत्नी साथ में है तो भारतीय समाज भाई-बहन के एक कमरे में ठहरने को बुरा नहीं मानता, क्योंकि बहन-भाई का रिश्ता पवित्र और ऊंचे दर्जे का माना गया है।

 

हालांकि आज इस पोस्ट का कोई औचित्य भी नहीं है, क्योंकि जिनकी चर्चा मैं करने जा रहा हूं, वे लोग इस दुनिया में नहीं हैं। इसके बावजूद चूंकि 50 साल पहले प्रकाशित एक किताब को मैंने पहली बार पढ़ा तो उस पर एक पोस्ट तो बनता ही है। तो आज मैं विस्तृत चर्चा करने जा रहा हूं, देश की सबसे लोकप्रिय पत्रिका धर्मयुग के शक्तिशाली संपादक डॉ. धर्मवीर भारती के 1949 में प्रकाशित उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ के मुख्य चरित्र चंदर और डॉ. भारती की पहली पत्नी कांता भारती के बहुचर्चित उपन्यास 'रेत की मछली' के मुख्य चरित्र शोभन का। दरअसल, कई लेखकों और समीक्षकों ने कहा है कि चंदर और शोभन जैसे चरित्र ख़ुद डॉ. भारती के ही हैं। उन्होंने गुनाहों का देवता में अपनी छवि अपने अनुसार गढ़ी है, लेकिन रेत की मछली में उनकी पहली पत्नी कांता भारती ने शोभन का क़िरदार अपने अनुभवों के आधार पर उकेरा है।

 

दरअसल, पिछले 13 नवंबर को मैं आदरणीय धीरेंद्र अस्थाना जी के साथ मुंबई विश्वविद्यालय के कालीना कैंपस में एक साहित्यिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गया था। वहां कई प्रकाशन समूहों के स्टॉल लगे हुए थे। राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर मनोहर श्याम जोशी का ‘कसप’ दिख गया। ‘कसप’ 1985 में प्रकाशित हुआ था और मैंने तभी उसे पढ़ लिया था। 1990 के दशक में भी मैंने ‘कसप’ पढ़ी थी, लेकिन बाद में नौकरी में तबादलों के दौरान किसी ने उस किताब को पढ़ने के लिए लिया, लेकिन वापस नहीं किया। तो मैं अपना मनपसंद उपन्यास फिर से पढ़ने का मोह संवरण नहीं कर पाया और उसे ख़रीद लिया।

 

जब मैं ‘कसप’ ख़रीद रहा था, तभी वहां यूनिवर्सिटी के छात्र गौरव राजवीर आ गए और उन्होंने मुझसे कहा, ‘सर डॉ. धर्मवीर भारती की पहली पत्नी कांता भारती का उपन्यास 'रेत की मछली' ज़रूर पढ़िए, यह ‘गुनाहों का देवता’ का जवाब है।’ उनके कहने का अर्थ था कि ‘गुनाहों का देवता’ में मेन चरित्र के केवल एक पक्ष को दिखाया गया है, उसका दूसरा पक्ष 'रेत की मछली' में है? उन्होंने कहा कि आप बस 'रेत की मछली' ज़रूर पढ़िए। अब बतौर आम पाठक गौरव ने 'रेत की मछली' की इस तरह समीक्षा कर दी थी तो ज़ाहिर है, मैंने उपन्यास ख़रीद लिया। मैं उपन्यास पढ़ने के बाद लगा कि मैं किताबें ख़ासकर उपन्यास तो 15 साल की उम्र से ही पढ़ रहा हूं, तो यह उपन्यास मैंने अब तक पढ़ी क्यों नहीं।

 

हफ़्ते भर मैंने रिसर्च किया। कई वरिष्ठजनों से चर्चा की। इसके बाद पता चला कि 'रेत की मछली' तो कांता भारती ने 1970 के दशक के आरंभ में ही लिख दिया था। चूंकि डॉ. धर्मवीर भारती ने उनका परित्याग कर दिया था और वह द टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की पत्रिका धर्मयुग के शक्तिशाली संपादक थे, तो उस समय किसी प्रमुख प्रकाशक की हिम्मत नहीं हुई कि कांता भारती के उपन्यास का प्रकाशन करे। इसके बावजूद 1975 में लोकभारती प्रकाशन के माध्यम से 'रेत की मछली' पुस्तक रूप में सामने आ गई। उस उपन्यास की समीक्षा करने का जोखिम किसी समीक्षक ने नहीं उठाया, क्योंकि उपन्यास का पुरुष चरित्र शोभन डॉ. भारती के स्वभाव से मेल खाता था।

