राजेन्द्र स्वर्णकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजेन्द्र स्वर्णकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

SP2/3/4 मेरे सब दिन-रैन तुम्हारे आभारी हैं - राजेन्द्र स्वर्णकार

नमस्कार

मकर पर्व संक्रान्ति की अनेक शुभ-कामनाएँ। परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना है कि समस्त मानव समुदाय के जीवन को ख़ुशियों से भर दे और राजेन्द्र स्वर्णकार भाई जी के घर होने वाले मांगलिक कार्यक्रम की खुशियों को दोबाला कर दे। मञ्च के साथी भाई श्री राजेन्द्र स्वर्णकार जी के दो सुपुत्र इसी महीने परिणय सूत्र में बँधने जा रहे हैं। मञ्च दौनों बालकों के सुखमय दाम्पत्य जीवन की मंगलकामना करता है।

अपने राजेन्द्र भाई जी को जानने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि राजेन्द्र जी इस मञ्च के लिये सदैव और सहर्ष तत्पर रहते हैं। “रस परिवर्तन” के आह्वान का सम्मान रखते हुये आपने इतने बिजी शेड्यूल के बीच भी क्या ही शानदार छंद भेजे हैं। आइये पहले छंद पढ़ते हैं।

मैं क्या था? तुम बिन, प्रिये ! मात्र मूक-पाषाण !
फूँक दिए निष्प्राण में , सजनी ! तुमने प्राण !! 
सजनी ! तुमने प्राण भरे , उपवन महकाया !
हर अंकुर हर पुष्प खिला डाला ...मुर्झाया  !!
है उपकृत हर साँस , कहूँ रसना से क्या मैं ?!
मेरे सब दिन-रैन तुम्हारे आभारी हैं !

तुम से मैंने पा लिया जीने का आधार !
अब जीवन पल-पल लगे इक अनुपम उपहार !!
इक अनुपम उपहार ; प्रिये हूँ ऋणी तुम्हारा !
जीवन सुख-संयोग सहित हो पूर्ण हमारा !!
हँसते-गाते नित्य रहें हम क्यों गुम-सुम से ?
ख़ुश रहना संसार सीख ले हमसे-तुमसे !! 

हम ही राधा-कृष्ण थे , हम ही राँझा-हीर !
कैसे समझेंगे न हम इक-दूजे की पीर ?!
इक-दूजे की पीर , एक सुख-दुख सब अपने !
एक प्राण दो देह, एक-से अपने सपने !!
सौ जनमों तक प्रीत हमारी ना होगी कम !
बने पुजारी-प्रीत जनम फिर से लेंगे हम !! 

राजेन्द्र स्वर्णकार 09314682626

पहले छन्द की दूसरी पंक्ति यानि दोहे के चौथे चरण की, फिर उस के बाद इसी छन्द की तीसरी पंक्ति यानि रोला वाले हिस्से के प्रथम चरण के पूर्वार्ध में “सजनी तुमने प्राण” वाले हिस्से को पढ़िएगा और देखिएगा कवि के कौशल्य को। किस तरह एक शब्द समूह 'सजनी तुमने प्राण' दो अलग हिस्सों में दो पृथक वाक्यों का परफेक्ट हिस्सा बन रहा है। कुण्डलिया छंदों में इस तरह के प्रयोग कवि की मेधा का प्रदर्शन करते हैं। इसी पहले छंद की पञ्च लाइन यानि कि आख़िरी पंक्ति “मेरे सब दिन-रैन तुम्हारे आभारी हैं “ भी बहुत ही ज़बरदस्त है। तीसरे छंद में 'एक प्राण दो देह' वाला हिस्सा तो अतिशय मनोरम है। एक प्राण दो देह की संज्ञा हमें राधा और कृष्ण के माध्यम से मिली है, राधा और कृष्ण जैसे प्रेम की बातें करने वाले छंद में एक प्राण दो देह ने समाँ बाँध दिया है।  

