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'लव की हॅप्पी एंडिंग' एवं 'कुछ दिल की कुछ दुनिया की' - पुस्तक समीक्षा

अब जरूर हम मथुरा को ठीकठाक सा एक टाउन कह सकते हैं मगर 1990 के आसपास मथुरा इतना डिवैलप नहीं हुआ था । हालाँकि रिफायनरी आ चुकी थी, टाउनशिप बस चुकी थी, कॉलोनियों की बात हवाओं में तैरने लगी थी फिर भी 1990 का मथुरा 1980 के मथुरा से बहुत अधिक उन्नत नहीं लगता था ।

उस मथुरा की एक गली में जन्मी हुई लड़की की शादी महानगर में होती है । मथुरा के संस्कारों को मस्तिष्क में और महानगर वाले पतिदेव के अहसासात को दिल में सँजोये हुए वह गुड़िया बाबुल का घर छोड़ कर पी के नगर के लिए निकल पड़ती है । जिस तरह कहते हैं न कि दुनिया गोल है उसी तरह गृहस्थी की दुनिया भी सभी जगह और सभी के लिए गोल-मोल ही होती है । उस गोल-मोल दुनिया में यह लड़की डटकर परफोर्म करती है, दूरदर्शन, सी एन एन, सी एन बी सी, डी डी भारती और आई बी एन से मीडिया अनुभव ग्रहण करते हुए कालान्तर में एक सफल लेखिका बन कर राष्ट्रीय पटल पर छा जाती है । इस लड़की का घर का नाम गुड़िया ही है और अब भारतीय साहित्य-जगत इसे अर्चना चतुर्वेदी के नाम से जानता है । उत्कृष्ट कोटि की व्यंग्य लेखिका अर्चना जी का साहित्यिक प्रवास उत्तरोत्तर ऊर्ध्व-गामी रहा है । ब्रजभाषा और हिन्दी दौनों ही क्षेत्रों में आप की रचनाओं को पाठकों का अपरिमित स्नेह प्राप्त हुआ है । आप की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आपको अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं ।

पिछले दिनों आप की दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं । पहली पुस्तक “लव की हॅप्पी एंडिंग” जो कि हास्य कहानी संग्रह है और दूसरी पुस्तक “कुछ दिल की कुछ दुनिया की” किस्सा गोई पर आधारित है । अर्चना चतुर्वेदी प्रसन्नमना लेखिका हैं, दिल से लिखती हैं, मज़े ले-ले कर लिखती हैं, इसीलिए इन्हें पढ़ने वाले इन्हें बार-बार पढ़ना चाहते हैं ।





इन पुस्तकों को भावना प्रकाशन से मँगवाया जा सकता है ।

भावना प्रकाशन – फोन नम्बर – 8800139685, 9312869947

हम ग़ालिबो-नज़ीर नहीं बन सके तो क्या

 

हम ग़ालिबो-नज़ीर नहीं बन सके तो क्या
शेरो-सुख़न में हमने गुज़ारी तमाम उम्र
उर्दू ज़बाँ पै अपना भी है क़र्ज़ दोसतो
हमने इसी की ज़ुल्फ़ सँवारी तमाम उम्र

हिमाचल प्रदेश के भाषा व संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित उर्दू साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका “ जदीद फ़िक्रो-फ़न” का 102 वाँ अंक प्राप्त हुआ । पत्रिका के मुख्य सम्पादक हैं डॉ. पंकज ललित और अतिथि सम्पादक हैं श्री विजय कुमार अबरोल उर्फ़ ज़ाहिद अबरोल साहब । आदरणीय लालचन्द प्रार्थी उर्फ़ चाँद कुल्लुवी साहब को अपनी उपरोक्त पंक्तियाँ समर्पित कर के अपने सम्पादकीय को शुरू करते हुए अबरोल साहब ने भूत-वर्तमान और भविष्य की अच्छी पड़ताल की है । विशेषतः इन्हों ने विवेच्य अंक में उन रचनधर्मियों को विशेषतः स्थान दिया है जो किसी न किसी कारणवश भीड़ से दूर रहते हैं । उर्दू की इस पत्रिका के 26 पन्ने देवनागरी लिपि में हैं और 86 पन्ने नस्तालीक रस्म-उल-ख़त (पर्शियन स्क्रिप्ट जिसे हम उर्दू समझते हैं ) में हैं । मैं चूँकि पशियन स्क्रिप्ट से अनभिज्ञ हूँ इसलिए बस देवनागरी लिपि वाले हिस्से का ही रसास्वादन कर सका हूँ ।
 
इस पत्रिका से कुछ चुनिन्दा अशआर
 
मैं पहले ख़ौफ़ फैलाता हूँ फिर यह सोचता हूँ
परिन्दे मेरे आँगन में उतरते क्यों नहीं हैं
: अयाज़ अहमद तालिब
 
