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कह रहे हैं बड़े मज़े में हैं - नवीन

कह रहे हैं बड़े मज़े में हैं
सब के सब क्या मुगालते में हैं
मैं न कहता था आ रहा है चाँद
कुछ सितारे भी रास्ते में हैं
ख़ुद को आवाज़ दी तो इल्म हुआ
ज़िन्दगी! सब तेरे कहे में हैं
हमने हर दौड़ नींद में जीती
मुश्किलें सिर्फ़ जागते में हैं
मैं कहाँ हूँ मुझे नहीं मालूम
हाँ, मेरे पाँव – बुतकदे में हैं
मन सभी के सुलह को हैं तैयार
सिर्फ़ तन ही मुक़ाबले में हैं
जिस्म को कम न आँकिये साहब
सब सरंजाम इस किले में हैं
मछलियाँ किस तरह रखें रोज़े
ख़ामियाँ अपने सोचने में हैं
सच बताना मिले हैं किस-किस से
हार, जो आप के गले में हैं
नवीन सी चतुर्वेदी
बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22

और तआरुफ़ हमारा हो भी क्या - नवीन

और तआरुफ़ हमारा हो भी क्या
इक शनावर जो डूब तक न सका
कुछ भँवर यूँ उचट पड़े थे ज्यूँ
ख़ुदकुशी पर हो कोई आमादा
एक बगूले की बात थोड़ी है
हर बगूले ने गर्द को रौंदा
बुलबुले सत्हे-आब को छू कर
हम को दुनिया का दे गये नक्शा
वो तो साँसों ने शामें सुलगाईं
आदमी को ये इल्म ही कब था
अब हवाओं के दाम खुलने हैं
ख़ुश्बुओं का तो हो चुका सौदा
अब वो ख़ुद को समझते हैं सूरज
जिन सितारों का चाँद मामा था
:- नवीन सी. चतुर्वेदी
बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22

हँसते-हँसते गुजार देते हैं, हर गुजरते हुये समय के लोग - नवीन

हँसते-हँसते गुजार देते हैं
हर गुजरते हुये समय के लोग
ख़ामुशी को ज़ुबान देते हैं
शोर करते हुये समय के लोग

हम ने साहिल बनाये दरिया पर
और आतिश को फैलने न दिया
हाय! क्या-क्या समेट लेते थे
उस बिखरते हुये समय के लोग

ऐ तरक़्क़ी जवाब दे हम को
बोल किस-किस पे रड़्ग उँड़ेल आयी
इतना बेरड़्ग हो नहीं सकते
रड़्ग भरते हुये समय के लोग

जो भी उस पार उतर गये एक बार
फिर कभी लौट कर नहीं आये
तैरना भूल जाते हैं शायद
पार उतरते हुये समय के लोग

सूर तुलसी कबीर के किरदार
हम को ये ही सबक सिखाते हैं
ऊँची-ऊँची उड़ान भरते हैं
पर कतरते हुये समय के लोग

स्वर्ग जैसी वसुन्धरा अपनी
जाने कब की बना चुके होते
रोक लेते हैं एक तो हालात
और डरते हुये समय के लोग

बन्दगी सब से आला कोशिश है
और इबादत मशक़्क़ते-उम्दाह
इसलिये ही तो मस्त रहते हैं

रब सुमरते हुये समय के लोग

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 


बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22

ऐसे भक्तों की भीड़ आई है सहमे-सहमे सभी नज़ारे हैं - श्री हरि

ऐसे भक्तों की भीड़ आई है सहमे-सहमे सभी नज़ारे हैं
ठिठकी-ठिठकी सी सरयू की लहरें ख़ौफ़ खाये हुये किनारे हैं

चादरें राम-नाम की ओढ़े दोस्त खञ्ज़र लिये पधारे हैं
दोस्ती के दरख़्त मुरझाये हाथ में मुल्ला जी के आरे हैं

इन की आवाज़ में भरी तल्ख़ी उन की तक़रीर में शरारे हैं
इस तरफ़ हैं घृणा के व्यापारी उस तरफ़ नफ़रतों के मारे हैं

हर तरफ़ आँधियों का आलम है और गर्दिश में सब सितारे हैं
भूल कर भी न लोग कहते हैं तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं

:- श्री हरि

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून [दुगुन]
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22

3 ग़ज़लें - नीरज गोस्वामी

समझेगा दीवाना क्या
बस्ती क्या वीराना क्या

ज़ब्त करो तो बात बने
हर पल ही छलकाना क्या

हार गए तो हार गए
इस में यूँ झल्लाना क्या

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या

दुःख से सुख में लज्ज़त है
बिन दुःख के सुख पाना क्या ?

