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ब्रज गजल - पवन कुमार

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पवन कुमार 

नहीं इक, दसन बार पैदा भयौ है। 
खुदइ में खरीदार पैदा भयौ है॥

नयौ जो यै किरदार पैदा भयौ है। 
गजब कौ अदाकार पैदा भयौ है॥

यै जो बेच मारै सो थोरौ समझियो। 
घरन में जो बाजार पैदा भयौ है॥ 

हमारी तरफ ध्यान तक है न या कौ। 
यै कैसौ तरफदार पैदा भयौ है॥ 

हिजाबन सों निकसौ तौ बानक बनैं कछ। 
तकल्लुफ सों कब प्यार पैदा भयौ है॥

पवन कुमार
9412290079


ब्रज गजल

3 ग़ज़लें - पवन कुमार

 तुम्हें पाने की धुन इस दिलको अक्सर यूँ सताती है
बँधी मुट्ठी में जैसे कोई तितली फड़फड़ाती है

चहक उठता है दिन और शाम नगमे गुनगुनाती है
तुम्हारे पास आता हूँ तो हर शय मुसकुराती है

मुझे ये ज़िन्दगी अपनी तरफ़ कुछ यूँ बुलाती है
किसी मेले में क़ुलफ़ी जैसे बच्चों को लुभाती है

वही बेरङ्ग सी सुब्हें, वही बे-क़ैफ़ सी शामें
मुझे तू मुस्तक़िल ऐ ज़िन्दगी क्यूँ आजमाती है

क़बीलों की रवायत, बन्दिशें, तफ़रीक़ नस्लों की
मुहब्बत इन झमेलों में पड़े तो हार जाती है

किसी मुश्किल में वो ताक़त कहाँ जो रासता रोके
मैं जब घर से निकलता हूँ तो माँ टीका लगाती है

न जाने किस तरह का क़र्ज़ वाजिब था बुज़ुर्गों पर
हमारी नस्ल जिस की आज तक क़िस्तें चुकाती है

हवाला दे के त्यौहारों का, रस्मों का, रवाज़ों का
अभी तक गाँव की मिट्टी इशारों से बुलाती है
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222


जहां हमेशा समंदर ने मेहरबानी की
उसी ज़मीन पे किल्लत है आज पानी की

उदास रात की चौखट पे मुंतज़िर आँखें
हमारे नाम मुहब्बत ने ये निशानी की

तुम्हारे शहर में किस तरह जिंदगी गुज़रे
यहाँ कमी है तबस्सुम की ,शादमानी की

ये भूल जाऊं तुम्हें सोच भी नहीं सकता
तुम्हारे साथ जुड़ी है कड़ी कहानी की

उसे बताये बिना उम्र भर रहे उसके
किसी ने ऐसे मुहब्बत की पासबानी की
बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ

मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22


ज़रा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं
सलामत आईने रहते हैं चेहरे टूट जाते हैं

पनपते हैं यहाँ रिश्ते हिजाबों एहतियातों में
बहुत बेबाक होते हैं तो रिश्ते टूट जाते हैं

दिखाते हैं नहीं जो मुद्दतों तिश्नालबी अपनी
सुबू के सामने आकर वो प्यासे टूट जाते हैं

किसी कमजोर की मज़बूत से चाहत यही देगी
कि मौजें सिर्फ़ छूती हैं ,किनारे टूट जाते हैं

यही इक आखिरी सच है जो हर रिश्ते पे चस्पा है
जरूरत के समय अक्सर भरोसे टूट जाते हैं

गुज़ारिश अब बुज़ुर्गों से यही करना मुनासिब है
ज़ियादा हो जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 1222

:- पवन कुमार
9412290079

बँधी मुट्ठी में जैसे कोई तितली फड़फड़ाती है - पवन कुमार


शायर पवन कुमार



 शायर पवन कुमार का दमदार आग़ाज़ “वाबस्ता
समीक्षा - मयंक अवस्थी
प्रकाशन संस्थान, 4268-B/3, दरिया गंज
नई दिली -110002

ज़ियादा हों अगर उम्मीद बच्चे टूट जाते हैं - 'लफ़्ज़' का छत्तीसवाँ अंक

भारतीय गद्य साहित्य और खास कर व्यंग्य में अपने जीवन काल में ही अपना लोहा मनवा चुके, पद्म-भूषण तथा साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों को सुशोभित करते, 'राग दरबारी' जैसे कालजयी उपन्यास के शिल्पकार श्रीलाल शुक्ल जी को समर्पित है 'लफ़्ज़' का छत्तीसवाँ अंक। इस बार के अंक में ज़ारी किश्तों के अतिरिक्त श्रीलाल शुक्ल जी ही छाये हुये हैं, और क्यों न हों - बक़ौल सम्पादकीय - "साहित्य की सामान्य परम्परा के अनुसार, उत्पाती लेखन या उपद्रवी बयानों के कारण चर्चित हुये लेखक-लेखिकाओं से अधिक चर्चित तथा सम्मानित श्रीलालजी किंवदन्ती बन चुके थे।"

हर बार की तरह इस बार भी 'लफ़्ज़' में भरत भूषण पंत जी की नज़्मों के अलावा चार शायरों के कलाम पढ़ने को मिले। मेरे स्वभाव और रुचि के अनुसार मैंने जो छाँटा है, आप लोगों के साथ साझा करना चाहूँगा।