कुछ संस्मरण ऐसे होते हैं, जो
खुशियाँ दे जाते हैं, और कुछ याद आते ही दुख देते हैं। ऐसा
ही दुखद संस्मरण है यह।
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संस्मरण - गुरु की तलाश - प्राण शर्मा
जब मैं ग्यारह
- बारह साल का था तब मेरी रूचि स्कूल की पढ़ाई में कम और फ़िल्मी गीतों को इकठ्ठा करने
और गाने में अधिक थी। नगीना, लाहौर , प्यार की जीत, सबक़ , बाज़ार ,नास्तिक, अनारकली , पतंगा , समाधि ,
महल , दुलारी इत्यादि फिल्मों के गीत मुझे ज़बानी
याद थे। स्कूल से आने के बाद हर समय उन्हें रेडियो पर सुनना और गाना अच्छा लगता था। नई सड़क, दिल्ली में एक गली थी - जोगीवाड़ा। उस गली में एक हलवाई की दूकान पर सारा दिन
रेडिओ बजता था। घर से जब फुरसत मिलती तो मैं गीत सुनने के लिए भाग कर वहाँ पहुँच जाता
था। फिल्मी गीतों को गाते - गाते मैं तुकबंदी
करने लगा था और उनकी तर्ज़ों पर कुछ न कुछ लिखता रहता था। ` इक
दिल के टुकड़े हज़ार हुए , ` मैं ज़िंदगी में हरदम रोता ही रहा हूँ
` जैसे फ़िल्मी गीतों के मुखड़ों को मैंने अपने शब्दों में यूँ
ढाल लिया था --ऐ साजन , तेरा प्यार मिला जैसे मुझको जैसे मुझको संसार मिला , मैं ज़िंदगी में खुशियाँ भरता ही रहूँगा , भरता ही रहूँगा
, भरता ही रहूँगा , मैं ज़िंदगी को रोशन
करता ही रहूँगा। चूँकि किसीने मेरे मन में यह बात भर दी थी कि गीत-कविता लिखने वाले
भांड होते हैं और अच्छे घरानों में उन्हें बुरी नज़र से देखा जाता है इसलिए शुरू - शुरू
में मैं बाऊ जी और बी जी से लुक - छिप कर कविता करता था और उन्हें अपने बस्ते और संदूक
में संभाल कर रखता था। धीरे - धीरे ` कवि भांड होते हैं `
वाली भावना मेरे दिमाग से निकल गई। मैंने देखा कि बाऊ जी और बी जी तो
कविता प्रेमी हैं। बी जी को पंजाब के अनेक लोक गीत याद थे -
ढेरे ढेरे ढेरे
तेरे - मेरे
पयार दियाँ
गलाँ होण संतां
दे डेरे
सोहणी सूरत दे
पहली रात दे
डेरे
( गिध्दा )
छंद परागे आइये
- जाइए
छंद परागे आला
अकलां वाली साली
मेरी
सोहणां मेरा
साला
चाँद परागे आइये
- जाइए
छंद परागे केसर
सास तां मेरी
पारबती
सहुरा मेरा परमेशवर
( विवाह पर वर
द्वारा गाया जाने वाला छंद )
ये कुछ ऐसे लोक गीत हैं जिन्हें बी जी उत्सवों और विवाहों पर अपनी सहेलियों के साथ मिल कर गाती थीं। फिर भी
मेरे मन में गीत - कविता को लेकर उनका भय बना रहता था। मैं नहीं चाहता था कि उनके गुस्से का नज़ला मुझ पर
गिरे और शेरनी की तरह वे मुझ पर दहाड़ उठें - ` तेरे पढ़ने - लिखने के दिन हैं
या कविता करने के ? ` बाऊ जी सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा के प्रमुख
वक्ता थे। चूँकि वे मास में बीस दिन घर से बाहर रहते थे इसलिए उनका भय मेरे मन में
इतना नहीं था जितना बी जी का। ,
बढ़ती उम्र के साथ - साथ मेरी कविताओं में कुछ
- कुछ परिपक्वता आनी शुरू हो गई थी। सोलह - सत्रह का मैं हो गया था।
यौवन का नया
- नया जोश था। कइयों की तरह मुझ में भी यह गलतफहमी पैदा हो गई कि मुझ में भरपूर प्रतिभा है और कविता लेखन