हमारी आँखें हमारी कहाँ हैं हो कर भी
वही है देखना हम को जो रब दिखाता है
“ कृष्ण कुमार “तूर”
 
तेरे मकान के बेलों लदे दरीचे पर
ये किसकी रूह का ताइर तवाफ़ करता है
“ राजिन्दर नाथ “राहबर”
 
रहते थी जिसके हाथ हमेशा कपास में
बेचारा मर गया नये कपड़ों की आस में
“ ज़मीर दरवेश
 
अब्र ख़ुशियों का अगर जम कर नहीं बरसा तो क्या
ग़म के बादल भी बहुत जल्दी धुआँ हो जाएँगे
: आबशार आदम
 
बहुत से लोग हवादिस में मारे जाते हैं
हर आदमी का जनाज़ा नहीं निकलता है
: “कशिश” होशियारपुरी
 
एक पोरस भी तो रहता है हमारे अन्दर
जो ‘सिकन्दर’ को ‘सिकन्दर’ नहीं रहने देता
: द्विजेंद्र द्विज
 
अब वो भी दिन में तारे दिखलाते हैं
जिनकी थाली में कल चाँद उतारा था
: नववीत शर्मा
 
यादों के गुलशन में यूँ तो रंग-बिरंगे फूल भी हैं
लेकिन फिरते हैं काँटों को सीने से चिपकाए लोग
: कृष्ण कुमार “नाज़”
 
ऐ वतन! अहले-वतन उनको भुला देते हैं
जो तेरा क़र्ज़ चुकाते हुए मर जाते हैं
“ सुभाष गुप्ता “शफ़ीक़”
 
कहाँ पर वार करना है पराया क्या ही जाने
कहाँ से दुर्ग ढहना है ये अपना जानता है
: जावेद उलफ़त
 
मोहल्ले वालों का सर फोड़ना है बात अलग
फटेगी शर्ट तो समझोगे तुम रफ़ू क्या है
: टी. एन. राज़
 
पहली सफ़ों में आज गुलूकार आ गये
कितना बड़ा मज़ाक़ हुआ शाइरी के साथ
: काशिफ़ अहसन
 
इस पत्रिका के सम्पादकीय में श्री विजय कुमार अबरोल उर्फ़ ज़ाहिद अबरोल साहब ने लिखा है कि 1982 में परलोक सिधार चुके चाँद कुल्लुवी साहब का देवनागरी लिपि में शेरी मजमूआ अभी भी प्रकाशन के लिए प्रतीक्षारत है । इस के अलावा भी अबरोल साहब ने इस बात से जुड़ी और भी बातों पर इशारे किए हैं । जो नहीं लिखा है उसे भी कोई भी ललितकला प्रेमी सहज ही समझ सकता है । आओ हम सभी आशा करें कि अबरोल साहब के प्रयासों को सफलता मिले ।

लघुकथा - भाड़ में जाय ऐसा इन्क़लाब - नवीन सी. चतुर्वेदी

क़स्बाई संस्कृति के वाहक मध्यवर्गीय परिवार का एक होनहार लड़का रोज़ सुबह उठते ही घर के बाहर के चबूतरे पर बैठ जाता। 

अख़बार पढ़ता और रूस, अमरीका, जर्मन, जापान, चीन आदि-आदि की बातें ज़ोर-ज़ोर से बोलते हुए करता। 

साथ ही हर बार यह कहना नहीं भूलता कि अपने यहाँ है ही क्या? आदि-आदि। 

उस के अपने घर के लोग उसे डाँटते हुए कहते कि अरे बेटा अभी-अभी उठा है। ज़रा दातुन-जंगल कर ले। स्नान कर ले। घड़ी दो घड़ी रब को सुमिर ले। 

मगर वह नहीं सुनता। लोगों से बहसें लड़ाता रहता। 

उस के अनुसार सारे विद्वान विदेशों में हुए और भारत ने तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पाखण्डियों को ही पैदा किया। 

उस लड़के के घर के लोग उसे बार-बार टोकते रहते, मगर वह सुनता ही नहीं।

ऐसे ही किसी एक दिन वह रोज़ की तरह बे-तमीज़ी पर उतारू था। उस के पिता उसे बार-बार टोक रहे थे। वह अनसुना करता जा रहा था। तभी अचानक पड़ोस वाले डेविड साब की वाइफ उस के लिए चाय बिस्कुट ले आई।

पट्ठा अपने बाप की बातों को धता बता कर चाय बिस्कुट के मज़े लेने लगा। 

इस पर उस के पिता आग बबूला हो कर उसे पीटने दौड़ पड़े। न जंगल गया न दातुन की। न नहाया। न रब को सुमिरा। और चाय बिस्कुट खाने लगा। 

उस लड़के के पिता उस लड़के को पीटते इस से पहले ही गली मुहल्ले के बहुत से लोग बीच बचाव में आ गए। 

