जब सन 2023 का वर्ष समग्र
भारतवर्ष में अमृत महोत्सव के रूप में मनाया गया तो आपने भी इस स्वर्णिम अवसर पर
अदब की ख़िदमत में देश भर के अनेक शायर-शायरात से सम्पर्क कर भिन्न-भिन्न ७५ रदीफ़ों
की ग़ज़लें एकत्रित कर उनका संकलन एवं सम्पादन कर के राष्ट्रीय उत्सव के आनन्द में
अभिवृद्धि की. 2023 में आपने जो अन्य महत्कर्म किये उनमें उनके काव्यगुरू आदरणीय
हफ़ीज़ बनारसी जी की ग़ज़लों के “क्या सुनाएँ हाले-दिल” एवं “आज फूलों में ताज़गी कम
है” नामक दो संग्रहों के प्रकाशन के साथ-साथ “वंदन!शुभ अभिवन्दन” शीर्षक के
अन्तर्गत देव-स्तुति विषयक काव्य संग्रह भी सम्मिलित है.
जिस उम्र में लोग
लेटने-बैठने या बहुत से बहुत टहलने में अपना समय ख़र्च कर देते हैं उस आयु में
आदरणीय रमेश कँवल जी एक के बाद एक धमाके करते जा रहे हैं. शायद ही शायरी से जुड़ा
कोई इलाका होगा जहाँ के लोग रमेश जी के प्रयासों से परिचित न हों. सन 2024
प्रत्येक भारतीय के लिए आल्हाद वर्धक रहा. 500 वर्षों के घोर संघर्ष के बाद
अयोध्या में राम लला की पुनः विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा हुई. 22 जनवरी, 2024 का दिन इतिहास में एक अद्भुत दिन की तरह याद किया जायेगा. अपवाद
स्वरुप कुछ विघ्न-संतोषियों को भुला दिया जाए तो प्रत्येक भारतवासी ने उस दिन
उल्लास का प्रत्यक्ष अनुभव किया. सभी को लगा कि उनके अपने घर में कुछ अच्छा हो रहा
है. यह धर्म से अधिक आस्था का विषय है और शायद इसीलिए रमेश जी को भी पुनः कुछ
अभिनव करने की प्रेरणा मिली. आपने एक और ऐतिहासिक कार्य करने की ठान ली और बस जी
जान से जुट गये.
देश-विदेश के अनेकानेक
शायर-शायरात से सम्पर्क कर के 24 अलग-अलग बह्रों में ग़ज़लें भेजने का अनुरोध किया.
विशेषकर सभी से आग्रह किया कि ये ग़ज़लें 2024 में ही सृजित हों. इस तरह 95
शायर-शायरात की 24 बहरों में 876 ग़ज़लों का अभूतपूर्व संकलन-सम्पादन कर के आपने एक
और इतिहास रच दिया. 710 पन्नों की यह पुस्तक किसी पुराण की तरह प्रतीत होती है.
ग़ज़ल के चाहने वालों के लिए यह किसी पुराण से कम है भी नहीं. प्रशासनिक सेवाओं के
अनुभवों का सदुपयोग करते हुए रमेश जी ने इस संकलन की साज-सज्जा में अपना सर्वस्व
लगा दिया है. अनुक्रमाणिका ही देखें तो पोएट वाइज, ग़ज़ल
वाइज, बह्रवाइज है. सभी के परिचय अलग से दिये गये हैं. उसके
अलावे सभी के फ़ोन नम्बर की अलग से सूची है. किस शायर-शायरा की कितनी ग़ज़लें
सम्मिलित हैं उसकी एक सूची अलग से है. पुस्तक के फ़्लैप्स में पतियों द्वारा
पत्नियों एवं पत्नियों द्वारा पतियों के लिए लिखे गये 24 शेर प्रस्तुत किये गये
हैं. एक खण्ड में शायर-शायरात के रंगीन फोटो हैं और दूसरे खण्ड में उनके जीवनसाथी
के साथ के रंगीन फोटो हैं. हर बह्र के अरकान दिये गये हैं साथ में प्रचलित फ़िल्मी
गीतों के सन्दर्भ भी प्रस्तुत किये गये हैं. पुस्तक की शुरुआत में ही भारतीय जन-मन
के आराध्य रामलला के मनोहारी दर्शन हैं. इस संग्रह के आरम्भ में ही आपने वसुधैव
कुटुम्बकम को प्रणाम करते हुए अपने दादा जी एवं दादी जी को भी याद किया है. एक और
अद्भुत बात कि यह संकलन आपने अपने मित्रों को समर्पित कर के एक और अद्भुत आत्मीयता
का परिचय दिया है.