में मैं कालिदास , तुलसीदास या सूरदास से कतई काम नहीं हूँ। चूँकि मैं अच्छा गा लेता था और रोज़ गा - गा कर कुछ न कुछ लिखता रहता
था इसलिए मैं भी महाकवि होने के सलोने सपने संजोने लगा था। मेरी हर रची काव्य - पंक्ति
मुझे बढ़िया दिखने लगी थी और मैं उसको अपनी अमूल्य निधि समझने लगा था। मेरे यार - दोस्त
मेरी कविताओं के ईर्ष्यालु निकले। मेरी सब की सब कविताओं को कूड़ा - कचरा कहते थे। वे
सुझाव देते थे - `कवि बनना छोड़ और पढ़ाई - वढ़ाई में ध्यान दे। ` मैं उनके
सुझाव को एक कान से सुनता था और दूसरे कान से निकाल देता था। भला कोई रात - दिन के
कड़े परिश्रम से अर्जित कमाई भी कूड़ेदान में फैंकता है ? चूँकि
मेरी हर रचना मेरी दृष्टि में बढ़िया होती थी इसलिए मुझे बड़ा क्लेश होता था जब कोई दोस्त
मेरी कविता को महज तुकबंदी कह कर नकारता था। शायद मैं सोलह साल कथा जब मैंने यह कविता
लिखी थी -
एक नदिया बह रही है
और तट से कह
रही है
तुम न होते तो
न जाने
रूप मेरा कैसा होता
ज़िंदगी मेरी कदाचित
उस मुसाफिर सी
ही होती
जो भटक जाता
है
अपने रास्ते
से
मैं तुम्हारी
ही ऋणी हूँ
तुमने मुझको
कर नियंत्रित
सीमा में बहना
सिखाया
तुम हो जैसे
शांत - संयम
वैसा ही मुझ
को बनाया
मैंने कविता दोस्तों को सुनायी। सोचा था कि इस बार ख़ूब दाद मिलेगी। सब के चेहरों पर खुशी
की लहर दौड़ जाएगी और उछल कर वे कह उठेंगे
- ` वाह क्या बात है ! कविता हो तो ऐसी हो !! तूने तो अच्छे - अच्छे कवियों की
छुट्टी कर दी है। भाई , मान गए तेरी प्रतिभा को। ` लेकिन मेरा सोचना गलत साबित हुआ। किसी ने मुझे घास तक नहीं डाली। एक ने तो जाते - जाते यह कह कर मेरा मन छलनी - छलनी
कर दिया था - ` कविता करना तेरे बस की बात नहीं है। बेहतर है
कि गुल्ली - डंडा खेल कर या गुड्डी उड़ाया कर। ` दूसरे दोस्त भी
उसका कटाक्ष सुन कर मुझ पर हंस पड़े थे। मेरे दोस्तों के उपेक्षा भरे व्यवहार के बावजूद
भी कविता के प्रति मेरा झुकाव बरक़रार रहा। ये दीगर बात है कि किछ देर के लिए मुझमें
कविता से विरक्ति पैदा हो गई थी। कहते हैं न - ` छुटती नहीं शराब
मुँह से लगी हुई। `
प्रभाकर में
प्रवेश पाने के बाद कविता करने की मेरी आसक्ति फिर से पैदा हो गई। काव्य संग्रह के
एक दोहे ने मुझ में उत्साह भर दिया। दोहा था -
गुरु गोबिंद
दोनों खड़े ,काके लागूँ पाँय
बलिहारी गुरु
आपणो सतगुरु दियो बताय
मेरे मन में यह बात कौंध गई कि कविता के लिए
गुरु की शिक्षा अत्यावश्यक है। कविता का व्याकरण उसी से जाना जा सकता है , कविता के गुण - दोष उसी
से ज्ञात हो सकते हैं। एक अन्य पुस्तक से मुझे सीख मिली कि कविता सीखने के लिए गुरु
का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक तो है ही , अध्ययन , परख और विचार -विमर्श भी अत्यावश्यक है। मैं गुरु की तलाश में जुट गया।
एक दिन कविवर देवराज दिनेश मेरे बाऊ जी से
मिलने के लिए हमारे घर में आये थे। मेरे सिवाय घर में कोई नहीं था। बाऊ जी से उनका
पुराना मेल था। भारत विभाजन के पूर्व लाहौर