 

1980 के दशक में पत्रकारिता में नए-नए आए युवा लेखक धीरेंद्र अस्थाना को 'रेत की मछली' की एक प्रति मिली। दिनमान में नई-नई नौकरी पाए धीरेंद्र अस्थाना ने उसकी समीक्षा लिख दी। समीक्षा बहुत ज़बरदस्त थी, तो दिनमान के संपादक ने उसे प्रकाशित भी कर दिया। यह लेखन और प्रकाशन दोनों एक्सीडेंटल था। दिनमान के बाज़ार में आने पर सबसे अधिक चर्चा 'रेत की मछली' की उस समीक्षा की ही हुई। तब लोगों ने 'रेत की मछली' का नोटिस लिया और पहला संस्करण हाथों हाथ बिक गया। चूंकि दिनमान द टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की पत्रिका थी तो दूसरे दिन ही धीरेंद्र अस्थाना को ‘इनाम स्वरूप’ शोकॉज नोटिस मिल गया। इसके बाद के समय तो धीरेंद्र अस्थाना के लिए दुःस्वप्न की तरह थे, जिन्हें वह आज बिल्कुल भी याद नहीं करना चाहते हैं।

 

हिंदी साहित्य-जगत में डॉ. भारती का दबदबा इस तरह था कि 'रेत की मछली' का दूसरा संस्करण ही नहीं प्रकाशित किया गया। चूंकि उपन्यास की प्रतियां बाज़ार में उपलब्ध नहीं थीं, इसलिए मुझ जैसे पाठक 'रेत की मछली' जैसे अद्भुत उपन्यास के बारे में जान ही न सके और पढ़ने से वंचित रह गए। 1997 में डॉ. भारती का निधन हो गया। इसके बाद बहुत साल बाद 2009 में देश के मशहूर पब्लिकेशन हाउस राजकमल प्रकाशन ने 'रेत की मछली' को फिर से प्रकाशित किया। इससे जो लोग इस उपन्यास को पढ़ने से वंचित थे, उन्हें भी यह उपन्यास पढ़ने को मिल गया।

 

गुनाहों का देवता’ उपन्यास एक प्रेम-कथा के रूप में मशहूर हुआ। इस उपन्यास को मैंने तरुणाई के आरंभिक काल में ही पढ़ लिया था। एक युवक के रूप में यह उपन्यास मुझे बहुत अधिक पसंद आई। एक बार पढ़ा तो इसे कई-कई बार पढ़ गया। चूंकि छात्र गौरव ने मेरी जिज्ञासा बढ़ा दी थी, तो मैंने 'रेत की मछली' भी ख़रीद लिया। हालांकि पहले मैंने ‘कसप’ को ख़त्म किया। उसके बाद मैंने 'रेत की मछली' पढ़ा। यह उपन्यास बहुत मार्मिक है। कहानी पढ़कर मुझे लगा कि इस पर कुछ लिखना चाहिए। फिर लगा डॉ. भारती जैसे साहित्य के शलाका पुरुष के बारे में कुछ लिखना मुझ जैसा पाठक की घृष्टता ही कही जाएगी। फिर भी मैं लिख रहा हूं और चर्चा करने जा रहा हूं डॉ. भारती के दोनों रूपों चंदर और शोभन की। चूंकि चंदर के चरित्र से लोग परिचित हैं, तो यहां मैं शोभन के क़िरदार की अधिक चर्चा करूंगा।

 

गुनाहों का देवता’ का चंदर का चरित्र आदर्शवादी है, लेकिन जब वह ‘रेत की मछली’ में शोभन के रूप में आता है तो वह कृतघ्न, स्वार्थी और निर्मम बन जाता है। यह बदलाव केवल दो उपन्यासों का अंतर नहीं दिखाता, बल्कि यह उस लेखक-पुरुष की दो परस्पर विरोधी छवियों को सामने लाता है, जिसे हिंदी साहित्य का कभी सबसे शक्तिशाली पुरुष माना गया था। चंदर वही है जिसे डॉ. भारती ने न सिर्फ़ सृजा, बल्कि कहीं न कहीं अपने ही आदर्श स्वरूप के रूप में गढ़ा। एक ऐसा पुरुष जो प्रेम को इतना पवित्र मानता है कि उसमें देह, इच्छा और यथार्थ के लिए कोई जगह नहीं है।