जिनके घर से चाय और बिस्किटें आई थीं वह डेविड साब उस लड़के के पिता को समझाने लगे कि पण्डित जी आप का लड़का इन्क़लाबी है उसे पीटिये मत। उसे समझने की कोशिश कीजिये। 

यह सुन कर उस लड़के के पिता बोले कि :- 

"अगर सुबह उठ कर बिना दातुन जंगल किये चाय-बिस्किट निगलते हुए दूसरों की तारीफ़ और अपनों की बुराई करना ही इनक़लाब है तो भाड़ में जाय ऐसा इनक़लाब" । 

वे लौट रहे हैं - शैलेश सिंह


वे लौट रहे हैं, इस बार खाली हाथ
उनकी जेबों में महज गांव का पता है
और मर चुके पिता का नाम।

उनकी आंखें सूनी हैं, जैसे  छीन ले कोई
मार कर दो थप्पड़
वे थप्पड़ और ठोकर खाकर लौट रहे हैं।

उनका लौटना हर बार से अलग है।

इस बार नहीं है कोई सामान
मसलन पत्नी का पिटारा
नहीं है माई के लिए लुग्गा
और भाई के लिए लमका छाता।

उनका लौटना, उनका नहीं है
वे तो लौटने के लिए गए ही नहीं थे
वे तो  बसना चाहते थे बीराने देस में

वे लौट रहे हैं ठीक उसी तरह
जैसे  लौटता है हारी  हुई पलटन  का सिपाही
वे लौट रहे हैं, जैसे खूंखार बाघ से बचकर भागती हुई लौटती है हिरनी
वे लौट रहे हैं, जैसे लौटे थे  चित्रकूट से भरत
वे लौट रहे हैं, अपनी खौफनाक यादों के साथ
वे लौट रहे हैं, जैसे लौटते हैं  अंतिम संस्कार के बाद परिजन
वे लौट रहे हैं, कभी वापस न आने की झूठी शपथ के साथ
वे लौट रहे हैं, जैसे लौटते हैं नदी जल के लिए हाथी
वे लौट रहे हैं, जैसे लौटा था पूस की रात का हलकू
वे लौट रहे हैं जैसे लौटते हैं प्रवासी पक्षी

उनका लौटना इतिहास में लौटना  नहीं है
उनका लौटना इतिहास को बदलना भी है
उनका इस तरह आना असंभव  को संभव बनाना था

वैसे वे हर बार असंभव को संभव बनाते रहे हैं।
// इति   //
शैलेश सिंह

इस सन्नाटे शहर में - शैलेश सिंह



हम किस शहर में रह रहे हैं!,
शहर जो अब नहीं रहा कहीं से भी शहर
अपने उद्दात्त व भव्य सौन्दर्य को अर्थहीन करता
यह  सन्नाटे और खौफ़  का आलम  कैसे तारी हो गया!,
एक सियाह चादर फैल गई सबकी छतों, खिड़कियों और दरवाजों पर
भयानक आवाजें गूंजती रहती हैं अक्सर यहां की सड़कों पर
जबकि आलम यह था कि लोग अपनी ही आवाज़ को सुनने को तरसते थे
इतना शोर कि बहरे होने का अंदेशा हमेशा बना रहता था।

भेड़ियाधसान से शायद ही यह शहर कभी मुक्त हुआ हो
याकि होना चाहा हो,
भीड़ ही जिसकी शिनाख्त हो, भीड़ ही जिसकी मौसकी हो
और भीड़ ही जिसकी कभी न गायब होनेवाली रूह हो
यकायक जाने कहां चले गए सब?

सड़कें जिन्हें देखने की हसरत  लिए
लोग चले आते थे दुनिया के हर आबाद और नायाब  गांव व शहर से
जहां चलना हमेशा मौत से टकराने के मानिंद
ख़ौफज़दा होता था।

जहां परिन्दों, कुत्तों और मवेशियों का आना लगभग वर्जित था।

जहां हवाओं तक को जद्दोजेहद करनी पड़ती थी
जहां आसमान की नीलिमा खो गई थी
जहां लदे रहते थे हर सिम्त लोग
जहां कौवों और कोयलों में लोगों ने फर्क करना कभी मुनासिब नहीं समझा
याकि उन्हें फुर्सत ही कहां थी, अपने से बाहर झांकने की

जहां हव्वा की  प्यारी संतानें अपने हसीन सपनों के साथ इस शहर में  दाखिल होती थीं
और सप्ताह के दूसरे इतवार तक  वे भूल जातीं थीं अपनी मादरी जुबान
और समुद्र की लहरों के साथ तरंगें लेने लगतीं थीं ।