में कवि - सम्मेलनों में हरिकृष्ण `प्रेम` , उदय शंकर भट्ट , शम्भू नाथ `शेष`
, देवराज ` दिनेश` इत्यादि
कवियों की सक्रिय भागीदारी रहती थी। प्रोफेसर वशिष्ठ शर्मा केनाम से विख्यात बाऊ जी
सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा से जुड़े हुए थे और पंजाब में हिन्दू धर्म के प्रचार - प्रसार
के साथ - साथ हिंदीका भी प्रचार - प्रसार करने वालों में एक थे। चूँकि वे कई कवि सम्मेलनों
के सयोजक थे इसलिए पंजाब के प्राय सभी हिंदी कवियों से उनकी जान - पहचान थी।
देवराज दिनेश दूर से बाऊ जी को मिलने के लिए आये
थे। शायद वे मालवीय नगर में रहते थे और हम लाजपत नगर में। वे कवि कम और पहलवान अधिक
दिखते थे। खूब भारी शरीर था उनका। वे दरवाज़े
के सहारे कुछ ऐसे खड़े थे कि मुझे लगा कि थके - थके हैं। मैं उनसे एक - दो बार पहले
भी थोड़ी - थोड़ी देर के लिए मिल चुका था। उनको अंदर आने के लिए मैंने कहा। कुर्सी पर
बैठते ही उन्होंने चैन की सांस ली। हिंदी के एक प्रतिष्ठित कवि देवराज दिनेश मेरे गुरु
बन जाएँ तो व्यारे - न्यारे हो जाएँ मेरे तो। इसी सोच से मेरे मन में खुशी के लड्डू फूटने लगे। उन्होंने
मुझे अपने पास वाली कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। मैं रोमांचित हो उठा। अंधे को दो आँखें
मिल गईं। बातचीत का सिलसिला शुर हुआ। वे बोले -
` किस क्लास में पढ़ते हो ? ‘
- जी , प्रभाकर कर रहा हूँ।
- आगे क्या करोगे
?
- जी , अभी कुछ सोचा नहीं है।
- तुम्हारा शौक़
क्या है ?
- जी , कविता गीत लिखता हूँ।
- तुम भी पागल
बनना चाहते हो ?
- क्या कवि पागल
होते हैं ?
- लोग तो यही
कहते हैं।
- अगर कवि पागल
होते हैं तो मुझे पागल बनना स्वीकार है।
वे हँस पड़े। हँसते - हँसते ही मुझ से कहने लगे - ` चलो , अब
तुम अपना कोई गीत सुनाओ। ` मैं उमंग में गा उठा -
घूँघट तो खोलो
मौन प्रिये
क्यों बार -
बार शरमाती हो
क्यों इतना तुम
इतराती हो
मैं तो दर्शन
का प्यासा हूँ
क्यों मुझ से
आँख चुराती हो
मैंने क्या है
अपराध किये
घूंघट तो खोलो
मौन प्रिये
मिलने की मधुऋतु
है आई
क्यों तजती हो
तुम पहुनाई
अब लाज कुँआरी
छोड़ो तुम
आतुर है मेरी
तरुणाई
कब से बैठा हूँ
आस लिए वे कवि हैं
घूँघट तो खोल
मौन प्रिये
गीत सुन कर देवराज दिनेश कड़े शब्दों में बोले - ` देखो , तुम्हारी उम्र अभी पढ़ने की है। कविता - गीत तो तुम पढ़ाई खत्म होने के बाद भी
लिख सकते हो। इनमें अपना समय बर्बाद मत करो। पढ़ाई की ओर ध्यान दो , ख़ूब मन लगा कर पढ़ो। हाँ , भविष्य में कोई गीत लिखो तो
इस बात का ध्यान रखना कि वह फूहड़ फ़िल्मी गीत जैसा नहीं हो। छंदों का ज्ञान होना चाहिए।
` जाते - जाते वे कई नश्तर मुझे चुभो गए। उनकी उपदेश भरी बातें
मुझे अप्रिय लगीं। उनका लहज़ा मेरा ह्रदय छलनी
- छलनी कर गया। सारी रात चारपाई पर मैं करवटें लेता रहा। सोचता रहा कि मेरा गीत उनको
फूहड़ फ़िल्मी गीत जैसा क्यों लगा ? मेरे गीत में लय कहाँ भंग होती