इसका खाली हव्वा है
दुनिया से घबराना क्या

फूलों की तरहा झरिये
पत्तों सा झड़ जाना क्या

किसने कितने घाव दिये
छोडो भी, गिनवाना क्या

'नीरज' सुलझाना सीखो
मुद्दों को उलझाना क्या 



ज़िन्दगी में जो ग़म नहीं होता

नाम रब का अहम् नहीं होता

तुझ में बस तू बचा है मुझमें मैं
अब के रिश्तों में हम नहीं होता

क़त्ल अब खेल बन गया क्यूँ की
सर सज़ा में कलम नहीं होता

दोस्ती हो के दुश्मनी इसमें
यार कोई नियम नहीं होता

रोटियों के सिवा ग़रीबों का
और कुछ भी इरम नहीं होता

आप मुड़ कर न देखते तो हमें
प्यार है, ये भरम नहीं होता

चीखता है वही सदा " नीरज"
जिसकी बातों में दम नहीं होता
 बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22


बंद रखिए तो इक अँधेरा है
खोलिए आँख तो सवेरा है

साँप यादों के छोड़ देता है
शाम का वक्त वो सँपेरा है

फ़ासला इक बहुत जरूरी है  
यार के भेष में बघेरा है

ताजपोशी उसी की होनी है
मुल्क में जो बड़ा लुटेरा है

मरहला है सरायफानी ये
चार दिन का यहाँ बसेरा है

रूह बेरंग क्यों ना हो साहब
हर कोई जिस्म का चितेरा है

शाम दर पे खड़ी है ऐ नीरज

अब समेटो जिसे बिखेरा है
 बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22

:- नीरज गोस्वामी
9860211911

ज़िन्दगी के हसीं मक़ाम पे हूँ - हादी जावेद



ज़िन्दगी के हसीं मक़ाम पे हूँ
ऐसा लगता है राहे आम पे हूँ

साथ देते नहीं हैं पाँव मेरे
जाने किस राहे तेज़गाम पे हूँ

लफ्ज़ ख़ामोश हो गए सारे
कौन सी मंज़िले-कलाम पे हूँ

सुब्ह के दर पे लोग आ पहुँचे
मैं अभी तक मुहाज़े-शाम पे हूँ

पस्तियों के भँवर में उलझा हूँ
फिर भी लगता है औजे-बाम पे हूँ

अब भी सरसब्ज़ हूँ मैं ज़ख़्मों से
मुन्हसिर दर्दे-न-तमाम पे हूँ

लोग पीते हैं चश्मे-साकी से
मुतमईन मैं शराबे-जाम पे हूँ

जीस्त की इब्तिदा न कर पाया
उम्र के आखरी मक़ाम पे हूँ

एक कहानी हूँ मैं कोई 'हादी '
या फ़साना कि इख़्तिताम पे हूँ

मक़ाम - स्थान, तेज़गाम - तेज़ रास्ता, कलाम - गुफ्तगू, मुहाज - मोर्चा, पस्तियों - गहराइयाँ , निचाइयां, औजे-बाम—उंचाइयां, सरसब्ज़-- हरा भरा, मुन्हसिर – निर्भर, ज़ीस्त -- ज़िंदगी इब्तिदा – शुरुआत, इख़्तिताम - खत्म