वह परदेसी इस शहर से कभी जुदा होना नहीं चाहता था,
अचानक ऐसी बिपदा , ऐसा कुदरत का क़हर, ऐसी बीमारी ऐसी गाढ़ी महामारी
कि कभी किसी भी फितरत से  न  क़ैद होनेवाला शहर
अपनी मोसकी की रव में मुत्लिबा रहनेवाला यह शहर
सन्नाटे की सांय- सांय -- भांय- भांय में विलीन हो गया।

सड़कें अब परिंदों की सैरगाह  में तब्दील चुकीं हैं
गोया ये कभी सड़कें थीं ही नहीं

कुत्ते खोजते रहते हैं आदम की औलादों को
जो  सरे-आम देखते- देखते गायब हो गए।

कभी - कभी जेठ की दुपहरी में अस्पताल की गाड़ी
दौड़ती है अपने सायरन की खौफ़नाक आवाजों के साथ।

एक आदमी खिड़की से देखता है
और कहता है-- हम इक्कीसवीं सदी के मोहन- जोदारों में आ गए हैं।

यहां निरीह चेहरे बंद आंखें लिए खड़े हैं।

यह शहर कहीं भूल तो नहीं गया अपनी रफ़्तार?

रफ़्तार और तेज रफ्तार जिसका वजूद था।

वह कैसे पस्त हो गया एक न दिखाई देनेवाले अणुजीव से।

हे समुद्र के शहर तुम लौटो अपनी पूरी रफ्तार के साथ,

अपने लोगों के साथ।
अपनी भीड़ के साथ
अपनी रूह के साथ,
अपनी अहर्निश  गति के साथ
अपने वर्तमान  में तुम लौटो,

ताकि लौट सकें जीवन,
ताकि लौट सकें आदम - हौव्वा की संतानें
जिनके हाथ संवारें तुम्हारा और अपना भविष्य
यह  विज्ञापन नहीं , कविता नहीं ,एक गुहार है विज्ञान से,
समुद्र से,
नदियों से
आसमान से
और उन कभी न दिखनेवाले तारों से
//इति//

शैलेश सिंह

पुरुष दिवस पर कविता - अर्चना चतुर्वेदी


मर्द के दर्द

तुमने कहा एक चुटकी सिंदूर की कीमत तुम क्या जानो ?
मैं खटता रहा दिन रात ताकि जुटा सकूँ
सिंदूर के साथ गहने कपड़े तुम्हारे लिए
और देख सकूँ तुम्हे मुस्कुराते हुए ..

तुमने कहा मर्दों के दिल नहीं होता
और मैं मौन आंसू पीता रहा .और छुपाता रहा अपने हर दर्द को
और उठाता रहा हर जिम्मेदारी हँसते हँसते ..
ताकि तुम महसूस ना कर सको किसी भी दर्द को और खिलखिलाती रहो यूँ ही

तुम मुझे बदलना चाहती थी और जब मैंने ढाल लिया खुद को तुम्हारे मुताबिक
और एक दिन कितनी आसानी से तुमने कह दिया
तुम बदल गए हो ...
और इस बार मैं मुस्कुरा दिया था हौले से

अबकी तुमने कहा ‘तुम मर्द एक बार में सिर्फ एक काम ही कर सकते हैं
हम महिलाएं ही होती हैं मल्टीटास्किंग में महारथी
और मैं ऑफिस ,बॉस ,घर, बच्चे ,माँ और
तुम्हें खुश रखने के सारे जतन करता रहा
बिना थके बिना हारे

सच कहा तुमने ,
नहीं जानता मैं सिंदूर की कीमत
ना ही होता है मुझे दर्द आखिर मैं हूँ मर्द
और मर्द के दर्द नहीं होता ।।

अर्चना चतुर्वेदी

प्रयास - लफ़्ज़

प्रयास



 पिछले कुछ बरसों से देवनागरी मे ग़ज़ल का जल्वा जिस रफ्तार से बढा है वो अदबी हल्को मे तअज़्ज़ुब और कौतूहल का विषय है। किसी भी विधा का रचनाधर्मी ग़ज़ल ज़रूर कहना चाह्ता है जिसके कारण स्पष्ट हैं – ग़ज़ल महज एक ख्याल पर केन्द्रित बयान नहीं देती –ये एक ही माला मे अनेक विचारों के मोती पिरोने का काम है। इसलिये फार्मेट मे अभिव्यक्ति के बेशुमार आयाम हैं –इसका दूसरा पहलू ये भी है कि ग़ज़ल कहना आसान नहीं है !! काव्य सृजन की कितनी भी नैसर्गिक क्षमता आपके पास क्यों न हो गज़ल कहने के लिये आपको मशक्कत करनी ही पडेगी। ख़ैर यहाँ गज़ल के वैभव की तफ़्सील से व्याख्या करना मकसद नही है। बात जहाँ से शुरूअ हुई है वही से आगे बढाई जाय –कि देवनागरी लिपि मे गज़ल आज की तारीख़ मे बेहद लोकप्रिय है। जिसका कारण अगर तलाश किया जाय तो बहुत विवाद नही करना पडेगा।