हैपढ़ाई के साथ साथ - साथ कविता या गीत की रचना क्यों नहीं की जा सकती है ? आशा की एक किरण जागी थी कि देवराज दिनेश से कविता करने में मार्ग दर्शन होगा
वह भी जाती रही।
कुछ दिनों के बाद मन हल्का हुआ। अचानक एक
दिन लाजपत नगर की मार्केट में एक चौबीस - पच्चीस साल के नौजवान मिले। आकर्षक व्यक्तित्व था उनका। लम्बे - लम्बे घुंघराले
केश थे उनके। रेशमी कुर्ता और पाजामा उनके चेहरे को चार चाँद लगा रहा था। मेरे पूछने
पर उन्होंने बताया कि वे कवि हैं और कई लड़के - लड़कियों को कविता करना सिखाते हैं। मैं उनसे बड़ा प्रभावित हुआ और कह उठा - ` मुझे भी कविता करनी सिखाइये।
` उन्होंने मुझे अपने
गले से लगा लिया। बोले - ` अवश्य सिखाऊँगा लेकिन ------- `
` लेकिन क्या ? `
` गुरु दक्षिणा देनी पड़ेगी
आपको सीखने से पहले। `
` गुरु दक्षिणा ?
क्या देना पड़ेगा मुझे ?
` केवल पचास रूपये। `
सुन कर मेरे पसीने छूट गए। पचास रूपये
मेरे लिए बड़ी रकम थी। रोज़ बी जी से मुझे एक रुपया ही मिलता था जेब खर्च के लिए। फिर
भी मैंने ` हाँ ` कह दी। पचास रूपये की गुरु दक्षिणा मुझे एक सप्ताह
में ही देनी थी। जैसे - तैसे मैंने रुपये जोड़े। कुछ रुपये मैंने दोस्तों से उधार लिए कुछ बी जी से झूठ बोल कर। मैंने रुपये जोड़े ही थे
कि उनकी पोल खुल गयी। रोज़ की तरह वह मार्केट में मिले। मिलते ही बोले - ` मैंने एक नयी कविता लिखी है। ` मैं सुनने के लिए बेताब
हो गया। वह सुनाने लगे -
पूरब में जागा
है सवेरा
दूर हुआ दुनिया
का अँधेरा
लेकिन घर तारीक
है मेरा
पश्चिम में जागी
हैं घटाएँ
फिरती हैं मदमस्त
हवाएँ
जाग उठो मयख़ाने
वालो
पीने और
-----------
वह ज्यों - ज्यों कविता सूना रहे थे मैं त्यों - त्यों हैरान हुए जा रहा था।
मैंने उनको बीच मे ही टोक दिया - ` ये कविता तो उर्दू के
शायर हफ़ीज़ जालंधरी की है। `
सुनते ही वह नौ - दो ग्यारह हो गए। उफ़
, यहाँ भी निराशा हाथ लगी।
कहते हैं कि सच्चा गुरु अच्छे भाग्य
से ही मिलता है। मेरा भाग्य अच्छा नहीं है , मुझे ऐसा लगा। फिर भी मैं साहस
बटोर कर गुरु की तलाश में जुटा रहा। मैं अपने संदूक से कविताओं की कॉपी निकाल कर ले
आया। बी जी ने कॉपी को कई बार चूमा और माथे से लगाया। मैं यह सब देख कर मन ही मन झूम
रहा था। वह एक साँस में ही कई कवितायें पढ़ गयीं। उनकी ममता बोली - ` मेरा लाडला कितना प्रतिभाशाली है ! एक दिन अवश्य बड़ कवि बनेगा। `
बी जी को कविताओं की कुछेक पँक्तियों
में दोष नज़र आये। जैसे -
नील गगन में तारे चमके
या
आँधी में दीपक जलता है
वह नम्रता से समझने लगीं –
` देख बेटे , छंद तो कभी भी ठीक किया जा सकता है किन्तु कविता में अस्वाभाविकता को दूर
करना कठिन हो जाता है। सारी पंक्ति को ही हटाना पड़ता है। सोच , क्या नील गगन में कभी
तारे चमकते हैं ? नीला गगन सूरज के प्रकाश से होता है , रात के अँधेरे से
नहीं। जब दीपक हवा में नहीं जल पाता तो आँधी में क्या जलेगा ? ` तनिक विराम के बाद वे बोलीं - `
मुझे एक बात याद आ रही है , तुझे सुनाती हूँ भारत
के बंटवारे के एक - दो साल पहले की बात है।
