ब्रजगजल - कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में – कृष्ण कुमार ‘कनक’
कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में
दीखै सिग संसार तिहारी अँखिय’न में
अन गाए कौ प्यार तिहारी अँखिय’न में
"ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार" का लोकार्पण कार्यक्रम
ईसवी सन 2025 का अन्त बड़ा ही सुखद रहा. “ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार” नामक साझा संग्रह का विमोचन अन्यान्य कारणों से टलता जा रहा था और अचानक ही फिर
ब्रजगजल - बरसाने तक अइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई - अनिमेष शर्मा 'अनिमेष'
बरसाने तक अइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई
राधा तोय रिझइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई
तेरे बिन अब नहीं सटैगी तो पै रीझ गयो
मेरौ मन
इतनी बात बतइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई
ब्रजगजल - या में बस एक अद्भुत यही बात है - ज्ञानप्रकाश गर्ग
या में बस एक अद्भुत यही बात है
प्रीत में रीत देखी नहीं जात
है
या कों ब्यौपार कह कें न
लज्जित करौ
प्रियतमे प्रीत जीवन की सौगात है
ब्रजगजल - कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ - उर्मिला माधव
कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ
बाबरौ इनसान भरमायौ भयौ ऐ
हाऊँ-फाऊँ कर रह्यौ ऐ चार
लँग कूँ
झूठ की दुनिया पै बौरायौ भयौ ऐ
मनसुख विरह - एक उत्तम ब्रजभाषा काव्य संग्रह
ऐसा
शायद ही कोई साहित्य प्रेमी होगा जिसे ब्रजभाषा के बारे में जानकारी न हो - जिसने ब्रज
भाषा की रचनाओं का रसास्वादन न किया हो,
जिसने ब्रजसरोवर में गोते न लगाये हों,
जिसने सूरदास सहित अष्टछाप के विविध कवियों की अमृतवाणी चखी न हो,
जिसने दीवानी मीरा के निश्छल और निष्कपट प्रेम की अनुभूति न की हो,
जिसने रहीम के दोहों में छुपे जीवन दर्शन का अवलोकन न किया हो,
जिसने भूषण के अर्थ विस्फोट वाले छंदों और केशव के काव्य सौन्दर्य से सुसज्ज छंदों
का विहंगावलोकन न किया हो, जिसने तुलसी के
“ माया तू न गयी मेरे मन ते “ जैसे अनेकानेक पदों और छंदों से सुरभित कानन में विचरण
न किया हो, जिसने “ काहु दिन उठ गयौ
मेरे हाथ, बलम तोहि ऐसौ मारोंगी”
या “ बन गये नंदलाल लिलिहार कि लीला गुदवाय लेहु प्यारी “ या ब्रज की तोहि लाज मुकुट
वारे” जैसे अनेक रसियाओं / भजनों पर ठुमके न लागाये हों । ब्रजभाषा जिसके बारे में
कहा जाता है कि “ धन्य ब्रजभासा तो सी दूसरी न भासा तै नें बानी के बिधाता कों बोलिवौ
सिखायौ है” , ऐसी ब्रजभाषा से अमूमन
हर रसिक साहित्यानुरागी भलीभाँति परिचित है ।
ब्रजभाषा
में अनन्त काल से उत्कृष्ट से उत्कृष्टतम रचनाएँ होती रही हैं । अमीर खुसरो हों या
बाबा फ़रीद ख़ान साहब हों, भारतेन्दु हरिश्चंद्र
हों या जयशंकर प्रसाद, बाबू जगन्नाथ दास
रत्नाकर, कविवर नवनीत,
गोविंद कवि जी, लला कवि,
नाथ कवि, चतुर्भुज पाठक कंज जी,
यमुना प्रसाद चतुर्वेदी ‘प्रीतम’
