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एक और कदम हिंदी गज़ल की ओर – एम. एल. गुप्ता आदित्य

कुछ सप्ताह पहले  हिंदी गजलों की एक पुस्तक आई है “धानी चुनर”। इस पुस्तक के लेखक हैं नवीन सी चतुर्वेदी, जो अनेक विधाओं व भाषाओँ में सृजन करने वाले कवि / लेखक हैं। इस पुस्तक का श्रीगणेश गणपति, शारदे, शिव, राम, कृष्ण, जगदम्बा एवं गुरू वन्दना जैसी ईश आराधनाओं के साथ किया गया है, जो

हिंदी गजल के प्रति आस्था का उद्घोष हैं 'धानी चुनर' की हिन्दी गजलें - देवमणि पाण्डेय



नवीन चतुर्वेदी के नए गजल संग्रह का नाम है धानी चुनर। इससे पहले ब्रज गजलों के उनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इस संग्रह में 87 रसीली एवं व्यंजनात्मक हिंदी गजलें शामिल हैं। संग्रह की पहली गजल में उन्होंने हिंदी गजल के प्रति अपनी आस्था का उद्घोष किया है- 


ओढ़कर धानी चुनर हिंदी गजल
बढ़ रही सन्मार्ग पर हिंदी गजल
देवभाषा की सलोनी संगिनी
मूल स्वर में है प्रवर हिंदी गजल
 
हिंदी भाषा के पास संस्कृत की परंपरा से प्राप्त विपुल शब्द संपदा है। नवीन जी ने इस शब्द संपदा का सराहनीय उपयोग किया है। ऐसे बहुत से शब्द हैं जो हमारी बोलचाल से बाहर होकर हमारी स्मृति या शब्दकोश तक सीमित हो गए हैं। नवीन जी ने इनको गजलों में पिरो कर संरक्षित करने का नेक काम किया है। तदोपरांत और अंततोगत्वा ऐसे ही शब्द हैं। गजल में इनकी शोभा देखिए-
 
हृदय को सर्वप्रथम निर्विकार करना था
तदोपरांत विषय पर विचार करना था
 
अंततोगत्वा दशानन हारता है राम से
शांतिहंता शांति दूतों को हरा सकते नहीं
 
फ़िराक़ गोरखपुरी ने एक बातचीत में कहा था कि हिंदुस्तान में ग़ज़ल को आए हुए अरसा हो गया। अब तक उसमें यहां की नदियां, पर्वत, लोक जीवन, राम और कृष्ण क्यों शामिल नहीं हैं? कवि नवीन चतुर्वेदी ने अपने हिंदी गजल संग्रह 'धानी चुनर' में फ़िराक़ साहब के मशवरे पर भरपूर अमल किया है। उनकी हिंदी गजलों में हमारी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ हमारे पौराणिक चरित्र राम सीता, कृष्ण राधा, शिव पार्वती आदि अपने मूल स्वभाव के साथ शामिल हैं। हमारी आस्था के केंद्र में रहने वाले ये पात्र अपनी विशेषताओं के साथ बार-बार नवीन जी की हिन्दी गजलों में आते हैं और हमारी सोच एवं सरोकार का हिस्सा बन जाते हैं-
 
अगर अमृत गटकना हो तो कतराते हैं माहेश्वर
मगर विषपान करना हो तो आ जाते हैं माहेश्वर
 
निरंतर सद्गुणों का उन्नयन करते हुए रघुवर
यती बनकर जिए पल पल जतन करते हुए रघुवर
 
किसी भी रचनाकार का एक दायित्व यह भी होता है कि वह समाज के कुछ विशिष्ट मुद्दों को रेखांकित करे ताकि दूसरों के मन में भी सकारात्मक सोच का उदय हो। इसी सामाजिक सरोकार के तहत नवीन चतुर्वेदी ने कई गजलों में स्त्री अस्मिता को रेखांकित करने की अच्छी कोशिश की है-
 
हे शुभांगी कोमलांगों का प्रदर्शन मत करो
ये ही सब करना है तो संस्कार वाचन मत करो
सृष्टि के आरंभ से ही तुम सहज स्वाधीन थीं
क्यों हुई परवश विचारो, मात्र रोदन मत करो
 
सामाजिक सरोकार के इसी क्रम में नवीन जी ने पुरुषों की मानसिकता को भी उद्घाटित किया है-
 
व्यर्थ साधो बन रहे हो, कामना तो कर चुके हो
उर्वशी से प्रेम की तुम, याचना तो कर चुके हो
 
जैसे नटनागर ने स्पर्श किया राधा का मन
उसका अंतस वैसी ही शुचिता से छूना था
 
इन गजलों में नयापन है, ताज़गी है और कथ्य की विशिष्टता है। ये गजलें उस मोड़ का पता देती हैं जहां से हिंदी गजल का एक नया कारवां शुरू होगा-
 