 

दूसरी ओर जब डॉ. भारती की पहली पत्नी कांता भारती ‘रेत की मछली’ लिखती हैं, तो वही पुरुष शोभन एकदम से संस्कारहीन, संवेदनहीन, प्रवंचक, लंपट और स्त्री-जीवन को रौंदने वाले अमानव रूप में सामने आता है। इसीलिए ‘रेत की मछली’ को कई समीक्षकों ने ‘गुनाहों का देवता’ का सशक्त जवाब कहा था, क्योंकि यह आदर्शवाद के आवरण को हटाकर लेखक के निजी जीवन की सच्चाई को उजागर करती है। 'रेत की मछली' कांता की आत्मकथा जैसी सहज और प्रवाहमय लगती है।

 

दो या तीन साल पहले धर्मयुग में काम कर चुके ओमजी ने धर्मयुग के सहकर्मियों का एक स्नेह सम्मेलन उत्तर भारतीय संघ में रखा था। उसमें धर्मयुग के दिनों की चर्चा हुई। उस कार्यक्रम में डॉ. भारती की पत्नी आदरणीया पुष्पा भारती जी ने कहा था कि 'गुनाहों का देवता' दरअसल, काल्पनिक नहीं, बल्कि डॉ. भारती की अपनी कहानी है और उपन्यास का नायक चंदर और कोई नहीं बल्कि ख़ुद डॉ. भारती हैं। ‘गुनाहों का देवता’ भूमिका में भारती ने लिखा है, मेरे लिए इस उपन्यास का लिखना वैसा ही रहा है, जैसे पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था के साथ प्रार्थना करना। यह भूमिका पुष्पा भारती के कथन की पुष्टि करती है।

 

'रेत की मछली' के नायक शोभन के क़िरदार को पढ़कर कोई कह ही नहीं सकता कि शोभन डॉ. भारती का क़िरदार नहीं है, क्योंकि शोभन का जीवन-चरित्र डॉ. भारती के इर्द-गिर्द ही घूमता है। शायद इसीलिए उपन्यास के प्रकाशन के बाद कुछ साहसी समीक्षकों ने इसे 'गुनाहों का देवता' का जवाब कहा था। चूंकि भारतीय समाज झूठ यानी आदर्शवाद को बहुत पसंद करता है, इसीलिए डॉ. भारती ने 'गुनाहों का देवता' में अपने किरदार को आदर्शवादी दिखाया है। यही वजह है कि प्रकाशित होते ही रातोंरात 'गुनाहों का देवता' हिट हो गई। इसके विपरीत 'रेत की मछली' में नायक शोभन का जो कृतघ्न रूप सामने आया है, वह डॉ. भारती के आदर्शवाद को एकदम से धराशायी कर देता है।

 

'रेत की मछली' में नायक शोभन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी करता है। यह शिक्षक ऐसा कलाकार, यानी इतना कृतघ्न और नीच है कि राखी बांधने वाली बहन मीनल, जो कलकत्ता में नौकरी करती है और जिसका अपने जीजा से शारीरिक संबंध रहता है, से ही इश्क़ करने लगता है। जी हां, जिस लड़की को बहन ही कहता है, उसके साथ ही सेक्स करता है। अपने इस इश्क़ को जस्टीफाई करने के लिए उसे पत्नी के रूप में एक ढाल चाहिए, तो वह इलाहाबाद से ही एक पत्रिका प्रकाशित करने वाले संपादक आनंदबाबू (इस क़िरदार को लोग उपेंद्रनाथ अश्क का क़िरदार मानते हैं) के साथ मिल कर साज़िश रचता है। आनंदबाबू भी लंपट आदमी है। एक बार तो वह मासूम कुंतल को ही किस करने का दुःस्साहस करता है।

 

विजातीय शोभन डॉ. आनंद के ऑफिस में कुंतल को देखा होता है और मान लेता है कि यह लड़की पत्नी बनकर उसका ढाल बनने के लिए सर्वथा उपयुक्त है। हालांकि दोनों में प्रेम हुआ या नहीं यह साफ़ नहीं है, लेकिन शोभन के नाटक को कुंतल प्रेम समझ बैठती है। जब कुंतल के पिता गैर-जाति के शोभन से उसका विवाह करने से इनकार कर देते हैं तो उसे आनंद दंपति दिग्भ्रमित कर देते हैं और वह उनकी शह पर बग़ावत का मन बना लेती है। लिहाज़ा, लाचार होकर पिता कुंतल की शादी शोभन से कर देता है। कुंतल विवाह में प्रेम लेकर आई थी, लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास होता है कि वह शोभन के लिए सिर्फ़ एक ढाल, एक कवच है, जिसके सहारे वह मीनल को अपने जीवन में बनाए रख सके।