देवनागरी मे ग़ज़ल बलबीर सिंह "रंग" ने कही दुष्यंत कुमार ने कही , शबाब मेरठी ने कही , सूर्यभानु गुप्त ने कही ज़हीर कुरेशी ने कही और अनेक अनाम लोगों का भी इसमे योगदान रहा –लेकिन इस लिपि में ग़ज़ल का दबदबा तभी काइम हो सका जब तुफैल साहब ने अपनी पत्रिका रस-रंग आरम्भ की।"रस-रंग" पहले वार्षिक फिर अर्धवार्षिक प्रकाशित होती थी। अपने पहले ही अंक के साथ ऐसा लगा कि "रस-रंग" कौमी यकज़हती और सुलहेकुल का एक विशाल मंच है ऐसा लगा कि उर्दू –हिन्दी को संवाद का एक मजबूत सेतु मिल गया है। दूसरे अंक के बाद ही इस पत्रिका ने अपनी अन्य समकालीन सभी पत्रिकाओं को मीलों पीछे छोड दिया और खुद अपना मानदण्ड बन गई। बहस इस बात पर नही होती थी कि कौन पत्रिका ग़ज़ल की सरताज पत्रिका है बहस इस पर होती थी कि रस रंग का फलाँ अंक सबसे अच्छा है। मोतबर मुकाम पर खडे उर्दू अदीबों को देवनागरी के विशाल पाठक वर्ग तक रसाई का एक सुनहरा मौका मिला और प्रतिभाशाली और युवा संघर्षशील शाइरों को एक खूबसूरत लांचिंग प्लेट्फार्म मिला।

लेकिन खुदगर्ज़ और आत्ममुग्ध कथित शाइरों को एक आइना भी मिला। रस-रंग मे प्रकाशित होने की शर्ते बेहद आसान और बेहद कडी थीं। आसान यूँ कि आपको निजी परिचय की आवश्यकता नही, कडी इसलिये कि ग़ज़ल को प्रकाशित होने से पूर्व "तुफैल" नामक आइनेखाने से गुज़रना होता था। इस पत्रिका की लोकप्रियता ऐसी बढी कि सन 2004 से इसे त्रैमासिक कर दिया गया और इसका नाम "लफ़्ज़" हो गया। लफ़्ज़ के अंक ग़ज़ल के सफर मे मील के पत्थर हैं।"लफ़्ज़" के बारे में कुछ बाते सर्वमान्य हैं --

देवनागरी लिपि मे ये ग़ज़ल की एकमात्र पत्रिका है जिसे हिन्दी वाले ही नहीं उर्दू वाले भी उर्दू पत्रिकाओं से ऊपर रेट करते हैं।

लफ़्ज़ मे प्रकाशित ग़ज़ल विश्वसनीयता और मेयार की बुलन्दी छपने के साथ ही हासिल कर लेती है।

लफ़्ज़ का सम्पादकीय बहरे बेकराँ जैसा  होता है जिसका वैचारिक पक्ष ज़बर्दस्त हलचल पैदा करता है।

लफ़्ज़ एक पत्रिका भर नही , एक परचम , एक तरकश , एक आन्दोलन भी है जिसने समकालीन साहित्यिक जगत के इलीट क्लास को वस्तुत: सम्मोहित  कर रखा है।

तुफैल साहब आज के साहित्यकार की सोई हुई चेतना को जगाना जानते हैं। प्रसंगवश एक बार उन्होने अपने सम्पादकीय मे एक शेर फिराक़ के नाम से क़्वोट कर दिया –लेकिन अगले अंक मे उन्होने बाखबर साहित्यकारों के बेखबरी की खासी खबर ली कि "भई !! क्यों आप लोग शेर और शाइर की निशानदेही करने से चूक गये"। ऐसे साहित्यिक परिहास वो अक्सर करते हैं –लेकिन वो हर कदम साहित्य की सम्रद्धि के लिये ही उठाते हैं।         

इसलिये कोई ताअज़्ज़ुब नही कि मुज़फ्फर हनफी, राजेन्द्र नाथ रहबर, मुनव्वर राअना जैसे वरिष्ठ और प्रतिष्ठित अदीबों ने लफ़्ज़ मे अपने लिये लिखे गये बयानात को लम्बी जद्दोजहद के बाद अन्तत: स्वीकार किया। लफ़्ज़ मे ग़ज़ल और व्यंग्य आलेख प्रकाशित किये जाते हैं। व्यंग्य के मामले में पत्रिका बडा दावा नही करती।लेकिन ग़ज़ल के मुआमले मे भी यह पत्रिका बडा दावा इसलिये नहीं करती कि इसे चुनौती देने वाला कोई है ही नहीं।