जिस तरह हमें खाने की थाली में सिर्फ़ मीठा या सिर्फ़ नमकीन या सिर्फ़ तरल की अपेक्षा न रहकर एक सम्पूर्ण भोजन की अपेक्षा रहती है, ठीक उसी तरह साहित्य में भी विविध रसों के साथ ही किसी आयोजन का पूर्ण आनंद आता है। वर्तमान समस्या पूर्ति आयोजन के शब्द घोषित करते वक़्त यही मंशा थी कि अलग-अलग मेधाओं के दर्शन होंगे। शुरुआत में ही कल्पना जी ने न सिर्फ़ एक स्त्री के मनोभावों को बहुत ही सशक्त ढंग से अभिव्यक्त किया बल्कि बालमना अभिव्यक्ति बाग़ के फूल भी बहुत ही ज़बर्दस्त रही। उस के बाद खुर्शीद भाई ने हमें राष्ट्र-प्रेम के डोंगे में बैठाया; सत्यनारायण जी, सौरभ जी और श्याम जी ने आध्यात्मिक और कल्याणकारी बातें बतियाईं और अब राजेन्द्र जी ने मञ्च को अपने शृंगार रस आधारित छंदों से स-रसमय बना दिया है। कोई अनिवार्य नहीं कि ‘मैं-हम-तुम’ केवल आध्यात्मिक या शृंगारिक बातों के लिये ही सूटेबल हैं, वरन ये तीन शब्द तो अपने अंदर समस्त रसों को समेटे हुये हैं। उम्मीद करते हैं कि हमारे साथी हमें विविध रसों से सराबोर छन्द भेज कर अनुग्रहीत करेंगे। 

एक और बात भी कहने को जी हो रहा है कि गूढ बातों के लिये ज़रूरी नहीं कि शब्दावली भी अति गूढ ही ली जाये [हालाँकि कभी-कभी मैं भी इस दुविधा का शिकार होता रहा हूँ] बल्कि वृंद जैसे अल्पज्ञात मगर अत्यंत सशक्त कवि की तरह आसान ज़बान में भी पते की बात कही जा सकती है। वृंद जी के कुछ दोहे इसी वेबपेज पर भी हैं, जिन्हें पढ़ने के लिये आप 'वातायन के रत्न' वाली सूची में 'V' पर जा कर उन के नाम पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं। 

राजेन्द्र जी आप को इन मधुर और मोदमय छन्द रचनाओं के लिये ख़ूब-ख़ूब बधाई। इतने बिजी शेड्यूल में भी आप ने अपनी सहभागिता बनाये रखी, आप का बहुत-बहुत आभार। साथियो राजेन्द्र जी के छंदों पर अपनी राय रखने के साथ ही साथ उन के घर होने वाले मांगलिक कार्य की अग्रिम बधाइयाँ भी दीजियेगा और हम बढ़ते हैं अगली पोस्ट की ओर।

नमस्कार

प्रिय छंद सुनिए प्रेम से , हम ने कहे हैं प्रेम से

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


राजेन्द्र भाई स्वर्णकार जी के ब्लॉग पर घुमक्कड़ी करने वाले साथियों को पता है कि वो दिल लगा कर न सिर्फ लिखते हैं बल्कि उसे सजाने में भी जी-जान से मेहनत भी करते हैं। मेरी प्रबल इच्छा थी कि दिवाली के पहले या कि फिर बाद की पोस्ट में उन के छंद आयें, परंतु राजेन्द्र भाई यही कहते रहे कि पहले मैं स्वयं तो संतुष्ट हो जाऊँ। और देखिये जब कवि स्वयं संतुष्ट होता है तब कैसा काम आता है :-

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - ताड़-सा , खजूर जैसा , आठवें अज़ूबे जैसा

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

समस्या पूर्ति मंच द्वारा घनाक्षरी छन्द पर आयोजित इस चौथी समस्या पूर्ति के चौथे चक्र में आप सभी का स्वागत है| सुरेन्द्र भाई, महेंद्र भाई और योगराज भाई के बाद अब हम पढ़ते हैं बीकानेर वाले राजेन्द्र स्वर्णकार जी को| सुरेन्द्र, महेंद्र और राजेन्द्र में 'द्र' की बारंबारता से अनुप्रास [वृत्यानुप्रास] अलंकार हुआ| अनुप्रास अलंकार के पांचों प्रकार, फिल्मी गानों के माध्यम से समझने के लिए यहाँ क्लिक करें|

तो आइये घूमने चलते हैं भाई राजेन्द्र जी के कल्पना लोक में..............




