व्यंग्य - कंजूसों का बादशाह - डॉ. प्रमोद सागर

कहते हैं कि हर मुल्क, हर क़ौम और हर मोहल्ले में, कमोबेश एक न एक बादशाह ज़रूर पैदा होता है—कहीं शायरी का, कहीं सियासत का, कहीं जुर्म का। मगर हमारे दौर का जो बादशाह है, वह न ताज पहनता है, न सिंहासन पर बैठता है; वह बैठता है अपनी तिजोरी पर, और ताज की जगह सिर पर बचत का वह अदृश्य हेलमेट लगाए रहता है जिसमें से एक भी रुपया बाहर गिर जाए तो उसे दिल का दौरा पड़ जाए। और वह है कंजूसों का बादशाह—वह सम्राट सिर पर बचत का वह अदृश्य हेलमेट लगाए रहता है जिसमें से एक भी रुपया बाहर गिर जाए तो उसे दिल का दौरा पड़ जाए। और वह है कंजूसों का बादशाह—वह सम्राट, जिसकी सल्तनत में आँसू भी उधार माँगकर बहाए जाते हैं, और साँसें भी गिन-गिनकर ली जाती हैं कि कहीं ज़्यादा खर्च न हो जाए।
 
       कंजूसी कोई साधारण आदत नहीं, यह एक मुकम्मल जीवन-दर्शन है—ऐसा दर्शन, जिसमें इंसान खाने से पहले सोचता है, “क्या वाक़ई आज ज़िंदा रहना ज़रूरी है?” और खर्च करने से पहले हिसाब लगाता है कि “अगर आज पाँच रुपये गए, तो परलोक में क्या मिलेगा?” कंजूस आदमी पैसे को नोट नहीं समझता, वह उसे औलाद की तरह पालता है—नहलाता नहीं, खिलाता नहीं, मगर दिल से लगाकर रखता है। उसकी तिजोरी में रखा पैसा कभी बूढ़ा नहीं होता, मगर खुद वह आदमी ज़रूर बूढ़ा हो जाता है, क्योंकि उसने जवानी में भी जवानी खर्च नहीं की होती।
 
     हमारे शहर में इस बादशाह की रियासत ऐसी मशहूर है कि लोग पता नहीं पूछते, बस कहते हैं—“वो वाला घर, जहाँ बिजली पड़ोसी की जलती है और चाय की खुशबू उधार की होती है।” वहाँ पहुँचते ही समझ में आ जाता है कि आप किसी साधारण कंजूस के दरबार में नहीं, बल्कि कंजूसी के विश्वविद्यालय में दाख़िल हो चुके हैं। यहाँ हर चीज़ का इस्तेमाल दोबारा होता है—यहाँ तक कि बहाने भी। वही बहाना, वही तर्क, वही वाक्य—“फ़ालतू खर्च क्यों करें?”—पिछले चालीस साल से बिना अपडेट के चल रहा है। इस बादशाह का उसूल साफ़ है—पैसा कमाना इबादत है, मगर खर्च करना गुनाह-ए-कबीरा। इसके यहाँ मेहमान आए तो पहले पानी पूछा जाता है, फिर यह देखा जाता है कि पानी वाक़ई ज़रूरी है या मेहमान प्यास को भी ‘एडजस्ट’ कर सकता है। चाय का सवाल उठे तो घर में अचानक दर्शन-शास्त्र जाग उठता है—“आजकल चाय सेहत के लिए ठीक नहीं होती।” अगर मेहमान ने ज़िद कर ली तो आधा चम्मच चायपत्ती से चार कप चाय बनती है, और दूध ऐसा डाला जाता है कि चाय नहीं, यादें रंगीन हो जाती हैं।
 
     इस सल्तनत में बीमारियाँ भी कंजूस होती हैं। बुख़ार आए तो थर्मामीटर नहीं निकलता, बल्कि माथे पर हाथ रखकर अंदाज़ा लगाया जाता है—“इतना तो चलता है।” दवा की पर्ची अगर दस दिन की हो तो उसे तीन हिस्सों में बाँटकर एक महीने तक चलाया जाता है। डॉक्टर से कहा जाता है—“बस देख लीजिए, लिखने की ज़रूरत नहीं।” क्योंकि लिखने से स्याही खर्च होती है और खर्च इस सल्तनत का सबसे बड़ा दुश्मन है। कंजूसों का बादशाह अपने बच्चों को भी इसी तालीम में बड़ा करता है। बच्चों को खिलौने नहीं मिलते, बल्कि बचपन में ही समझा दिया जाता है कि “ख़ुशी अंदर से आती है।” नए कपड़े साल में एक बार—वो भी तब, जब पुराने इतने घिस जाएँ कि समाज ख़ुद चंदा इकट्ठा करने लगे। जूते ऐसे पॉलिश होते हैं कि उनमें आदमी का अतीत भी झलक जाए। बच्चे अगर आइसक्रीम माँग लें तो उन्हें समझाया जाता है कि “ठंडी चीज़ गले के लिए नुक़सानदेह है।”
 