 

दरअसल, इलाहाबाद में रहते हुए भी शोभन की दुनिया का केंद्र मीनल ही रहती थी। कुंतल के मन में शक की पहली चिनगारी तब जलती है, जब वह दोनों को अनुचित निकटता में देख लेती है। पर वह अपनी आंख पर शक कर बैठती है, क्योंकि प्रेम और विश्वास उसे धोखा दे जाने के लिए तैयार नहीं होते। एक दिन वह शोभन को मीनल को बांहों में लेकर किस करते हुए देखती है, फिर भी उसे अपनी आंखों पर यक़ीन नहीं होता। कालांतर में वह शोभन और मीनल को सेक्स करते हुए पकड़ लेती है। इसके बाद तो शोभन हैवान बन जाता है। मीनल से कुंतल के सामने सेक्स करता है और कुंतल को यह सब देखने पर मजबूर भी करता है। वह मीनल के लिए रक्तकमल जैसे विशेषण का इस्तेमाल करता है और अपनी पत्नी को गलत साबित करता है।

 

यह वह मोड़ है, जहां कुंतल का पूरा संसार बिखर जाता है, लेकिन वह चुप रहती है। वह यह अत्याचार इसलिए भी सहती है, क्योंकि उसने अपने पिता और परिवार से बग़ावत करके यह रिश्ता बनाया है। अब विवाह उसके लिए बोझ बन जाता है। शोभन हर जगह मीनल को साथ ले जाना चाहता है। यहां तक कि जब देश के सबसे बड़े अख़बार समूह का मालिक अपनी मुंबई से प्रकाशित मशहूर साप्ताहिक पत्रिका का संपादक बनाने का ऑफर शोभन को देता है और नौकरी की शर्ते तय करने के लिए उसे देहरादून बुलाया तो शोभन देहरादून मीनल को साथ ले जाना चाहता है। चूंकि पत्रिका के मालिक का भारतीय मूल्यों में अटूट आस्था है तो शोभन जानता है कि केवल मीनल को साथ ले जाने से काम बिगड़ सकता है। उसका मशहूर पत्रिका का संपादक बनना ख़तरे में पड़ सकता है, तो वह ढाल के रूप में कुंतल को भी साथ ले लेता है।

 

देहरादून में पत्रिका के मालिक से मीनल का परिचय अपनी बहन और कुंतल का परिचय अपनी पत्नी के रूप में करवाता है। इस दौरान कुंतल उसके बच्चे की मां बन जाती है। बंबई में पत्रिका का संपादक बनने के बाद उसका असली चेहरा और नंगा होकर सामने आता है। जब कुंतल अपनी बेटी को लेकर बंबई पहुंचती है तो पता चलता है कि मीनल घर में शोभन की बीवी बनकर रह रही थी। शोभन दो बेडरूम वाले फ्लैट में मीनल के साथ एक कमरे में सोता है और उसकी बेटी तोरू की मां कुंतल दूसरे कमरे में सोती है। यह अपमान की पराकाष्ठा है, जो केवल उसी पुरुष के अहंकार से उपज सकता है, जिसने जीवन में दूसरे की भावनाओं को कभी किसी मूल्य के रूप में नहीं देखा हो।

 

पता चलता है कि शोभन गिरा हुआ इंसान ही नहीं बल्कि पूरा जानवर है। हां, उसका असली रूप धीरे-धीरे कुंतल के सामने आता है। शोभन की क्रूरता सिर्फ मानसिक नहीं, बल्कि शारीरिक भी है। सहन-सीमा के जवाब दे देने पर कुंतल विरोध करती है, तो शोभन उसे बुरी तरह पीटता है। पीटने का यह सिलसिला एक बार शुरू हो जाने पर वह बार-बार कुंतल को पीटता है। वह इंसान के रूप में पशु बन जाता है। उसकी क्रूरता सड़क छाप पतियों वाले हिंसक व्यवहार का स्वरूप ले लेती है। वह पत्नी को आए दिन पीटता है। कहने का तात्पर्य कि यह वही प्रोफेसर शोभन है, जिसे लोग साहित्यकार, विचारक और सभ्य समाज का आइकन मानते हैं। लेकिन घर के भीतर वह गिरा हुआ इंसान ही नहीं बल्कि एक ऐसा पशु है जो अपनी इच्छाओं और अपराधों को वैध बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