जी जैसे अनेकानेक रचनाधर्मियों ने ब्रजभाषा के उपवन में भाँति-भाँति के सुमन सरसाये
हैं ।
आज
हम 2021 में प्रकाशित हुई बड़ी ही प्यारी सी कृति “ मनसुख विरह “ की चर्चा कर रहे हैं
। इस पुस्तक को, जिसे “खण्डकाव्य” कहने
में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए,
ब्रजभाषा के वर्तमान काल के समर्पित अध्येता,
मनीषी एवं शिल्पी श्री राधा गोविन्द पाठक जी ने प्रस्तुत किया है ।
मनसुख
या मनसुखा यशोदानन्दन भगवान श्री कृष्ण के परमप्रिय सखाओं में से एक हैं । बचपन के
सखाओं एवं सखियों की स्मृतियाँ सदैव ही मधुर ही होती हैं । उन के साथ व्यतीत किये गये
पल-छिन अनन्य होते हैं । ऐसी अनेक बातें होती हैं जिन्हें ऐसे सखाओं और सखियों के सिवा
और कोई भी नहीं जानता या नहीं जान सकता । लीला पुरुषोत्तम आनन्दघन श्याम सुन्दर के
सनेही सखा के स्वरूप में अधिकांश लोगों को सुदामा चरित्र ही याद आता है । परन्तु कविवर
राधा गोविन्द पाठक जी ने श्री कृष्ण के बालसखा मनसुखा के माध्यम से रसिकता से ओतप्रोत लड़कपन के विविध कथानकों को पटल पर लाने का पूर्णरूपेण सफल प्रयास किया है ।
हमने
ब्रज साहित्य में राधा के विरह को पढ़ा है,
गोपियों के कष्ट पढे हैं, मातु यशोदा की पीड़ा
पढ़ी है, अन्य ब्रजवासियों की अनुभूतियाँ
भी पढ़ी हैं परन्तु जिस तरह से एक बालसखा के बालमन की अनुभूतियों को ब्रजभाषा के छंदों
के माध्यम से कवि ने प्रस्तुत किया है वह बड़ा ही लोमहर्षक है । एक उदाहरण देखिये :
का बिध मनायौ सुधि रह रह आवै है
सपने हू सोचौ नहिं जैहै तू हमें बिसार
पल हू न चैन, रैन बीत नाँहि पावै है
एक दिन तुम, मैं औ सिरीदामा तीनों मिलि
पौंचे लखि सूनों घर ललिता
कौ पाइ कें
माखन चुरान खान निज नेह
देखन कों
भिरौ हो जो द्वार, धीरें खोलि दियौ जाइ कें
सूनौ सौ सदन जानि तीनों
घुसि कें सप्रेम
हम दोऊ घोड़ा बने तू लियौ
चढ़ाइ कें
पकरत छींकौ निज घर आई
ललिता तौ
चौंकि भाजे तीनों झट
मटुकी गिराइ कें
ईमेल
– jawahar.pustakalaya@gmail.com
जय श्री कृष्ण
राधे राधे
कोरोना काल और फेसबुक लाइव सेशन - ब्रजभाषा व्यंग्यालेख
जय श्री कृष्ण । राधे राधे ।
भैया यै भूतनी कौ करोना
जो न दिखावै सो थोरौ है । यानें जीव-जिनावर’न पै बड़ी किरपा करी है
। कबूतर’न कों मुक्तगगन में विचरिवे कौ लाइसेंस दै दियौ है और मनुष्य’न कों फ्लैट’न में यानि कबूतर’न के दड़व’न में कैद कर दियौ है
। दारू-गुटखा भलें ही महँगे कर दिये हैं मगर पेट्रोल-डीजल यानि तेल’न कौ तेल निकार दीनों
है । रोज-रोज लेक्चर पेलिवे वारे नेत’न कों भाषण’न के लाले परवाय दीने
हैं तौ घर-घर बैठे वॉट्सऐप-फेसबुक वीर’न के हाथ’न में माइक पकराय दीने
हैं ।
फेसबुक सों याद आयौ कि
आजकल फेसबुक लाइव की फैसन चल निकसी है । जहाँ देखौ वहीं फेसबुक लाइव । कहुँ फेसबुक-ग्रुप’न पै लाइव सेशन चल रहे
हैं तौ कहूँ फेसबुक पेज’न पै; और भैया जिनकों कोउ भाव
नाँय दै रह्यौ वे अपने चेला-चपाटे’न के थ्रू अवतरित है