वज़ीराबाद ( पाकिस्तान ) में मेरी एक सहेली थी - रुकसाना। उन दिनों फिल्म रत्न
के सभी गीत लोकप्रिय थे। उनमें एक गीत था - मिल के बिछड़ गई अँखियाँ , हाय रामा मिल के बिछड़ गयी अँखियाँ। गीत को लिखा था डी
एन मधोक ने। लोग उनको महाकवि कहते थे। गीत
गाया था उस समय की मशहूर गाने वाली जौहरा बाई अम्बाले वाली ने। रुकसाना को गीत के मुखड़े
पर एतराज़ था कहने लगी - ` मुखड़े में हाय रामा ने गीत का सत्यानाश
कर दिया है। हाय रामा की जगह पर हाय अल्लाह होना चाहिए। ` मैंने
सोचा कि रुकसाना अनजान है। मुझे उसको समझाना पड़ा –
` देख रुकसाना , कवि ने राम के दुःख की तरह अँखियों के दुःख का वर्णन किया है। जिस तरह
सीता के वियोग का दुःख राम को सहना पड़ा था
उसी तरह प्रियतमा की अँखियों को साजन की अँखियों से मिल के बिछुड़ जाने का दुःख झेलना
पड़ रहा है। `
मैं दो जमातें पढ़ी बी जी में एक नया रूप देख रहा था।
वह रूप जिसकी मुझको तलाश थी। एक दिन बी जी
को बाऊ जी से मालूम हुआ कि मैं कविता लिखता हूँ। यह बात देवराज दिनेश ने बाऊ जी को बतायी थी। बी जी ने मुझे
अपने पास बिठा कर बड़ी नम्रता से पूछा - ` क्या तू वाकई कविता लिखता है
?` मैंने डरते – डरते `हाँ ` में अपना सिर हिला दिया। मैंने देखा - उनका चेहरा मुस्कराहट से भर गया है।
मेरे ह्रदय में संतोष जाग उठा। मैंने व्यर्थ
ही कविता को लेकर अपने ह्रदय में भय पाल रखा था। बी जी के बोल मेरे कानों में गूँज
उठे - ` मेरे लाडले , कोई भाग्यशाली ही कविता
रचता है।रचता है। ` काश , मैंने
कविता रचने की बात शुरू में ही बी जी और बाऊ जी को बतायी होती। चूँकि रहस्य खोला था देवराज दिनेश ने इसलिए अब उनका कद मेरी
दृष्टि में बड़ा ऊँचा हो गया था। बी जी का कहना ज़ारी था - ` क्या
तू जानता है कि मैं कितनी खुश हुई थी जब तेरे बाऊ जी ने बताया कि तू कविता लिखता है।
तूने आज तक ये बात हमसे छिपाई क्यों ? तेरे बाऊ जी तुझ से बड़े
नाराज़ हैं। अच्छा दिखा तो सही अपनी कविताएँ , कहाँ छिपा रखी हैं तूने ? देख - पढ़ कर मैं
अपनी सहेलियों से मान से कहूँगी कि देखो मेरे लाडले की कविताएँ। `
बी जी की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं
था। उनके उत्साहवर्धक वचन सुनकर मुझे लगा कि जैसे मैंने कई नए कीर्तिमान स्थापित कर
लिए हैं।
एक युग का अंत
| मशहूर पुष्टि मार्गीय चित्रकार व पहलवान श्री बंशीधर चतुर्वेदी |
ईसवी सन १९७२, सारा देश आज़ादी की पच्चीसवीं सालगिरह मना रहा था। अलग अलग जगहों पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा था। इसी दरम्यान मथुरा नगरपालिका द्वारा भी विक्टोरिया पार्क में विराट कुश्ती दंगल का आयोजन किया गया| छोटे-बड़े पहलवानों की कई रोचक कुश्तियाँ हुई थीं इस दंगल में| पर सबसे ज़्यादा चर्चित रही ये कुश्ती:-