घर-परिवार है साक्षात् स्वर्ग ; स्वर्ग यह
त्याग श्रद्धा स्नेह सहयोग से सजाइए !
ईर्ष्या [ईरष्या] जलन द्वेष डाह चालबाजियों से
निंदा शक़ बैर से , माहौल न बिगाड़िए !
चैनलों के किस्सों की चपेट में उलझ कर
गृहस्थी बसी-बसाई हाथों न उजाड़िए !
देवियों ! माताओं ! बहनों ! भाभियों ! विनति है –
राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइए !

[टी वी की महारबानी से घरों में राजनीति किस कदर हावी हो चुकी है, इसे बखूबी बखाना है अपने| यही होता है कवि का धर्म, कि हमारी जड़ों को हिलाने वाले तत्वों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करे]



कलियां कोमल अंग-अंग में सजी हैं तेरे
संदली बदन तेरा दूध में नहाया है !
रूप मनहरण लुभावना है सुंदरिये !
देख’ तेरी सुंदरता चांद भी लजाया है !
गढ़ के विधाता-सा चितेरा भी हुआ है धन्य
तुम्हें चाव लगन से जिसने बनाया है ।
धरती क्या , स्वर्ग में पाताल में भी नहीं दूजी
तुमने सौंदर्य ऐसा अद्वितीय पाया है !

[हाँ भाई हाँ| हम तो कुण्डलिया वाले आयोजन में पहले ही मान चुके हैं|
आप सोलह आने सही कह रहे हैं| मित्रो अंदर की बात आप को बता दूँ -
इस पंक्ति के प्रणेता स्वयं राजेन्द्र भाई ही हैं]



वरमाल लिये’ खड़ी , सोचे वधू घड़ी-घड़ी ,
हाय दैया… लीला तेरी कैसी करतार है ?
ताड़-सा , खजूर जैसा , आठवें अज़ूबे जैसा ,
बिजली का खंभा कोई जैसे बिना तार है !
मानुष है ? जिन्न है ? तैमूर का लकड़दादा ,
बन्ने का बदन जैसे कुतुबमीनार है !
दुल्हनिया गश खाए , सखियां मंगल गाए ,
आया ठूंठ ; ऊंट-सा बछेरी पे सवार है !

[ताड़ सा खजूर जैसा, आठवे अजूबे जैसा............... ठूंठ ; ऊंट-सा................ ये कल्पना
तो पहले की तीनों कल्पनाओं से एक दम डिफ़्रेंट आई है भाई| तैमूर का लकड़दादा,
भाई आप तो हमें बचपन वाली कोमिक्स की दुनिया में ले गए|
हास्य के अद्भुत रंग बिखेरे हैं आपने|]

==========================

और अब बारी है विशेष पंक्ति वाली समस्या पूर्ति की| इस मंच की पहली विशेष पंक्ति पर पहली प्रस्तुति आई है राजेन्द्र भाई के द्वारा| आपने इस पंक्ति पर छन्द लिखने की ठानी और कर भी दिखाया| इस पंक्ति को ले कर अपेक्षा के ऑल्मोस्ट करीब हैं आप| छन्द शिल्प एक ऐसा विषय है जिस पर अलग अलग व्यक्ति अलग अलग मत रखते हैं| इन सब बातों के बावजूद कहना होगा कि आज के दौर में जब कवियों को छंदों में विशेष लगाव रह नहीं गया है, ऐसे में मित्र राजेन्द्र जी द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदम की भूरि-भूरि प्रशंसा की जानी चाहिए|

साधारण भाषा में कहें तो श्लेष अलंकार यानि रहस्य बनाए रखते हुए डबल मीनिंग वाली बात| बात का अर्थ वक्ता और श्रोता अपने अपने हिसाब से निकालने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिये जाएँ|

