लघुकथा - माघ की ठिठुरन में हरीराम की झोपड़ी – सुनीता चौधरी

 माघ का महीना था। ठंडी हवा सुइयों की तरह शरीर में चुभ रही थी। आसमान से उतरती ओस मानो धरती को और ठंडा करने पर तुली हो।

गाँव के बाहर एक छोटी-सी झोपड़ी उस ठिठुरन के आगे बेबस खड़ी काँप रही थी। फूस की छत से हवा सीटी मारती हुई भीतर घुस आती और मिट्टी की दीवारों में दरारों से ठंड ऐसे समा जाती जैसे भूखी पीड़ा शरीर में समा जाए।

झोपड़ी के भीतर बूढ़ा हरीराम अपने फटे हुए कम्बल को सीने से चिपकाए बैठा था। वह कम्बल कम और यादों का बोझ अधिक लग रहा था; कभी यह भी नया रहा होगा, कभी इससे भी किसी ने सर्दी भगाई होगी। कोने में बैठी उसकी पत्नी, गीता, चूल्हे की बुझती आग को बार-बार कुरेद रही थी, पर लकड़ियाँ कब की खत्म हो चुकी थीं। आग की जगह अब सिर्फ राख बची थी, ठंडी और उदास।

 

बाहर अमीरों के घरों से आती अंगीठियों की लालिमा दूर से चमक रही थी। हरीराम की आँखें एक पल को उधर उठीं और फिर झुक गईं। उसके लिए ठंड सिर्फ मौसम नहीं बल्कि उसकी रोज़ की सच्चाई थी। पेट की भूख और तन की ठंड — दोनों मिलकर आत्मा तक को जमा देती थीं।

 

छोटा बेटा रामू ठंड से सिकुड़कर माँ की गोद में दुबका हुआ था। उसके होंठ नीले पड़ चुके थे, पर शिकायत करने की उम्र भी उससे पहले ही छिन चुकी थी। गीता ने अपने शरीर की गर्मी उसे देने की कोशिश की, मानो एक माँ अपने प्राणों से ठंड को रोक सकती हो।

 

रात गहराती गई। हवा और तेज़ हो गई। झोपड़ी की फूस सरसराने लगी, जैसे दर्द की भाषा में कुछ कह रही हो। हरीराम ने झोंपड़ी के द्वार से आसमान की ओर देखा—तारों से भरा, पर इंसान के लिए उतना ही ठंडा और बेरहम। उसने धीमी आवाज़ में कहा,

 

“माघ हर साल आता है पर हम जैसे गरीबों की ठिठुरन कभी जाती नहीं।”

 

सुबह हुई। सूरज निकला, पर उसकी किरणें भी झोपड़ी तक पहुँचते-पहुँचते थक गईं। फिर भी हरीराम उठा, कम्बल को ठीक किया और बाहर निकल पड़ा। ठंड से लड़ते हुए, भूख को साथ लिए, जीवन की जद्दोजहद में। क्योंकि गरीब के लिए माघ की ठिठुरन सिर्फ सहनी नहीं होती—उसे जीकर पार भी करना होता है। पेट की अग्नि को शान्त करने के लिए जुट गया पत्थर तोड़ने में। फिर वही निष्ठुर रात हुई और उस झोपड़ी में, ठंड के बीच भी, जीने की जिद जो अब भी जल रही थी—बुझती राख के नीचे छिपी हुई एक छोटी-सी आग की तरह।

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