      दान-पुण्य के मामले में यह बादशाह अद्भुत तर्क देता है। कहता है—“अगर भगवान को चाहिए होता तो वो ख़ुद पैदा कर लेते।” मंदिर में सिक्का डालते वक़्त हाथ काँपता है, और अगर गलती से दो रुपये गिर जाएँ तो देर तक ज़मीन पर झुक-झुककर यह सोचता रहता है कि कहीं भगवान नाराज़ न हो जाएँ अगर वापस उठा लिया। धार्मिकता यहाँ भी कंजूसी के अधीन है—पूजा कम, बचत ज़्यादा। इस रियासत में रिश्ते भी बजट में चलते हैं। शादी-ब्याह में न्योता देने से पहले यह हिसाब लगाया जाता है कि कौन कितना खाएगा। बारात में मिठाई ऐसी गिनी-चुनी होती है कि एक लड्डू तीन पीढ़ियों की याद बन जाए। और अगर कोई रिश्तेदार ज़्यादा खा ले तो उसे उम्र भर “पेटू” की उपाधि दे दी जाती है।
 
     कंजूसों का बादशाह असल में गरीब नहीं होता—वह अमीर होता है, मगर अमीरी से डरता है। उसे लगता है कि अगर उसने ज़रा-सी ढील दी तो पैसा उसे छोड़कर भाग जाएगा। इसीलिए वह पैसों को ऐसे बाँधकर रखता है जैसे कोई डरपोक पति अपनी बीवी को शक की ज़ंजीरों में बाँध ले। और इसी डर से उसकी पूरी ज़िंदगी एक ही मंत्र पर चलती है— “ख़र्च मत करो, चाहे ख़ुद ही क्यों न मिट जाओ।”
 
     कंजूसों के इस बादशाह की सल्तनत में समय भी मुफ़्त नहीं बहता, बल्कि नाप-तौलकर चलता है। यहाँ घड़ियाँ नहीं टिक-टिक करतीं, बल्कि हर सेकंड यह पूछता हुआ गुजरता है—“इस वक़्त का कोई फ़ायदा है या यूँ ही ज़ाया हो रहा है?” सुबह उठने का वक़्त ऐसा तय है कि सूरज भी शर्मिंदा होकर देर से निकलता है। नहाने में पानी इतना सीमित कि बाल धोने से पहले यह सोचना पड़ता है कि आज ज़्यादा ज़रूरी क्या है—सिर या आत्मसम्मान। साबुन का टुकड़ा इतना पतला हो जाता है कि आख़िरकार वह ग़ुसलख़ाने में नहीं, दर्शनशास्त्र में तब्दील हो जाता है—मौजूद तो है, मगर इस्तेमाल के क़ाबिल नहीं।
 
      इस बादशाह की ज़ुबान भी कंजूस होती है। यह कम बोलता है, मगर जब बोलता है तो हर जुमले में बचत का दर्शन ठूँस देता है। “फ़ालतू क्यों?”, “अभी क्या ज़रूरत है?”, “कल देखेंगे”—ये तीन वाक्य उसके ताज के तीन नगीने हैं। मोहल्ले में कोई मर जाए तो यह सबसे पहले यह पूछता है कि “चाय का इंतज़ाम है या अपने घर से पीकर जाएँ?” और शोक सभा में बैठकर भी यह हिसाब लगाता रहता है कि अगर आधा घंटा पहले उठ जाए तो एक कप चाय बच सकती है।
 