अश्लील पक्ष को नज़र अंदाज़ कर दें, तो कादर खान और आनंद बक्षी जी ने फिल्मों में इस का भरपूर उपयोग किया है| श्लेष अलंकार के बारे में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें|

तो आइये अब पढ़ते हैं उस विशेष पंक्ति वाली पहली प्रस्तुति:-


घर में न हो तो सूना-सूना लगे घर ; कोई
चीज़ न ठिकाने मिले और चूल्हा जले ना !
मिले न कलाई में मरीज़ की तो बैद कहे –
जान का है ख़तरा जो टाले से भी टले ना !
साथ न निभाए तो शरीर मुरझाए , और
दुनिया में घर भी किसी का फूले-फले ना !
जीवन-आधार ‘नारी-नाड़ी’ ; स्वर्णकार कहे –
काम जीव का कोई भी ‘नार’ बिन चले ना

[राजेन्द्र भाई ने 'नार' शब्द के जो दो अर्थ लिए हैं उन में से एक है नारी / स्त्री और दूसरा
है नाड़ी| मंच की प्रार्थना पर आप ने अपना सर्वोत्तम प्रस्तुत कर के साबित किया है कि
आप छंदों को ले कर कितने संजीदा हैं| व्यक्तिगत रूप से मैं आप के इस प्रयास की
जितनी भी तारीफ करूँ कम होगी]




हर मंच का दायित्व होता है कि स्थापित रचनाधर्मियों के साथ साथ नवोदित एवम् स्थापित परंतु विधा विशेष में आरम्भिक प्रयास करने वाले कवि / कवियात्रियों को भी स-सम्मान स्थान दें| इस क्रम में अगली बार हम कुछ नये सदस्यों से मिलेंगे और उन के प्रयासों को पढ़ेंगे| जिन सदस्यों को अपने छन्दों में कुछ सुधार की ज़रूरत लग रही हो, वे जल्द से जल्द नये छन्द भेजने की कृपा करें|

आप सभी राजेन्द्र भाई के कल्पना लोक की सैर करें और ये अद्भुत रचना संसार आप को कैसा लगा, टिप्पणियों के माध्यम से व्यक्त कर इस साहित्यिक आयोजन को वेग प्रदान करें, और हम वही करते हैं - एक और पोस्ट की तैयारी|

जय माँ शारदे!

तीसरी समाया पूर्ति - कुण्डलिया - सुंदरियाँ ये ब्लॉग्स की ! वल्लाऽऽ ! ग़ज़ब रुआब

सभी साहित्य रसिकों का पुन: सादर अभिवादन


पिछली पोस्ट डरते डरते डाली थी, सोचा मित्रों को कुछ अनुचित न लग जाए, परन्तु सकारात्मक परिणाम मिलने से अब चैन की साँस मिली| आइये आज पढ़ते हैं बीकानेर वाले राजेन्द्र भाई के कुण्डलिया छन्दों को| बीकानेर की भुजिया की तारी'फें तो बहुत सुनी थीं, पर वहाँ की सुन्दरियाँ भी इत्ती सो'णी होती हैं, अब राजेन्द्र भाई को पढ़ कर पता चला| भाई किसी को इत्तेफाक न हो तो वो भी पढ़ के देख ले :-




सुंदरियाँ ये ब्लॉग्स की

सुंदरियाँ ये ब्लॉग्स की ! वल्लाऽऽ ! ग़ज़ब रुआब|
दिल से मैं करता इन्हें… अदब सहित आदाब||
अदब सहित आदाब ; ख़ूब दिखलातीं ये दम|
घर-ऑफिस के साथ नेट पर गाढें परचम|
'स्वर्णकार' कविराय, मुग्ध पढ-पढ टिप्पणियाँ|
धन्य ‘शब्द स्वर रंग’ - पधारें जब सुंदरियाँ|१|
[मालुम पड़ रहा है भइये, ब्लोग्स की सुन्दरियाँ यदि नाराज हो जाएँ तो आप ही झेलना]