रहे हैं । लाइव-सेशन’न के कछु प्रेमी विन भँगडि’न के जैसे हैं जिन्हें न तौ कोउ बगीची-अखाड़े वारौ बुलाय रह्यौ
है और न ही वे बिचारे रोज-रोज चेला-चपाटे’न के लिएँ फ्री की छनवाय
सकें । तौ भैया ऐसे पीर-फकीर अपने-अपने छज्जे-छजली यानि अपनी-अपनी टाइमलाइन’न सों अभिव्यक्त है रहे
हैं ।
अच्छा, एक बात और देखी कि लाइव
सेशन काहु भी ग्रेड कौ होय यानि भलें ही कोऊ नफीरी-बैंड-बाजे वारी बरात होय या
कड़ी-कड़क्का वारी या करोना काल की वर्च्युयल वेडिंग टाइप; हाजिरीन पाँच-पच्चीस या भौत सों भौत
सौ-पचास ही दिखवे में आय रहे हैं । भैया जैसें सहालग’न में सब बराबर ऐसें
ही करोना काल में हु सब बराबर । माल मिलै तौ भीर हु जुरै । जैसे जिजमान वैसे प्रावधान
।
जा तरियाँ ब्याउ-बरात’न में सब जगें रिस्ते
निभाने परें ऐसें ही इन फेसबुक लाइव’न में हु भैया फोर्मेलिटी
निभानी ही परै है । वेडिंग कार्ड की तरह पहिले सों सूचित कर दियौ जावै कि कौन सौ बकरा
कब कहाँ शहीद होनों है । फिर सेम डे हु इन्फॉर्म कियौ जावै कि भैया भूल मत जइयौ आप
कौ ही कार्यक्रम है आप कों जरूर आनों है ।
अब भैया हर दिन चार-चार पाँच-पाँच और कबू-कबू तौ लैन लगाय कें
लाइव-सेशन होमें हैं । समय लगभग सबन्ह कौ सेम । अब बराती का करै वाय तौ सब सों रिस्ते
निभाने हैं । या तौ वौ शहीद है चुकौ है जा में सब नें रिस्ते निभाये हुते या वा की
या वा के घर के काहु की शहादत ड्यू है । यानि हर तरह सों रिस्ते तौ निभाने ही हैं ।
अभी कछ दिन पहिले की
ही बात है साब हम बड़े बन-ठन कें मतलब मन ही मन में बन-ठन कें निछावर करिवे
यानि लाइव-सेशन’न में हाजिर हैवे कों निकसे ।
सब सों पहिलें झगड़ू झाँसवी
के सेशन में गये । शायरी में इनकौ भौत बड़ौ नाम है साब । पचास माँगें और दस ते कम पै
तौ ये यवे सहर में हु माइक हाथ में नाँय लेमें। कोरोना जो न करावै सो थोरौ । आजकल बिचारे
फ्री में मुसायराय रहे हैं । तौ साब हमनें का देखौ कि झाँसवी साब पसीना-पसीना है रहे हुते ।
लै-दै कें 18 व्यूअर दिख रहे हुते । भैया कवि-सम्मेलन मुसायरे’न में तौ सामनें भलें
ही पच्चीस हु न बैठे होंय परंतु विनकी दाद और बीच-बीच में खाज यानि तारी (कबू-कबू सरोता हाथ खुजायवे
के लिएँ हु तारी बजायवे के उपक्रम करें हैं) की अवाज सुनि-सुनि कें माइकेश्वर में
ऊर्जा कौ संचार होतौ रहै । फेसबुक लाइव में तौ पतौ ही नाँय चलै । हमनें जब झाँसवी साब
कों झूला झूलते देखौ तौ वहाँ सों चुपचाप निकस लैवौ ही ठीक समझौ ।
फिर हम पहुँचे सुन्दरी
संतो सीतापुरी के सेशन में । संतो जी भौत ही मलूक सायरा हैं साब । एकदम शोले की बसंती
टाइप । बड़े ही लटके-झटके दिखाय कें काव्य पाठ करें हैं । इन के यहाँ
साब पूरे पेंसठ व्युअर अपनी-अपनी बीन बजाते भए जमे भए दिखे । ये बीन बजामें
और संतो जी झूम-झूम कें दिखामें सॉरी सॉरी काव्य पाठ करें । जहाँ पहिले सों ही पेंसठ बीन बज
रही होंय वहाँ अपनी पींपनी की का बखत सो भैया हम वहाँ सों हु सटक लिये ।
अब हम पहुँचे एक नवोदित