      कंजूसों के बादशाह का घर अजायबघर से कम नहीं। यहाँ अख़बार बीस साल पुराने मिलेंगे—क्योंकि “ख़बर तो वही रहती है।” शादी के कार्ड संभालकर रखे जाते हैं—“काग़ज़ काम आएगा।” दवाइयों की शीशियाँ ऐसी कि लेबल मिट चुका है, मगर भरोसा अब भी क़ायम है—“पिछली बार इससे फ़ायदा हुआ था।” यहाँ टूटी कुर्सी को फेंका नहीं जाता, बल्कि उसे “थोड़ा टेढ़ा बैठने का अभ्यास” कहा जाता है। इस घर में फ्रिज़ आया तो मोहल्ले में भूचाल आ गया। लोग समझे कि अब बादशाह ने तख़्त छोड़ दिया है। मगर जल्दी ही पता चला कि फ्रिज़ सिर्फ़ इसीलिए लिया गया है ताकि सब्ज़ी एक हफ़्ते पुरानी भी ताज़ी लगे और मेहमानों को यह बताया जा सके कि “हमारे यहाँ सब कुछ रहता है।” फ्रिज़ खुलता कम है, मगर उसकी चर्चा ज़्यादा होती है—ठीक वैसे ही जैसे इस बादशाह का दिल।
 
      बच्चों की पढ़ाई भी यहाँ निवेश की तरह होती है। किताबें सेकंड हैंड, कॉपियाँ आधी भरी हुई, और पेन वह जो किसी ने कहीं भूल गया हो। बच्चों को समझाया जाता है—“मेहनत करो, ताकि ट्यूशन न लगवानी पड़े।” अगर बच्चा ज़्यादा सवाल पूछ ले तो उसे दार्शनिक जवाब मिलता है—“ज्ञान भीतर से आता है, किताब से नहीं।” और भीतर से जो ज्ञान आता है, वह ज़्यादातर यह होता है कि माँगना गुनाह है।
 
    इनकी सल्तनत में बीवियाँ सबसे ज़्यादा तपस्या करती हैं। वे हर सब्ज़ी से तीन सब्ज़ियाँ बनाना जानती हैं—आज लौकी, कल उसकी छिलके की भुजिया, परसों उसका सूप। रोटी ऐसी पतली कि हवा में उड़ जाए, मगर बादशाह खुश—“कम में गुज़ारा सीखो।” बहू अगर नए कपड़े की बात छेड़ दे तो उसे “घर की लक्ष्मी” बताकर चुप करा दिया जाता है—और लक्ष्मी से उम्मीद यही होती है कि वह आए, मगर खर्च न करे। इनके यहाँ पर कोई मेहमान अगर भूल से ज़्यादा दिन रुक जाए तो बादशाह के चेहरे पर ऐसा भाव आ जाता है, जैसे सरकार ने नया टैक्स लगा दिया हो। हर सुबह यह गिनता है कि आज कितनी चाय पिली, कितनी रोटियाँ गईं, और कितनी साँसें ज़ाया हुईं। विदाई के वक़्त मेहमान को दुआ भी ऐसे देता है कि उसमें पेट्रोल का खर्च शामिल न हो—“बस फोन पर हालचाल लेते रहिए।”
 
     इस बादशाह की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि यह हर हाल में ख़ुद को सही साबित कर लेता है। अगर कोई कहे कि यह कंजूस है, तो जवाब तैयार—“हम फ़िज़ूलखर्च नहीं हैं, मितव्ययी हैं।” अगर कोई कहे कि ज़िंदगी जी नहीं रहे, तो यह गांधीजी का नाम ले लेता है। और अगर कोई ज़्यादा ही सच्चाई पर उतर आए, तो यह चुप हो जाता है—क्योंकि चुप्पी सबसे सस्ती ढाल है। धीरे-धीरे समझ में आता है कि यह बादशाह दरअसल पैसों का मालिक नहीं, उसका चौकीदार है। वह तिजोरी की रखवाली करते-करते ख़ुद लोहे का हो गया है—ठंडा, सख़्त और जंग लगा हुआ। वह हँसना चाहता है, मगर हँसी भी उसे फ़ालतू खर्च लगती है। वह खुश होना चाहता है, मगर खुशी की कीमत सुनकर पीछे हट जाता है। और इसी तरह उसकी ज़िंदगी एक लम्बा हिसाब बन जाती है—जिसमें जोड़ बहुत है, मगर इस्तेमाल शून्य।
 