हादी जावेद
8273911939


बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22


चोट पर उसने फिर लगाई चोट - सालिम शुजा अन्सारी

चोट पर उसने फिर लगाई चोट
हो गई और भी सिवाई चोट

उम्र भर ज़ख्म बोए थे उस ने
उम्र भर हम ने भी उगाई चोट

मरहम ए एतबार की खातिर
मुद्दतों खून में नहाई चोट

दिल का हर ज़ख्म मुस्करा उठा
देख कर उसको याद आई चोट

होंठ जुम्बिश न कर सके लेकिन
कर गई फिर भी लब क़ुशाई चोट

आज बे साख्ता वो याद आया
आज मौसम ने फिर लगाई चोट

मिट गए सब निशान ज़ख्मों के
कर गई आज बे वफ़ाई चोट

ज़र्ब यूँ तो बदन पे थी “सालिम ”
रूह तक कर गयी रसाई चोट

:- सालिम शुजा अन्सारी
9837659083

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2122 1212 22

यह अजूबा तो हो नहीं सकता - नवीन

नया काम 



यह अजूबा तो हो नहीं सकता।
सब कुछ अच्छा तो हो नहीं सकता॥ 

जिस पै आता है उस पै आता है। 
दिल सभी का तो हो नहीं सकता॥

चाह को ताक पर रखें कब तक। 
यों गुज़ारा तो हो नहीं सकता॥

और कुछ रासता नहीं, वरना।
ग़म गवारा तो हो नहीं सकता॥

साथ में होगी उस के रुसवाई।
इश्क़ तनहा तो हो नहीं सकता॥

अब से बस मुस्कुरा के देखेंगे।
तुम से झगड़ा तो हो नहीं सकता॥



******* 

उस के जैसा तो हो नहीं सकता
बाप, बेटा तो हो नहीं सकता

फूल कितनी भी गन्ध फैलाये
गन्ध जितना तो हो नहीं सकता

कोई अम्मा को जा के समझाये
मैं सितारा तो हो नहीं सकता

अब से बस मुस्कुरा के देखेंगे
तुम से झगड़ा तो हो नहीं सकता

ये ज़मीं ही लचक गई होगी
चाँद आधा तो हो नहीं सकता  

:- नवीन सी. चतुर्वेदी


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फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22

लौट आमंगे सब सफर बारे - नवीन

लौट आमंगे सब सफर बारे
हाँ ‘नवीन’ आप के सहर बारे

आँख बारेन कूँ लाज आबतु ऐ
देखत्वें ख्वाब जब नजर बारे

नेंकु तौ देख तेरे सर्मुख ई
का-का करत्वें तिहारे घर बारे

एक कौने में धर दयौ तो कूँ
खूब चोखे तिहारे घर बारे

रात अम्मा सूँ बोलत्वे बापू
आमत्वें स्वप्न मो कूँ डर बारे

खूब ढूँढे, मिले न सहरन में
संगी-साथी नदी-नहर बारे

जहर पी कें सिखायौ बा नें हमें
बोल जिन बोलियो जहर बारे


[भाषा धर्म के अधिकतम निकट रहते हुये उपरोक्त गजल का भावार्थ]

लौट आएँगे सब सफ़र वाले
हाँ ‘नवीन’ आप के नगर वाले

आँख वालों को लाज आती है
ख़्वाब जब देखें हैं नज़र वाले

नेंक [ज़रा] तो देख तेरे सामने ही
क्या-क्या करते हैं तेरे घर वाले

एक कोने में धर दिया तुझ को
खूब चोखे [अच्छे] हैं तेरे घर वाले

रात अम्मा से कहते थे बापू
आते हैं स्वप्न मुझको डर वाले

खूब ढूँढे, मिले न शहरों में
संगी-साथी नदी-नहर वाले

ज़ह्र पी के सिखाया उसने हमें
बोल मत बोलना ज़हर वाले


:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

2122 1212 22

नाम उसका नहीं फ़साने में - अभिनव अरुण

नाम उस का नहीं फ़साने में,
मैं ही रुसवा हुआ ज़माने में ॥

उन चराग़ों को सौ दुआएँ दो,
ख़ुद जले तुम जिन्हें जलाने में ॥

इक भरम हैं चमन के रंगों-बू ,
है मज़ा तितलियाँ उड़ाने में ॥

जाने किस जाल में फँसे पंछी ,
बच्चे भूखे रहे ठिकाने में ॥

कैसे कह दूँ मकान छोटा है ,
उम्र गुज़री इसे बनाने में ॥

दर्द कब देखा तुम ने गंगा का ,
तुम तो मशगूल थे नहाने में ॥

ताज में वे भी दफ्न हैं 'अभिनव',
हाथ जिनके कटे बनाने में ॥

--- अभिनव अरुण

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मखबून.
फ़ाएलातुन मुफ़ाएलुन फ़ालुन.

