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संस्कृत दोहे हिन्दी अर्थ सहित - डॉ. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय


 

याति भीतिभयभीषणं वर्षं दर्पितमेव,

जनयेज्जनगणमङ्गलं ,नववर्षं हे देव !


 भीतिभूखभय से भरा रुग्ण गया चौबीस ।

जनगणमनमंगल करे,हे भगवन् पच्चीस ।

दोहे - राजमूर्ति 'सौरभ'


 

राधे! राधे!राधिका, मोहन!मोहन! श्याम।

दोनों ही जपने लगे,अपना-अपना नाम।।

 

एक दूसरे को जपें, निशिदिन, आठों याम।

साधारण प्रेमी नहीं, हैं राधा-घनश्याम।।

नये साल के दोहे - रमेश शर्मा



आई है नव वर्ष की, नई नवेली भोर ।

खिड़की से दिल की मुझे, झाँक रहा चितचोर ।।

 

पहुँची हो चौबीस में, लेखन से कुछ ठेस ।

क्षमा ह्रदय से माँगता, उनसे आज रमेश ।।

मुहावरों पर दोहे - आ. सलिल

दोहा कहे मुहावरा, सुन-गुन समझो मीत.
इसमें सदियों से बसी, जन-जीवन की रीत..
*
पानी-पानी हो गये, साहस बल मति धीर.
जब संयम के पल हुए, पानी की प्राचीर..

चायनीज बनते नहीं, चायनीज जब खायँ

चायनीज बनते नहीं, चायनीज जब खायँ।
फिर इंगलिश के मोह में, क्यूँ फ़िरंग बन जायँ।१।
क्यूँ छोडें पहिचान को, रहे छाँव या धूप।
अपने रँग में रँग रहे, उस का रंग अनूप।२।

दीपावली के दोहे - गोरी तुझसे फूटते फुलझड़ियों से रंग - नवीन

प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

दसों दिशा जगमग हुईं, धरती-गगन ललाम|
पहुँचे थे जिस क्षण अवध, लक्ष्मण-सीता-राम|१|

बम्ब पटाखे फूटते, कोलाहल के संग|
मनमोहक लगते मगर, फुलझड़ियों के रंग|२|

सजनी सजना से कहे, सजन सजाओ साज|
मुझे लादिए प्रीत से, धनतेरस है आज|३|

प्रीतम-पाती पढ़ रहे, प्रीत पारखी नैन|
शब्दों में ही ढूंढते, दीप अवलि सुख दैन|४|

कल-कल कहते कट गया, कितना काल कराल|
इस दीवाली तो सजन, दिल को कर खुशहाल|५|

अत्युत्तम, अनुपम, अमित, अद्भुत, अपरम्पार|
सुंदर, सरस, सुहावना, दीपों का त्यौहार|६|

यही बात कहते रहे, हर युग के विद्वान्|
दीपक-ज्ञान जले तभी, मिटे तमस-अज्ञान|७|

बुधिया को सुधि आ गयी, अम्मा की वो बात|
दिल में रहे उमंग तो, दीवाली दिन-रात|८|

दीवाली का है यही, दुनिया को सन्देश|
अपनों को भूलो नहीं, देश रहो कि विदेश|९|

चूनर साड़ी ओढ़ना, बिंदिया, कंगन संग|
गोरी तुझसे फूटते फुलझड़ियों से रंग|१०|

सजा थाल पूजा करें, साथ रहे परिवार|
हर घर में ऐसे मने, दीवाली त्यौहार|११|

रसबतियाँ बतिया रहे, ले हाथों में हाथ|
ये दीवाली ख़ास है, दिलदारा के साथ|१२|

बम्ब पटाखे फुलझड़ी, धरे अनोखे रंग|
खील बताशे खो रहे, पर, हटरी के संग|१३|

भरे पड़े हर सू, यहाँ, ऐसे भी इंसान|
फुस्सी बम से हौसले, रोकिट से अरमान|१५| 

बहना की कुंकुम लगे, हर भाई के माथ|
मने दूज का पर्व भी, दीवाली के साथ|१६|

मातु, पिता, भाई, बहन, सजनी, बच्चे, यार|
जब-जब ये सब साथ हों, तब-तब है त्यौहार|१७|

रमा चरण पर राखिये, श्रद्धा सह निज माथ|
दीपावली मनाइए, दीप अवलि  के साथ|१८|

दिवाली / दीवाली के दोहे

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

कुछ दोहे-सोरठे - नवीन

दोहे 

जलें दीप हर द्वार पर, मिटे अंधेरी रैन|
सब को इस दीपावली, मिले शान्ति, सुख, चैन|१|

पाकिट में पैसे भरे, आँखों में दुःख-दर्द|
बिना फेमिली ज़िंदगी, ज्यूँ सजनी, बिन मर्द|२|

अनुभव, ज्ञान, उपाधियां, रिश्ते, नफरत, प्रीत।
बिन मर्ज़ी मिलते नहीं, यही सदा की रीत ।३।



सोरठे 

ऐसा हुआ कमाल, बाँहें बल खाने लगीं|
पूछ न दिल का हाल, अब के करवा चौथ में|१| 

'करवा-चन्द्र'  निढाल, करता रहा अतीत से|
'शरद-चन्द्र' तत्काल, बहन भाई का प्यार है|२|

:- नवीन सी. चतुर्वेदी