नारायण सिंह उस दौर में मथुरा के थानेदार हुआ करते थे। उन के रिश्ते के जाट पहलवान और काकाजी के बीच कुश्ती होना तय हुआ। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि चींटी और हाथी का मुक़ाबला था। अखाड़े के चारों ओर जनसमूह उमड़ पड़ा था। भीड़ सम्हाले नहीं सँभल पा रही थी। व्यवस्था को नियंत्रण में लेने के लिए खुद थानेदार साहब को अखाड़े के चारों ओर राउंड लगाना पड़ा। इधर थानेदार साहब राउंड लगा रहे थे, उधर दोनों पहलवानों ने हाथ मिलाया - चट - पटाक - धड़ाम - चारों खाने चित्त..................................।
बस कुछ ऐसे ही अंदाज़ में काकाजी ने उस पहलवान को अखाड़े के बीचोंबीच चित कर दिया। खेल खत्म - दंग हो गए देखने वाले - ज़ोर ज़ोर से तालियाँ बजने लगीं। कब हाथ मिले, कब दांव चला और कब .................... कुछ पता चले उस के पहले तो कुश्ती खत्म।
थानेदार साहब तो भौंचक ही रह गए। तपाक से बोल पड़े, हमने तो देखा ही नहीं, कुश्ती कैसे हो गयी। पीछे से आ कर काकाजी के कंधे पर हाथ रख कर [पहलवान लोग किसी के द्वारा कंधे या पीठ पर हाथ रखने को बर्दाश्त नहीं करते] कुछ बोलने वाले थे कि उस से पहले ही काकाजी ने अपने आप को उसी मुद्रा में पलटाया और इसी क्रम में थानेदार साहब के मुंह पर .......................... ।
बस फिर क्या था, जैसे कि सारे माहौल को साँप सूंघ गया था। एकदम पिनड्रोप साइलेंस। तभी मियां पाड़े के मशहूर पहलवान 'लाला पहलवान' अखाड़े पर आ कर थानेदार साहब से हाथ जोड़ कर बोले - 'हुजूर कुश्ती तो हो गयी। ये अखाड़ा है, और हम पहलवान इसे बेहतर समझते हैं।' थानेदार साहब ने न केवल स्थिति को स्वीकार किया बल्कि बाद में काकाजी को कोतवाली बुला कर उनका यथोचित सम्मान भी किया। उन के बटुए में जितने भी नोट और सिक्के थे, सारे के सारे काकाजी पर न्यौछावर कर दिये। [उस जमाने में सिक्के भी भरे रहते थे बटुओं में। चवन्नी में बहुत कुछ हो जाया करता था उन दिनों]
ऐसे थे हमारे काकाजी श्री बंशीधर चतुर्वेदी। १९३६ में जन्म हुआ और ११ अगस्त २०११ को हरिशरण को प्राप्त हुए। १० अगस्त से मथुरा में था, उस दरम्यान विभिन्न लोगों से उन के कई सारे संस्मरण सुनने को मिले। उन में से कुछ हमारी आने वाली पीढ़ियों के सन्दर्भ हेतु यहाँ लिख रहा हूँ।
- आगरा, अलीगढ़, हाथरस, गोवर्धन, गोकुल, वृदावन के अलावा बड़ोदा, अहमदाबाद, नाथद्वारा बल्कि मुंबई में भी कई दंगलों में कुश्तियाँ लड़े| खास बात ये कि आजीवन एक भी दंगल में कुश्ती पिटे नहीं| या तो सामने वाले को पछाड़ा या फिर बराबरी पर रहे।
- बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि मोहन पहलवान के भूतेश्वर [मथुरा] के नए अखाड़े पर मास्टर चंदगी राम के चेले ने खुला चेलेंज दे दिया था - और उन महाशय को चित होने के लिए एक मिनट से भी कम समय लगा था।
- आन्यौर [गोवर्धन, मथुरा] में गोस्वामी बालक सर्व श्री ब्रज रमण लाल जी और सर्व श्री नटवर गोपाल जी की मौजूदगी में बहु प्रतीक्षित दंगल में कमल पहलवान [अकखो कमल] को पछाड़ा। काकाजी ब्रज रमण लाल जी के और कमल पहलवान नटवर गोपाल जी के प्रिय पहलवान थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुश्ती के बाद लट्ठ युद्ध भी हो गया था।
