राजस्थानी लघुकथा - पर्दो अर गहना - डॉ रानी तँवर

गाँव में ढोल-नगारा बज्या, गली-गली में हुंकार उठी— "जमींदार री बहू आवे है, देखो देखो…!"

 

सोने-चाँदी री झंँकार, गहना-गठ्ठा, लाल-पीळा जोड़ाबींदणी असी सजली लागी जणों कोई देवी मूर्त्ति हो।

श्वसुर छाती तानकै आगू चाल्यो। लोगां री बोलचाल—

"सासरो भाग्यशाली, ऐसी बहू तो राजदरबार में भी कम मिले।"

"हीरां सूं तो गहना भारी लागे।"

 

पीछै बींधती ओढ़णी ओट में,

लाज री लकीर खींचती,

धीमे कदम धरती चालती।

 

रास्ता बीच बींदणी घूंघटा में सूं धीरा सूं बोली—

"बाबोसा, मैं जरा लघुशंका कर लेऊँ।"

श्वसुर हां भर कै बोल्या—

"ठीक है बेटी, मैं यहीं खड़ो रहूँ।"

 

छोरी ओढ़णी संभालती झाड़ियां  में जंगल आडी उतरगी।

पर वो देरां तक परती नीं।

 

श्वसुर चिंतित हो उठ्यो।

उधर छांड़ी चाल्यो तो सांठी जात री औरतां घाघरों फैलायां, घेरो बनाए खड़ी।

 

उसने पूछ्यो—

"काँई बात है? म्हारी बहू अठी आई, कठी है?"

 

बूढ़ी औरत हाथ उठाय कै बोली—

"बाबा, आगे मत आ, अठी जापो चाल रियो है।"

 

भीड़ में खुसर-पुसर चालू—

"ओढ़णी सूं परछांई छुपे, पर गहना सूं चमक नहीं छुपे।"

"सोना-चांदी देख कै मन बहक जावे है।"

"राजा री थाली भी बिन ढक्कणां सूं सुरक्षीत नहीं रहै।"

 

श्वसुर चीख्यो—

"बोलो, म्हारी बहू कठी है?!"

पर औरतां मौन।

 

आखिर वो पुलिस लायो।

डंडा गूंज्या, घेरो टूट्यो।

 

धरती पर खून खच्चर बींदणी पड़ी।

ओढ़णी बिखरी, गहना गायब।

माथां री चोटी खुली, आंख्याँ बंद।

 

श्वसुर धरती पर ढह गयो।

ऊंका मुख सूं फूट्यो—

"लाज बचाणो पर्दो, आज तो जान खा गयो।

गहना सजावण को नहीं, लोभ लूटण को साधन हो गयो।

औरत रो परदो इज्जत नीं, बेड़ियां बन गयो।"

 

कहावत है कि

 

"पर्दो जेठो होय तो सांस घुट जावे है।"

"गहना भार सूं नीं, लोभ सूं जान ले जावे है।"

"औरत घर री इज्जत नहीं, घर री आत्मा है।

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