जनवरी 2012 से लफ़्ज़ की वेवसाइट आरम्भ की गई जिसमे गज़लें प्रकाशित की जाती हैं। और तरही मुशायरे आयोजित किये जाते हैं!! फेसबुक जैसे ख्यातिलब्ध पोर्टलो के मुकाबले भी लफ़्ज़ की तरही नशिस्त एक विशेष आकर्षण रखती है।लफ़्ज़ के प्रशंसको को इसके पुराने अंक इस वेवसाइट पर उपलब्ध हैं।

कामना यही है कि इस पत्रिका का अखण्ड गौरव बना रहे और बढता रहे।




:- मयङ्क अवस्थी 

ग़ज़लें - मयङ्क अवस्थी


ख़ुश्क आँखों से कोई प्यास न जोड़ी हमने

आस हमसे जो सराबों को थी, तोड़ी हमने

 

हमने पाया है शरर अपने  लहू में हरदम

अपनी दुखती हुयी रग जब भी निचोड़ी हमने

 

जो सँवरने को किसी तौर भी राज़ी न हुई

भाड़ में फेंक दी दुनिया वो निगोड़ी हमने

 

इस तरह हमने समन्दर को पिलाया पानी

अपनी कश्ती किसी साहिल पे न मोड़ी हमने

 

जब कोई चाँद मिला दाग़ न देखे उसके

आँख सूरज से मिलाकर न सिकोड़ी हमने

 

ग़र्द ग़ैरत के बदन पर जो नज़र आयी कभी

तब तो तादेर , अना अपनी झिंझोड़ी हमने

 

 

 

क़ैदे-  शबे-  हयात बदन में गुज़ार के

उड़ जाऊँगा मैं सुबह अज़ीयत उतार के

 

इक धूप ज़िन्दगी को यूँ सहरा बना गयी

आये न इस उजाड़ में मौसम बहार के

 

ये बेगुनाह शम्म: जलेगी तमाम रात

उसके लबों से छू गये थे लब शरार के

 

सीलन को राह मिल गयी दीमक को सैरगाह

अंजाम देख लीजिये घर की दरार के

 

सजती नहीं है तुमपे ये तहज़ीब मग़रिबी

इक तो फटे लिबास हैं वो भी उधार के

 

बादल नहीं हुज़ूर ये आँधी है आग की

आँखो से देखिये ज़रा चश्मा उतार के

 

 

 

बिखर जाये न मेरी दास्ताँ तहरीर होने तक

ये आँखें बुझ न जायें ख़्वाब की ताबीर होने तक

 

चलाये जा अभी तेशा कलम का कोहे –ज़ुल्मत पर

सियाही वक़्त भी  लेती है  जू-ए-शीर होने तक

 

इसी ख़ातिर मेरे अशआर अब तक डायरी में हैं

किसी  आलम में जी लेंगे ये आलमगीर होने तक

 

तेरे आग़ाज़ से पहले यहाँ जुगनू चमकते थे

ये बस्ती मुफ़लिसों की थी तेरी जागीर होने तक

 

मुझे तंज़ो-मलामत की बड़ी दरकार है यूँ भी

अना को सान भी तो चाहिये शमशीर होने तक

 

मुहब्बत आखिरश ले आयी है इक बन्द कमरे में

तेरी तस्वीर अब देखूँगा खुद तस्वीर होने तक

व्यक्तित्व - फलक पर नूर का शजरा –"तुफैल चतुर्वेदी"

फलक पर नूर का शजरा –"तुफैल चतुर्वेदी"

एक स्केच : मयङ्क अवस्थी

 

देवनागरी लिपि मे ग़ज़ल की लोकप्रियता चार नामो की कृतज्ञ है –पंडित अयोध्या प्रसाद गोयलीय –सरदार बलवंत सिंह यानी प्रकाश पण्डित –नरेन्द्र नाथ और जिनके बारे मे हम आगे बात कर्ंगे –यानी जनाब मुहत्तरम तुफैल चतुर्वेदी जिनका पूरा नाम विनय कृष्ण  चतुर्वेदी तख़्ल्लुस "तुफैल" है और यह नाम आज गज़ल के दयार मे प्रेम, प्रशंसा, ,भय ,आतंक और अन्य मानस के संचारी भावों के साथ लिया जाता है जिसमे सबसे ऊपर का भाव आदर का भाव है – एक ऐसा व्यक्ति जिसकी ग़ज़ल कहने और समझने की प्रतिभा निर्विवाद श्रेष्ठतम की श्रेणी मे आती है –जो देवनागरी की सबसे दमदार और सबसे प्रशंसित ग़ज़ल पत्रिका लफ़्ज़ के सर्वेसर्वा हैं और जिनकी आवाज़ अदब के बेशुमार शोर गुल मे भी चुप रह कर सुनी जाती है।

 