आज के दौर में जहाँ नये
लोगों से मात्र दो या चार रचनाएँ छापने के लिए साझा संकलन के नाम पर लोग हज़ार पाँच
सौ रुपये बेझिझक माँग लेते हैं वहीं रमेश कँवल जी ने अनेक शायरों / शायराओं को देश
के कोने कोने तक बिना एक भी पैसा लिए पहुँचाने का पुण्यकर्म किया है ।
रमेश कँवल जी स्वयं भी एक
सिद्धहस्त शारदात्मज हैं । विषय के जानकार हैं और उनकी ग़ज़लें तमाम पत्र पत्रिकाओं
में प्रकाशित होती रहती हैं । इनकी कुछ ग़ज़लों को ग़ज़ल गायकों ने गाया भी है । रमेश
जी अपने काव्यगुरु श्री हफ़ीज़ बनारसी जी की स्मृति में सालाना जलसे भी करवाते रहते
हैं ।
रमेश जी के काम को एक आलेख
में समेट पाना बहुत कठिन है । इनके प्रयासों के गाम्भीर्य को समझने के लिए इनके
उपरोक्त संकलनों को पढ़ना चाहिए । जहाँ एक ओर रमेश जी ने शायरी की भरपूर ख़िदमत की
है वहीं दूसरी ओर इन्होंने राष्ट्र गौरव के प्रतीकों, गाथाओं और उद्धरणों को अपने संकलनों में प्रमुखता से स्थान दिया है ।
इनके द्वारा प्रकाशित /
सम्पादित पुस्तकों की सूची
इनके स्वयं के ग़ज़ल संग्रह:
लम्स का सूरज 1997
सावन का कँवल 1997
शोहरत की धुप 2013
रंग-ऐ-हुनर 2016
स्पर्श की चाँदनी
(ग़ज़लें-नज़्में) 2019
इतराती बलखाती ग़ज़लें 2024
अमृत काल की आधुनिक ग़ज़लें
2024
सम्पादित पुस्तकें:
अक़ीदत के फूल (ग़ज़लें –
नज़्में) 2020
2020 की नुमाइन्दा ग़ज़लें
(600 ग़ज़लों का संकलन) 2021
21 वीं सदी के 21 वें साल की
बेहतरीन ग़ज़लें – 2022
एक रुकनी अनूठी ग़ज़लें – 2022
अमृत महोत्सव की ग़ज़लें (75
रदीफ़ों पर ग़ज़लें) – 2023
वन्दन शुभ अभिवन्दन, देव स्तुति संग्रह – 2023
क्या सुनाएं हाले-दिल – हफ़ीज़
बनारसी साहब की ग़ज़लों का संग्रह – 2023
आज फूलों में ताज़गी कम है –
हफ़ीज़ बनारसी साहब की ग़ज़लों का संग्रह – 2023
लहू का सफ़र – वफ़ा सिकंदरपुरी
ग़ज़लों का संग्रह – 2023
24 बह्रों में 2024 की दिलकश
ग़ज़लें – 2024
उपरोक्त लिस्ट मेरे दावे की
दलील में एक छोटा सा नमूना है. रमेश जी ने वाक़ई बहुत बड़ा काम किया है. इन से पहले
भी एक से बढ़कर एक साहित्यसेवी हुए है और भविष्य में भी अवश्य ही यह परम्परा आगे ही
बढ़ने वाली है मगर एक बात कहनी पड़ेगी कि विशेषकर ग़ज़लों के क्षेत्र में भारतीयता का
जो मूल तत्व रमेश जी के काम में आद्योपान्त दिखाई पड़ता है वह कम से कम अब से पहले
तो नहीं ही देखा गया. माँ वीणा पाणिनि से प्रार्थना है कि रमेश जी को दीर्घायु
प्रदान करें ताकि ये और भी कुछ मील के पत्थर पेश कर सकें. अस्तु!

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