 

बाद में वह मीनल से शादी करने की योजना बनाता है। तो कुंतल से मुक्ति पाने के लिए स्टैंप पेपर पर उससे एक पत्र लिखवाता है। पत्र में कुंतल लिखती है कि उसका इलाहाबाद की पत्रिका के संपादक आनंदबाबू से शारीरिक संबंध था और वह आनंदबाबू के साथ रहने के लिए वापस इलाहाबाद जा रही है, इसलिए शोभन को तलाक देना चाहती है। इसी झूठ को अदालत में पेश कर वह तलाक पा लेता है। कुंतल वापस इलाहाबाद लौटती है और हॉस्टेल में रहने लगती है।

 

'रेत की मछली' को कांता भारती ने बहुत सहज ढंग से लिखा है। उनका लेखन कहीं भी चीखता नहीं, लेकिन हर पंक्ति में एक दबा हुआ दर्द और एक गहरी सच्चाई रिसती है। वह किसी आरोप की तरह नहीं, बल्कि एक अनुभव की तरह सामने आती है। इसकी कथा इतनी वास्तविक लगती है कि उस पर अविश्वास करने का कोई कारण ही नज़र नहीं आता है। एक स्त्री जो एक पुरुष की लिखी कथा में त्याग करके पूज्य बनती है, और एक स्त्री की लिखी कथा में वह त्याग करके अकेली, टूटी और अपमानित छोड़ दी जाती है। यानी चंदर का देवत्व दरअसल वही स्वच्छ-धोई हुई छवि है, जिसे एक पुरुष लेखक गढ़ सकता है, जबकि शोभन उसी पुरुष की वह सच्चाई है जिसे एक पत्नी ने बिना मेकअप के, बिना आदर्शवाद के, जैसा देखा वैसा लिख दिया।

 

'गुनाहों का देवता' में चंदर को डॉ. धर्मवीर भारती ने आदर्शवादी और फिल्मी बना दिया है। चंदर और शोभन दो ऐसे ध्रुवीय व्यक्तित्व हैं जो एक ही सिक्के के दो पहलू प्रतीत होते हैं। चंदर के लिए प्रेम पूजा है, श्रद्धा है, और देवी-भावना है। वह सुधा को देवी के आसन पर बिठाता है और उस प्रेम को इतना पवित्र मानता है कि उसमें शारीरिक आकर्षण या यथार्थ जीवन की मांगों को शामिल करना 'गुनाह' समझता है।

 

दूसरी तरफ़ शोभन के लिए विवाह एक सामाजिक आवश्यकता है, या शायद एक ऐसी संस्था जो उसकी सुविधा और ज़रूरतों की पूर्ति करने का माध्यम बने। वह बाहर से तो लेखक और विचारक है, लेकिन निजी जीवन में स्नेहहीन और संवेदनहीन है। शोभन का बाहरी जगत में बुद्धिजीवी और लेखक के रूप में अपार सम्मान है, वह ज्ञान और प्रगति की बातें करता है। लेकिन उसका आंतरिक और नैतिक आचरण बिलकुल विपरीत है। वह अपनी पत्नी कुंतल की भावनाओं और आवश्यकताओं के प्रति पूरी तरह उपेक्षा का भाव रखता है।

 

हालांकि कई आलोचक चंदर के चरित्र में निहित अहंकार और भावनात्मक अस्पष्टता को ही 'रेत की मछली' के नायक शोभन के निर्मम व्यवहार का कारण मानते हैं। यानी, चंदर का आदर्शवाद ही अंततः पत्नी के लिए यातना बन जाता है। 'गुनाहों का देवता' में जहां सुधा त्याग करके पूजनीय बन जाती है, वहीं 'रेत की मछली' में कुंतल पीड़ित और अकेली रह जाती है। यह दिखाता है कि एक पुरुष-रचित आदर्शवादी कथा में स्त्री का अंत कैसे होता है और स्त्री-रचित यथार्थवादी कथा में उसका संघर्ष कैसा होता है। संक्षेप में कहें तो 'गुनाहों का देवता' एक रोमांटिक मिथक है और 'रेत की मछली' उस मिथक का दर्दनाक अंत है। यही दोनों उपन्यासों का सबसे बड़ा सच है— एक मिथक है, दूसरा उसका टूटना।

 

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