वह अंधा था। जन्म से। पर उसे धूप से मोह था।
हर सुबह छत पर बैठता। चेहरे को आकाश की ओर उठाता।
और उत्सुकता से पूछता, “आज
धूप का रंग कैसा है?”
लोग पहले हँसते थे। फिर आदतन
जवाब देने लगे।
“पीली है, तेज़
है।”
“हल्की है, ठंडी
है।”
“सुनहरी है... थोड़ी उदास-सी
है।”
एक बच्ची ने पूछा, “आप
धूप का रंग क्यों पूछते हैं?”
वह बोला, “क्योंकि
आँखें नहीं हैं,
पर मन देखना चाहता है।”
बच्ची हँसी। बोली, “आपके
लिए मैं रोज़ उसका रंग बदल दूँगी।”
और वह सचमुच रोज़ बताती, “आज
धूप नारंगी है... जैसे संतरे के छिलके।”
“आज नीली है... जैसे स्कूल
की ड्रेस।”
वह सुनता, महसूस
करता। चेहरे पर ताज़गी आ जाती।
उस दिन बच्ची नहीं आई।
वह वहीं बैठा रहा... फिर ख़ुद ही बुदबुदाया, “आज धूप का रंग चुप्पी जैसा है... हल्का, लेकिन भारी।”

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