पहले नैनीताल और अब ऊधमसिंह नगर की काशीपुर स्टेट के कुलदीपक "तुफैल साहब"चाँदी का चम्मच मुँह मे ले कर पैदा हुये और महज 18 बरस की उम्र मे फकीरी ले कर आध्यात्मिक यात्रा पर  निकल गये –लेकिन ग़ज़ल विधा को अपना सबसे बडा पैरोकार और नुमाइन्दा मिलना था इसलिये मरहूम कृष्ण बिहारी नूर के शाइरी के घराने मे अदब के इस  चश्मो चराग़ की तर्बीयत और परवरिश हुई और बाद मे यही नाम हजारो गज़ल पसन्द  करने वालो और सीखने वालो के लिये परस्तिश और प्रशंसा का सबब बन गया।

 

अमरीका हो या पाकिस्तान , तुफैल साहब जहाँ भी गये हैं वहाँ के अदबी हल्कों और समाचार पत्रों ने उन्हें हाथों हाथ लिया है।तुफैल फूलों का गुलदस्ता है -हमारे अहद की सबसे खुश्बूदार आवाज़ के मालिक जैसा कि उनको फोन पर सुन कर आपको महसूस होगा। ये बहत्तर निश्तरों वाले तनक़ीदकार भी हैं जैसा कि अपनी गज़ल उनको सुना कर आपको महसूस होगा। ये पत्थर की निगहबानी मे शीशे की हिफाज़त के पैरोकार हैं। चाहे कराची हो या न्यूयार्क हर जगह उन्होने अपनी अप्रतिम और विलक्षण प्रतिभा का लोहा मनवाया है। कुल मिला कर जैसे आध्यात्म मे ओशो रजनीश पर प्रतिक्रिया देना इस दौर के हर तालिबे इल्म की मजबूरी है वैसे ही ग़ज़ल के शहर मे तुफैल के परचम को सलाम करना अदीबों की ज़रूरत ही नही मजबूरी भी है। इनके यहाँ अच्छी ग़ज़ल को वृहत्तर क्षितिज दिये जाते हैं –नामचीन होना कोई पाबन्दी नही है लफ़्ज़ मे छपने के लिये सिर्फ ग़ज़ल पाएदार और ऊंचे मेयार की होनी चाहिये । वो सच कहते हैं सिर्फ सच कहते हैं और सच के सिवा और कुछ नही कहते जिसकी तस्दीक़ उनकी ग़ज़ले और उनके सोशल इश्यूज पर दिये गये तमाम बयानात करते हैं।

 

विभाजन के बाद भारत की भाषा हिन्दी उर्दू के संक्रमण काल से भी गुज़री और आज  हिन्दुस्तान मे जिस भाषा मे संवाद किया जाता है उसमे हिन्दी , उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द बेहद सहज रूप मे शुमार हैं। अब सवाल यह है कि "भाषा बहता नीर" के इस दैनन्दिन परिवर्ती स्वरूप मे साहित्य और समाज के लिये स्वीकार्य अंश की निशानदेही और पैरवी कौन करेगा ?!! तो हिन्दुस्तान के लिये और ग़ज़ल फार्मेट के लिये कौन सी भाषा सटीक और उपयुक्त हो सकती है इसकी मुहर आज तुफैल चतुर्वेदी के पास है। जब भारत पाकिस्तान ग़ज़ल मंच के एक मोतबर शाइर ने मंच पर ये शेर सुनाया –

 

घरों की तर्बियत क्या आ गई टी वी के हाथों मे

कोई बेटा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता

 

तो “बेटा बाप के ऊपर नही जाता”  –के भाषा –दोष पर फौरन आपति करने वाले तुफैल ही थे –भले ही इस पर प्रकरण मे कितना ही  विवाद क्यों न किया गया हो लेकिन इस संवाद मे जीत तुफैल साहब की ही हुई।

 

इसी प्रकार जब बशीर बद्र जैसे वरिष्ठ शाइर ने शेर कहा --

 

गुसलखाना की चिलमन मे पडे किमख़्वाब के पर्दे

नये नोटो की खरखर है पुरानी रेज़गारी मे

 

तो "गुसलखाना" नही सही लफ़्ज़ "गुस्लखाना" है ये कहने वाले पहले पहले शख़्स तुफैल ही थे। भले ही इस आपत्ति पर उनके बरसों के मरासिम शल हो गये –लेकिन भाषा और उसकी पवित्रता पर उन्होने राई रत्ती आँच नही आने दी। साहित्य और ग़ज़ल विधा अंतस की गहराइयों से इस व्यक्ति की कृतज्ञ है।

 

तुफैल चतुर्वेदी छह फुट के 52 बरस के नौजवान हैं, इनके कुर्ते मे सोने के बटन लगते हैं और इनका बयान सोलह सोने का होता है –शकर नहीं खाते लेकिन इसके मआनी ये नही कि उनके लहजे मे शकर नही है – वो बेहद आत्मीयता से किसी के साथ भी संवाद करते हैं –लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि इस व्यक्ति का लहजा करख़्त है और चाल ख़ुस्रवाना है। इसका कारण पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि ग़ज़ल फार्मेट और भाषा के विकास के शिखर पर रह कर वे इसकी नुमाइन्दगी करते हैं।

