ब्रजगजल - चार पैसा पाय कें बिन बात के बुकलात है - पूनम शर्मा पूर्णिमा

 

चार पैसा पाय कें बिन बात के बुकलात है

च्यों करै गिल्ला-गुजरजम आइ कें लै जात है

 

जे भलौ आयौ जमानोंनैन नीचै है रहे

प्हैर कें फाटे घुटन्नाना कोई सकुचात है

 

या जनम की सिग कमाईनीर जैसी रिस गई

दाँव सिगरे आजमायेहाथ कछु ना आत है

 

भौत लैवे की गरज मेंइत-उतै भाजे फिरे

“चार दिन की चाँदनी है फिर अँधेरी रात है”

 

पिछलगू तौ पिछलगू हैंबात मौके पै कहौ

डेगची के नाम पै चमचा मलाई खात है

 

मेंड़ हरहारौ सजावैखेत खरपतवार हैं

बे-छने कौ खा रह्यौ हैबे-करे कौ पात है

 

काँख में पैनी छुरी अरु मुख सों बोलें राम हैं

एक चिकनी-चूपड़ी रंग देख कें सरकात है

 

अहम् कौ टूटौ भरम , पन्ना जरौ इतिहास कौ

इकलगाँ कूँ सेरदूजे लोमड़ा घिघियात है

 

जीति कें हू हार कौ सेला सुहायौ अनमनों

एक पट्ठा हार कें हू ,सौ गुनों मुसक्यात है

 

लोप चिट्ठि’न कौ भयौ हैलेखनी लाचार है

अपनी परिपाटी कूँ 'पूनमसंगणक ना भात है


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