सुंदरियाँ सो’णी लगें

सुंदरियाँ सो’णी लगें, जब वे डालें घास|
वरना क्या है ख़ास ? सब - लगती हैं बकवास||
लगती हैं बकवास ; घमंडिनि-दंभिनि सारी|
प्रौढ़ा तरुणी और कामिनी कली कुमारी|
चांदी-सिक्के जेब - ठूँस, करिए रँगरलियाँ |
आगे-पीछे लाख-लाख डोलें सुंदरियाँ|२|
[भाभ्भीजी नें बतानो पड़ेग्गो]


केशर कली कटार

सुंदरियाँ नीकी लगें , मीठे उन के बैन|
अधर रसीले , मोहिनी - छवि, रतनारे नैन||
छवि रतनारे नैन ; निरख’ सुख-आनँद उपजै|
रचना सुंदर सौम्य - निरख प्रभु की, मन रीझै||
केशर कली कटार, कनक की कछु कामिनियाँ|
स्वर्णकार सुख देय, सहज सुवरण सुंदरियाँ|३|
[मार डाला पाप्पड वाले को यार]

तुम्हारे रूप के सामने - पानी भरें सुन्दरियाँ

सुंदरियाँ देखी यहाँ, हमने लाख हज़ार|
नहीं कहीं तुम-सी प्रिये! छान लिया संसार||
छान लिया संसार; सुंदरी तुम सुकुमारी|
छुई मुई की डाल ! सुशोभित केशर-क्यारी||
मंजरियों सी अंग-गंध ; कुंतल वल्लरियाँ|
सम्मुख तुम्‍हरे रूप - भरें पानी सुन्दरियाँ|४|
[शुक्रिया राजेन्द्र जी अपने विद्यार्थी काल के अनुभव साझा करने के लिए]

कम्प्यूटर

कम्प्यूटर जी आप तो, बहुत ग़ज़ब की चीज़|
करें भला ता’रीफ़ क्या, हम जैसे नाचीज़!!
हम जैसे नाचीज़ ; सभी की छुट्टी कर दी|
कोटि-कोटि का ज्ञान , भरा जिसकी क्या गिनती|
बड़ी ज़रूरत आप बने हर घर हर दफ़्तर|
तुमको लाख सलाम ! महाज्ञानी कम्प्यूटर|५|
[जय हो]

भारत मेरी जान है

भारत मेरी जान है , इस पर मुझको नाज़|
नहीं रहा बिल्कुल मगर, यह कल जैसा आज||
यह कल जैसा आज ; गुमी सोने की चिड़िया|
बहता था घी-दूध आज सूखी हर नदिया||
करदी भ्रष्टाचार - तंत्र ने, इसकी दुर्गत|
पहले जैसा, आज - कहाँ है? मेरा भारत|६|
[सही बन्धु एक दम सही]


आंखें फड़कें देख कर सुंदरियाँ


सुंदरियाँ इक साथ जब, दिख जातीं दो – चार|
बढ़ती दिल की धुकधुकी, चढ़ता सर्द बुखार||
चढ़ता सर्द बुखार; बचाना तू ही रब्बा|
लग ना जाए आज कहीं इज़्ज़त पर धब्बा|
देखी हैं हर ठौर, टूटती टाँग-खुपडियाँ|
जब जब फडकें आँख - देख - सो'णी सुंदरियाँ|७|
[चलो देर आयद दुरुस्त आयद, अब भाभ्भीजी को नहीं बतान्ग्गो]

-राजेन्द्र स्वर्णकार

भारतीय छन्द साहित्य की सेवा स्वरूप शुरू किये गए इस आयोजन में आप सभी के अनमोल सहयोग के लिए एक बार फिर से आभार| इस आयोजन को आगे बढाने के लिए आप लोगों से फिर से सविनय निवेदन है कि अपने अपने छन्दों को सुधार कर यथाशीघ्र भेजने की कृपा करें| जिन लोगों ने अब तक नहीं भेजें हैं, वो भी अब अपने छन्द भेजने की कृपा करें| मथुरा जाने से पहले, कुण्डली छन्द पर आयोजित इस तीसरी समस्या पूर्ति का समापन करने का विचार है ताकि उस के बाद घनाक्षरी कवित्त पर चर्चा आरम्भ की जा सके|