    कंजूसों के बादशाह की सल्तनत का सबसे दिलचस्प मंज़र वह होता है, जब मौत का ज़िक्र छिड़ जाए। यहाँ मौत भी एक अनचाहा खर्च है—ऐसा ख़र्च, जो टाला नहीं जा सकता, बस कम किया जा सकता है। वसीयत लिखते वक़्त क़लम काँपती है, इसलिए नहीं कि दुनिया छोड़नी है, बल्कि इसलिए कि कहीं एक लाइन ज़्यादा न लिख जाए। मरने के बाद के ख़र्चों की सूची पहले से तैयार रहती है—कफ़न सादा होगा, फूल कम होंगे, भीड़ सीमित रहेगी, और अगर हो सके तो आँसू भी नियंत्रित मात्रा में बहाए जाएँगे। इस बादशाह की ख्वाहिश रहती है कि लोग उसकी मौत पर भी यही कहें—“वाह! आदमी गया भी तो पूरी किफ़ायत से।” मगर कुदरत का एक पुराना क़ायदा है—जिसने ज़िंदगी में कुछ नहीं उड़ाया, उसकी मौत के बाद सब कुछ उड़ जाता है। 
 
     इनकी औलादें, जो बरसों से पिता की तिजोरी को ऐसे देखती आई थीं जैसे कोई बंद मंदिर, अचानक पुजारी बन जाती हैं। अलमारियाँ खुलती हैं, बक्से टूटते हैं, और वह पैसा, जिसे कभी धूप नहीं लगी थी, अचानक रोशनी में आकर घबरा जाता है। बच्चों को समझ ही नहीं आता कि इस दौलत का करें क्या—क्योंकि उन्होंने तो कभी खर्च करना सीखा ही नहीं था। नतीजा यह होता है कि एक पीढ़ी में जो कंजूसी जमा हुई थी, वह अगली पीढ़ी में फ़िज़ूलखर्ची बनकर फूट पड़ती है—और बादशाह की आत्मा, अगर कहीं हिसाब-किताब देख रही हो, तो वहाँ भी माथा पकड़ लेती है।
 
   इस कंजूसी का सबसे बड़ा नुक़सान यह नहीं कि आदमी कम खर्च करता है, बल्कि यह है कि वह कम जीता है। उसके पास यादें नहीं होतीं, सिर्फ़ रसीदें होती हैं। उसके पास किस्से नहीं होते, सिर्फ़ हिसाब होता है। वह कभी यह नहीं कह पाता—“हाँ, उस दिन बहुत मज़ा आया था”—क्योंकि मज़ा हमेशा बजट से बाहर का आइटम रहा होता है। उसकी ज़िंदगी एक ऐसी डायरी बन जाती है, जिसमें हर पन्ने पर रकम लिखी होती है, मगर कोई तारीख़ यादगार नहीं होती। कंजूसों का बादशाह जब बुढ़ापे में पीछे मुड़कर देखता है, तो उसे एक अजीब-सी खाली तिजोरी नज़र आती है—पैसों से भरी हुई, मगर अर्थ से ख़ाली। उसे याद नहीं आता कि आख़िरी बार उसने खुलकर कब हँसा था, कब किसी को दिल से कुछ दिया था, कब बिना हिसाब लगाए किसी के साथ बैठा था। और तब पहली बार उसे समझ में आता है कि उसने पैसे को बचाते-बचाते ख़ुद को खर्च कर डाला। मगर यह समझ भी देर से आती है—इतनी देर से कि सुधार की गुंजाइश ही नहीं बचती। तब वह वही पुराना जुमला दोहराता है—“अब क्या फ़ायदा?” और यही जुमला उसकी पूरी ज़िंदगी का सार बन जाता है। क्योंकि उसने हर मौके पर यही कहा था—अब नहीं, कल; अभी नहीं, बाद में; ज़रूरत नहीं, फ़ालतू है।
 
     असल में कंजूसों का बादशाह बुरा आदमी नहीं होता। वह न किसी को लूटता है, न धोखा देता है। उसका गुनाह बस इतना होता है कि वह ज़िंदगी को एक खर्च समझ लेता है, और खर्च से डरता है। वह यह भूल जाता है कि कुछ खर्च ऐसे होते हैं, जो बचत से कहीं ज़्यादा कीमती होते हैं—जैसे हँसी, मेहरबानी, वक़्त और अपनापन। यही उसकी बादशाहत है, यही उसका ताज, यही उसका तख़्त। एक ऐसी सल्तनत, जहाँ खज़ाना भरा है, मगर दिल खाली है। और सच पूछिए तो—
ऐसे बादशाहत से तो वह फ़क़ीरी कहीं बेहतर है; जो आज खर्च कर लेती है, ताकि कल याद बन सके।
 
(विशेष:= यह हास्य-व्यंग्य पूर्णतः काल्पनिक है और किसी भी सत्य घटना या व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं है। इस आलेख का मुख्य उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ पाठकों का विशुद्ध मनोरंजन करना ही है, और कुछ नहीं।)


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