2122 1212 22

तीन ग़ज़लें - काशफ़ हुसैन गाइर

हर शाम दिलाती है उसे याद हमारी
इतनी तो हवा करती है इमदाद हमारी
इमदाद - मदद का बहुवचन [सहायताएँ]

कुछ हैं भी अगर हम तो गिरफ़्तार हैं अपने
ज़ंजीर नज़र आती है आज़ाद हमारी

यह शह्र नज़र आता है हमज़ाद हमारा
और गर्द नज़र आती है फ़रियाद हमारी
हमज़ाद - साथ पैदा होने वाला

यह राह बता सकती है हम कौन हैं क्या हैं
यह धूल सुना सकती है रूदाद हमारी
रूदाद - रोना, विलाप

हम गोशानशीनों से है मानूस कुछ इतनी
जैसे कि ये तनहाई हो औलाद हमारी
गोशा नशीन - एकान्तप्रिय, मानूस - मुहब्बत करने वाला, हिला-मिला हुआ

अच्छा है कि दीवार के साये से रहें दूर
पड़ जाये न दीवार पे उफ़्ताद हमारी
उफ़्ताद - बुरा साया के सन्दर्भ में

बहरे हजज़ मुसमन अखरब मकफूफ महजूफ
मफ़ऊलु मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन
221 1221 1221 122



मुझ से मनसूब है गुबार मेरा
क़ाफ़िले में न कर शुमार मेरा
मनसूब - प्रसिद्ध, गुबार - धूल

हर नई शाम मेरी उज्लत है
दिन बिताना ही रोज़गार मेरा
उज्लत - जल्दबाजी

ये तेरी जागती हुई आँखें
इन पे हर ख़्वाब हो निसार मेरा

कोई आता नहीं इधर फिर भी
ध्यान जाता है बार-बार मेरा

रात के साथ-साथ बढ़ता गया
इन चरागों पे एतबार मेरा
ऐतबार - भरोसा

वक़्त इतना कहाँ था वक़्त के पास
वरना करता वो इंतज़ार मेरा

नींद पर मेरी दस्तरस गाइर
और न ख़्वाबों पे इख्तियार मेरा
दस्तरस - पहुँच, इख्तियार - अधिकार

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मखबून. 
फ़ाएलातुन मुफ़ाएलुन फ़ालुन. 
2122 1212 22



इक दिन दुख की शिद्दत कम पड़ जाती है
कैसी भी हो वहशत कम पड़ जाती है
शिद्दत - प्रबलता , वह्शत - आदमियों से बिदकना, पागलपन, सब से अलग रहना

सहरा में आ निकले तो मालूम हुआ
तनहाई को वुसअत कम पड़ जाती है
वुसअत - विस्तार

अपने आप से मिलता हूँ मैं फुर्सत में 
और फिर मुझ को फुर्सत कम पड़ जाती है

कुछ ऐसी भी दिल की बातें होती हैं
जिन बातों को ख़ल्वत कम पड़ जाती है
ख़ल्वत - एकान्त

ज़िन्दा रहने का नश्शा ही ऐसा है
कितनी भी हो मुद्दत कम पड़ जाती है

काशफ़ गाइर दिल का क़र्ज़ चुकाने में
दुनिया भर की दौलत कम पड़ जाती है

:  काशफ़ हुसैन गाइर [पकिस्तान]
परिचय के लिये भाई अभिषेक शुक्ला का आभार 

क़र्ज़ हैवानियत उठाती है- नवीन


क़र्ज़ हैवानियत उठाती है।

क़िस्त इन्सानियत चुकाती है॥

शब के दर तक पहुँच न पाती है।
ओस दिन में ही सूख जाती है॥
हमने बस आसमान ही देखे।
नींद ज़र्रात को भी आती है॥

हम बचाते हैं लौ मुहब्बत की।
फिर यही लौ हमें जलाती है॥

एक पोखर समान है जीवन।
जिस में क़िस्मत कँवल खिलाती है॥

दिल के टुकड़े समेट लो हजरत।
तेज़-अश्कों की मौज़ आती है॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मखबून
फाएलातुन मुफ़ाएलुन फालुन
2122 1212 22