शायर जौन जयपुरी के सेशन में । हम एंट्री लै कें कछु सुनिवे कौ उपक्रम करते वा सों
पहिलें ही जौन साब बोले अरे क्या बात है आज तो हमारी बज्म में नवीन साहब भी तशरीफ लाये
हैं । भैया हम भोंचक्के रह गये । पिछली दो बरात’न में तौ काहु नें घास
हु न डारी और यहाँ तौ आते ही वेलकम । मन प्रसन्न है गयौ साब । एक ही मिनट में हम अपने
आप कों मीर-गालिब’न की पंगत में बिराजमान महसूसवे लगे । परन्तु भैया हमारी खुसी भौत देर तक टिक
न सकी । अब तौ साब जौन जयपुरी साब हर शेर यै ही कह कें पढ़ें नवीन साब ये शेर बतौरे-खास आप की खिदमत में
पेश कर रहा हूँ और शेर कैसे-कैसे हुते एक बानगी देखौ
तू चौदवीं का चाँद है
न आफताब है ।
पर क्या करें गुलाबो
तेरा बाप नवाब है ॥
अब साब ऐसे शेर’न पै का दाद देवें और
कब तक दाद देवें । चुप रह जामें तौ पट्ठा टोकिवे लगै नवीन साब एम आय औडिबल? यानि नवीन साब क्या आप
मुझे सुन पा रहे हैं? बड़े ही मरे मन सों कहनों परै वा साब वा । अपनी हालत
ऐसी है गयी मानों घर सों तीन जगें निछावर करिवे कों निकसे होहु और पहिली अगयौनी (घुड़चढ़ी) में ही दूल्हे राजा के
बाप नें आप कौ हाथ पकर लीनों होय । ऐसे में और करौ हु का जाय सकै । बस प्रतीक्षा करी
जाय सकै काहु और रिसतेदार के आयवे की जा कौ हाथ पकारिवे के लिएँ दूल्हे राजा के पिता
श्री हमारौ हाथ छोड़ें । सो भैया हमनें हु प्रतीक्षा करिवौ ही ठीक समुझौ । अगलौ शेर
दुखड़े भरी हैं ये जीवन
की राहें ।
ऐसे में हमें चाहिए आप
की बाँहें ॥
साब मन में आयौ कि साले
कों पकरि कें द्वै-चार जमाय देंय फिर सुन्दरी संतो सीतापुरी जी की
याद आय गयी । सोची या में तौ जमाय देउगे लल्ला परन्तु संतो की तरफ नेंक आँख हु तरेरी
तौ वे पेंसठ बीन-बाज तुमारी खटिया खड़ी कर दिंगे । मन मसोस कें चुप्प
रहिवौ ही नीकौ लगौ साब ।
कछु ही देर बाद ऊपर वारे
नें हमारी सुन लीनी साब । यहाँ एक और रिस्तेदार आय कें टपकौ वहाँ हमारौ हाथ मुक्त भयौ
और साब फिर कौन रुकै हम ये गये वे गये और नौ दो ग्यारह यानि अंतर्ध्यान है गये । जान
बची और लाखों पाये । लौट कें कवि जी घर कों आये ।
नवीन सी चतुर्वेदी
मुम्बई
9967024593
माँ सरस्वती के चालीस नाम वाली सरस्वती वन्दना - नवीन
हे
मरालासन्न वीणा-वादिनी माँ शारदे।
वागदेवी, भारती, वर-दायिनी माँ शारदे॥
श्वेत
पद्मासन विराजित, वैष्णवी माँ- शारदे।
हे
प्रजापति की सुता, शतरूपिणी माँ शारदे।।
चंद्रिका, सुर-वंदिता, जग-वंदिता, वागेश्वरी।
कामरूपा, चंद्रवदना, मालिनी माँ शारदे॥
अम्बिका, शुभदा, सुभद्रा, चित्रमाल्यविभूषिता।
शुक्लवर्णा, बुद्धिदा, सौदामिनी माँ शारदे॥
दिव्य-अंगा, पीत, विमला, रस-मयी, भामा, शिवा।
रक्त-मध्या, विंध्यवासा, गोमती माँ शारदे॥
पद्म-निलया, पद्म-नेत्री, रक्तबीजनिहंत्रिणी।
धूम्रलोचनमर्दना, अघ-नासिनी
माँ- शारदे॥
हे
महाभोगा, परा, पथभ्रष्ट जग सन्तप्त है।
वृष्टि
कीजै प्रेम की, अनुराग की माँ शारदे॥
नवीन सी चतुर्वेदी
विष्णु की विराटता में शारदे कौ वास है - नवीन चतुर्वेदी