 

अपने उस्ताद मरहूम जनाब कृष्ण बिहारी "नूर" के घराने को उन्होने आबाद कर रखा है और इस घराने की चौथी –पांचवी पीढी के शाइर भी आज गज़ल के मंच पर अपना जल्वा बिखेर रहे हैं।

 

जहाँ तक साहित्य सेवा का प्रश्न है उन्होने पाकिस्तान के श्रीलाल शुक्ल जनाब मुश्ताक अहमद यूसुफी साहब के कार्यों का अनुवाद –"खोया पानी" –"मेरे मुँह मे ख़ाक" और "धनयात्रा" बेहद कम समय मे किया और ऐसे समय मे किया जब वो अनेक पारिवारिक उलझनो मे घिरे थे।

 

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तुफैल चतुर्वेदी अपने इस्लामिक कट्टरपंथ के विरोध के कारण एण्टी –हीरो की छवि रखते हैं। "जिहाद" शब्द और कुरआन पाक की आयतों की मनमानी व्याख्या करने वाले इस नाम से खासे आतंकित रहते हैं और उनके बयान को अपने धर्म मे हस्तक्षेप की श्रेणी मे रखते हैं –लेकिन सच यह है कि उनकी निर्विवाद मेधा अकाट्य तर्क शक्ति के सामने सभी बौने साबित होते हैं।

 

शाइर तुफैल के इब्तिदाई दौर से बाबस्ता होने के लिये आपको उनका आज से 22 बरस पुराना संकलन" सारे वरक तुम्हारे" हासिल करना होगा जो किसी भी अच्छे बुक स्टाल पर आज भी आपको आसानी से मिल जायेगा। तब के नौजवान और युवा शाइर की भाषा इतनी सर्वग्राही और साफ सुथरी थी कि तम्हीद लिखते समय विख्यात तनकीदकार गोपीचन्द नारंग भावुक हो गये और उनकी तम्हीद का मर्कज़ इनकी भाषा ही रही। आप भी इन साफ सुथरे , चमकदार और दिल को छू लेने वाले नर्म नाज़ुक अशआर का ज़ायका लीजिये --

 

मेरे पैरों  मे चुभ जायेंगे लेकिन

इस रस्ते के काँटे कम हो जायेंगे

 

जिगर के टुकडे मेरे आँसुओं मे आने लगे

बहाव तेज़ था पुश्ता नदी ने काट दिया

  

हम तो समझे थे कि अब अश्कों की किस्तें चुक गयीं

रात इक तस्वीर ने फिर से तकाज़ा कर दिया

 

ज़रूरत पेश आती दुश्मनी की

तआल्लुक इस कदर गहरा नही था

 

अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं

इस हवा में हमीं दस्तार संभाले हुए हैं

 

कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था

हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं

 

तमाम शहर को फूलों से ढँक दिया मैंने

मगर बहार को उसने बहार माना क्या

 

छोड़ देता है दिन किसी सूरत

शाम सीने पे बैठ जाती है

 

दिन नहीं आता मेरी दुनिया में

रात जाती है रात आती है

 

दुनिया तिरे अहसास में नर्मी भी चुभन भी

रस्ते में मिले फूल भी घमसान का रन भी

 

अच्छा है कि कुछ देर मिरी नींद न टूटे

है ख़ाब के आग़ोश में बिस्तर भी बदन भी

 

अदब मे तुफैल साहब की जो हैसियत है उसको एक वाक्य मे यूँ कहा जा सकता है कि  –इस शख़्सीयत को अदब के बेशतर दायरों मे सराहा गया है जो दायरे इनसे तटस्थ हैं वहाँ इनको महसूस किया गया है और जो दायरे हमलावर हैं वहाँ इन्हे बर्दाशत किया गया है।यानी कि अदीबों के प्रतिक्रिया उनकी निजी भावना के अनुसार है लेकिन ऐसा कभी नही हुआ कि कोई इस व्यक्ति के स्पर्श के बाद खुद को प्रतिक्रियाविहीन रख पाया हो। कुल मिला कर तुफैल "जाकी रही भावना जैसी ....." के मानदण्ड पर खरे उतरते हैं।

 

तुफैल साहब मे अना अधिक है या पिन्दार इस पर बहस दीगर है क्योंकि हमारे लिये वो सबसे आदरणीय नामो मे से एक है –लेकिन यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनमे धैर्य स्नेह क्षमता और समर्पण जैसे कमयाब मानवीय गुण औरो से बहुत अधिक हैं और यही कारण है कि अपने विरोधियों की तमाम साजिशों के बावज़ूद ये नाम आज साहित्य के सबसे सशक्त नामो मे से एक है।