दुखों की दिव्यता प्रत्येक मस्तक पर सुशोभित है
समस्या को सदा संवेदना की दृष्टि से देखें
 
वो जो दो पंक्तियों के मध्य का विवरण न पढ़ पाए
उसे पाठक तो कह सकते हैं संपादक कहें कैसे
 
नवीन चतुर्वेदी की हिंदी गजलें प्रथम दृष्टि में शास्त्रीय संगीत की तरह दुरूह लगती हैं। मगर जब आप इन के समीप जाते हैं, इन्हें महसूस करते हैं तो इनमें निहित विचारों और भावनाओं की ख़ुशबू से आपका मन महकने लगता है। ये कहना उचित होगा कि नवीन चतुर्वेदी की हिंदी गजलें किसी संत के सरस प्रवचन की तरह हैं जो हमारे अंतस को आलोकित करती हैं और मन को भी आह्लादित करती हैं। इस रचनात्मक उपलब्धि के लिए मैं नवीन सी. चतुर्वेदी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
 
इस किताब के प्रकाशक हैं आर. के. पब्लिकेशन मुंबई। उनका संपर्क नंबर है- 90225-21190, 98212-51190
 
आपका-
देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

क्षेत्रीय भाषाओं से हिन्दी को नुकसान - नवीन

लोहड़ी, पोंगल और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ। 

एक महत्वपूर्ण विषय पर स्वस्थ-विमर्श हेतु सभी साथियों से निवेदन। 

पूरे देश में आज कल जहाँ एक तरफ़ भोजपुरी व अवधी को भाषाओं की सूची (आठवीं अनुसूची) में स्थान दिलवाने हेतु प्रयास चल रहे हैं वहीं दूसरी ओर कुछ विद्वान इस के विरोध में भी उठ खड़े हुये हैं। 

जो पक्ष में हैं वह अपने अस्तित्व, अपने पुरखों की पहिचान को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। जो विपक्ष में हैं उन का कहना है कि अगर क्षेत्रीय भाषा-बोलियों को सूची में शामिल किया गया तो हिन्दी अपना दर्ज़ा खो देगी एवम् उस की जगह उर्दू ले लेगी। 

मैं समझता रहा हूँ कि उर्दू भाषा या बोली न हो कर एक लहजा (pattern) है जो नस्तालीक़ (फ़ारसी स्क्रिप्ट) और देवनागरी के साथ-साथ रोमन में भी लिखी जाती है। यक़ीन जानिये इसे हिब्रू में भी लिखा जा सकता है। इसी तरह संस्कृत को भी बहुत पहले से नस्तालीक़ व रोमन आदि लिपियों में लिखा जाता रहा है। 

मैं समझता रहा हूँ कि भले ही आजकल हिंगलिश लहजा (pattern) सर चढ कर बोल रहा है मगर यह एक स्वतन्त्र भाषा या बोली नहीं है - कम-अज़-कम अब तक तो नहीं ही है। 

मैं समझता रहा हूँ कि भाषा-बोली एवम् लिपि दो अलग विषय-वस्तु हैं। आज दुनिया की तमाम भाषाएँ रोमन में भी लिखी जा रही हैं। मगर इस के चलते सारी दुनिया का ब्रिटेनीकरण तो नहीं हो गया। 

मैं समझता रहा हूँ कि ब्रजभाषा एक समय पूरे संसार की साहित्यिक भाषा रही है। मगर अफ़सोस आज ब्रजभाषा चर्चाओं में नहीं है। शायद समय को यही स्वीकार्य हो। शायद ब्रजभाषा सद्य-प्रासंगिक स्तरों  से बचते हुये संक्रमण काल की प्रतीक्षा कर रही हो। 

मैं समझता रहा हूँ कि आज भी हम तथाकथित हिन्दी-उर्दू भाषी व्यक्ति, तथाकथित हिन्दी-उर्दू की बजाय, अवधी-भोजपुरी-राजस्थानी-ब्रज-हिमाचली-गुजराती-मराठी आदि ही अधिकांशत: बोलते हैं। या फिर हिन्दुस्तानी या हिंगलिश या इंगलिश। दक्षिण भारत का मुसलमान तुलू-कन्नड़-तमिल आदि बोलता है। बांग्लादेश में आज भी बंगाली बोली जाती है। 

मैं समझता रहा हूँ कि यदि हमारी हिन्दवी या हिन्दुस्तानी ज़ुबान को तथाकथित हिन्दी या उर्दू के दायरों में न बाँटा जाता तो कहीं ज़ियादा बेहतर होता।  

विमर्श का केन्द्र - क्षेत्रीय बोलियों को सूची में शामिल करने से हिन्दी को होने वाले नुकसान - है। 

आप सभी साथियों से निवेदन है कि इस स्वस्थ-विमर्श में अपने मूल्यवान विचारों को अवश्य रखें। 

सादर, 

नवीन सी• चतुर्वेदी 


9967024593 
13.01.2016