अग्नि-वर्ण धातु धार, हृदय प्रसन्न
होंय,
स्वर्ण की विविधता में शारदे कौ वास है ।
सत्य, शान्ति, शील, धैर्य मातु शारदे की दैन,
प्रति एक शुचिता में शारदे कौ वास है ।
पाहन सों चक्र, चक्रवात’न सों विश्व बन्यौ,
नित्य की नवीनता में शारदे कौ वास है ॥
कल्पना विहीन विश्व कैसें विसतार पातो,
विष्णु की विराटता में शारदे कौ वास है ।।
नवीन सी. चतुर्वेदी
सरस्वती वन्दना, घनाक्षरी छन्द
व्यंग्य - वाह रे मीडिया - अर्चना चतुर्वेदी
ब्रजभाषा व्यंग्य - जा रे कारे बदरा - मदन मोहन 'अरविन्द'

जा रे कारे बदरा
मदन मोहन 'अरविन्द'
'ब्रज के बिरही लोग बिचारे', अब महाकवि सूर के बचन हैं सो टारे कैसैं जायँ। ब्रज सौं बिरह कौ सम्बन्ध जोड़ दियौ तौ जोड़ दियौ, पर इतनौ कहकें सूरदास ठहरे नायँ। वे जानते हते कै बरसात बिना बिरह अधूरौ, तासौं संग की संग कह दई, 'सदा रहत पावस ऋतु हम पै जबते स्याम सिधारे'। सौ टका साँची कही, काहू बुजुर्ग बिरही सौं पूछ कै देख लीजौं, पतौ चल जायगौ, पावस में बिरह की डिगरी बढ़ती-चढ़ती ही दीखै। अब आप हम सौं पूछौगे कै भैया बाबड़े भये हौ का, कौन से ज़माने के बिरह की बात लै बैठे, दुनिया इक्कीसमी सदी में पहुँच गयी और तुम बाबा आदम के जमाने कौ बिरहा गायवे बैठ गए। उत्तर में आपते निवेदन मात्र इतनौ कै नई नौ दिना, पुरानी सौ दिना। बैसैं हू बिरह नयौ कहा, पुरानौ कहा। पैकिंग बदली होय तौ बदली होय प्रोडक्ट तौ पुरानौ ही है।
आज की दुनिया में बिरह कौ बैक्टीरिया अपने पूरे जोबन पै है। सब के सब बिरही, काहू कूँ सत्ता कौ बिरह, काहू कूँ सम्पदा कौ, काहू कूँ पद-प्रतिष्ठा कौ तौ काहू कूँ रोजी-रोटी कौ, नाना प्रकार के बिरह। 'बिरह की मारी बन बन डोलूँ बैद मिला नहिं कोय', जा बीमारी कौ इलाज न पहलै भयौ न आज होय। हाथ कंगन कू आरसी का, पढ़े लिखे कू फारसी का, सब देख रहे हैं, आजकल सत्ता के बिरह कौ बुखार कैसौ लाइलाज होतौ जाय रह्यौ है। सन्निपात में सत्ता कौ रोगी कैसी-कैसी ऊल-जलूल बकै, है जाकी दवाई काऊ बैद के पास? हाँ, पहलै की तरह अब काऊ कौं पिया के परदेस कौ बिरह नायँ होय, और होय तौ काहे कू, सम्पदा सौं संजोग की संभावना बन जाय तौ फिर मानस जात के बिरह पै कौन ध्यान देय। बड़ी कोठी, लंबी कार, मोटौ बैंक बैलेंस सब कछू है सकै तौ फिर दस-बीस बरस एक दूसरे ते अलग पड़े रहे तौ जा बिरह कौ का रोमनौ? अरे मोबाइल है, वीडियो चैट है, रोज मिलौ, रोज बात करौ। संचार क्रांति के या दौर में कौनसी काऊ कबूतर की चोंच में चिट्ठी चिपकानी है, कै फिर काऊ बदरा कूँ दूत बनाय कै बालम के द्वार भेजनौ है। जो ऐसौ होतौ फिर तौ हर बरसात अटरिया-अटरिया पै जा रे कारे बदरा की गूँज है रही होती। जानै कितने मेघदूत रचे जाय चुके होते और न जानै कितने काव्य-रस-रसिक नित्य इनकौ रस पान कर कै अघाय रहे होते।
अब मानौ कै न मानौ, रामगिरि पर्वत पै अकेले पड़े निष्कासन कौ डंड झेल रहे यक्ष की बिरह-बेदना यक्षलोक स्थित अलकापुरी के एकांत में उनकी प्रियतमा तक एक मेघ के माध्यम सौं पहुँचाय कै महाकवि कालिदास और उनकी रचना मेघदूत कूँ कालजयी प्रतिष्ठा प्राप्त भई। सोच कै मन में हूक सी उठै कै ऐसी प्रतिष्ठा काऊ और के भागन में क्यों नायँ। मेरी पड़ौसन खाय दह्यौ, मो पै कैसैं जाय रह्यौ, अरे हम काऊ ते कम हैं का। मन में आई सो ठान बैठे, बिरह कौ अनुभव तौ अपनौ हू काहू सौं उन्नीस नायँ पर सन्देसौ भेजवे कू मेघ की खोज जरूरी हती। अब कोई ऐसौ टिकाऊ मेघ होय जो थोड़ी देर ठहरै और ढंग ते हमारी बात सुनै तौ कछू बात बनै, पर आजकल के मेघ इत आये उत गए। देखते-देखते एक दिन ऐसौ हू आयौ कै हमने दीखवे में अनुभवी और वयोवृद्ध एक मेघ कू थोड़ी देर के ताईं हमारी बात सुनवे कू जैसें-तैसें मनाय लियौ, पर दुर्भाग्य देखौ कै हमारी मर्मान्तक पीड़ा सुनकै हू मेघ पसीज्यौ नायँ, कहवे लग्यौ भैया अबते कोई मेघ न कहूँ सन्देस लै कै जायवे की हिम्मत करैगौ न पानी लै जायवे की। आजकल तिहारे राजकरमचारी जमीन-आसमान एक करै दै रहे हैं। बरसन पहलै मैं पानी लै कै चल्यौ तौ संग-संग अनेक बिरही जनन के सँदेसे पहुँचायवे की इच्छा मन में हती पर जाते भये मारग में ऐसे-ऐसे महानुभावन सौं भेंट भई कै दुबारा सपने हू में उनसौं मिलवे की कामना न रही। कोई कहै हम स्थानीय निकाय के, कोई कहै हम राज्य सरकार के तौ कोई कहै हम केंद्र सरकार के अधिकारी हैं। बड़ी निराली बात लगी। इलाकौ एक और राज करवे बारे इतने। सबके सब मेरी तरफ सिकारी की नजर सौं घूरते मिले। जगह-जगह उत्कोच, अरे रिस्वत, जाते तुम पृथ्वी वासी अब सेवाशुल्क कहौ, दैते-दैते दम फूल गयौ। एक जगह तौ ऐसौ इरझ्यौ कै भैया बरसन बाद घर लौटनौ है रह्यौ है। कछू सज्जन मिले, कहवे लगे आमन्दनी की जाँच करवे बारे बिभाग ते हैं, पानी कहाँ ते लाये, बही-खाते दिखाऔ, मैनें लाख समझाए भैया जि पानी तौ मैं हर बरसात में सागर सौं लाय कै धरती कू दैतौ आयौ हूँ, इतनी सुनकै दूसरे सज्जन कड़क अवाज में बोले अच्छा, सफेद झूठ। चल बताय, समुद्र कौ खारौ पानी लै कै कौनसी प्रोसेसिंग यूनिट में मीठौ करै और समुद्र का तेरौ रिस्तेदार लगै सो वाते बिना बिल-परचा पानी मिल जाय। एक तीसरे सज्जन ने मेरी बात सुनी तौ चौंकवे के अंदाज में कहवे लगे अरे, हर बरसात काम करै और बच कै निकर जाय, तेरौ सबरौ कारौ कारोबार अब हमारी निगाह में आय गयौ है। देखें अब कैसें छूटैगौ। इतने दिन सेवाशुल्क अदा करते-करते मैं एक दम खाली है गयौ हतो और कहाँ ते लामतौ सो इन सबके घर-दफतरन के चक्कर मारते-मारते का खबर कितने साल बीत गए, न मैं कहूँ पानी पहुँचाय पायौ और न घर की कछू खबर-सुध लै पायौ। भैया, सौगंध खाय लई अब सन्देस तौ दूर मैं काहू जगह पानी हू न लाऊँ। मेघ कौ दर्द देख्यौ तौ हम अपनी बिरह-ब्यथा भूल गए। खाली एक सलाह दै कै हमनें भरे मन सौं बरसन के बिरही मेघ कू बिदा कियौ कै मित्र, अब अगर ऐसी स्थिति में फिर कहूँ घिरवे लगौ तौ निर्भय है कै काऊ निरीह-निर्धन की आँखिन में स्थान ग्रहण कर लीजौं , ता पीछै जितने चाहौ बरसते राहियों, तुम न राजा की आँखिन में आऔगे, न राज की और न राजकरमचारिन की।