- मथुरा के रेडियो स्टेशन के दंगल में उस दौर के जाने माने पहलवान उमर बद्दल को अखाड़े के चारों खानों की यात्रा करा कर बीच में ला कर चित किया।
- नाथद्वारा के दादू पहलवान को पछाड़ा। बुजुर्गों ने सुनाया कि 'अगड़ी टँगड़ी' के बल पर जीती ये कुश्ती।
- छावनी के दंगल में दिल्ली के मोती पहलवान के चेले पतराम को पछाड़ा।
- हर साल तीजन के दंगल में २-३ कुश्तियाँ लड़ते थे।
- सुनने में तो ये भी आया कि कई सारे स्वनाम धन्य पहलवान - जिस दंगल में काकाजी को देख लेते थे - वहाँ से कुछ न कुछ बहाना बना कर खिसक लेते थे।
- बाटी गाम के रामजीत पहलवान और महोली के गोपाल पहलवान काकाजी पर विशेष कृपा रखते थे। उन के अनुसार आगरा रीज़न में और खास कर ब्रज क्षेत्र में उन के जैसा पहलवान / चित्रकार नहीं था।
- रोज २ से ढाई हजार दंड-बैठक लगाते थे। जीवन के अंतिम दिन भी दैनिक ५-११ दंड बैठक लगाई थीं और छोटे बच्चों को पीठ पर बैठा कर कुछ क्षण खेले भी थे।
- अपने यौवन काल में रोजाना करीब ५०० ग्राम घी और ५ किलो भेंस का कच्चा दूध पीते थे।
- अखाड़े में कुश्ती की प्रेक्टिस करने को 'ज़ोर करना' कहा जाता है। दैनिक कसरत के बाद काकाजी अखाड़े में उतर कर पहले अपने ३-४ सीनियर्स के साथ और बाद में थकने तक ३ से ५ जूनियर्स के साथ ज़ोर करते थे।
- सुन कर ताज्जुब हुआ कि हरिशरण को प्राप्त होने के चंद हफ्ते पहले भी कुछ नए लड़कों को उन्होने कुश्ती के दांव पेच सिखाये थे।
- वडोदरा में अपने निवास के समीप एक आखाडा बनाया और उस पर इच्छुक व्यक्तियों को मल्ल विद्या सिखाते थे।
- काकाजी ने मथुरा नागटीले पर स्व॰ श्री बलदेव जी के मार्गदर्शन में पहलवानी का शुभारम्भ किया। बाद में सर्व श्री ब्रज रमण लाल जी ने उन्हें प्रायोजित किया और स्व. श्री नेताजी [तिहैया] ने उन के पहलवानी केरियर में चार चाँद लगाए।
पूज्य काकाजी सिर्फ पहलवान ही नहीं थे। वे एक उत्कृष्ट कोटि के पुष्टि मार्गीय चित्रकार भी थे। शायद ही कोई पुष्टि मार्गीय हवेली / गोस्वामी परिवार होगा जिन्होने काकाजी की सेवाएँ न ली हों। वेटिंग लिस्ट बनी रहती थी हमेशा। सिर्फ एक संदर्भ से ही आप समझ सकते हैं। ७६ साल की उम्र में ५ अगस्त २०११ को अपने द्वारा बनाई हुई पिछवायी [सीनरी] डिलीवर की, घर पर दूसरे काम प्रोसेस में थे ही उस के अलावा और भी आगे के काम ले कर घर पर आए थे। किसे पता था कि वह उन के जीवन की अंतिम कृति साबित होगी। हम उस अंतिम कृति के छाया चित्र को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। उन के तेरह दिनों के दरम्यान मैंने खुद उन के लड़के के मोबाइल पर कुछ लोगों के फोन अटेण्ड किए जो काकाजी की सेवाएँ लेना चाह रहे थे।
काकाजी को सन २००६ में कड़ी कालोल वाले गोस्वामी बालक सर्व श्री द्वारकेश जी के कर कमलों द्वारा, अखिल गुजरात पुष्टि मार्गीय वैष्णव परिषद द्वारा घोषित 'उत्कृष्ट चित्रकारी' सम्मान प्राप्त हुआ।
सन १९८३ में 'संदेश' अखबार ने आप के पहलवानी और चित्रकारी के क्षेत्र में हासिल उपलब्धियों पर एक वृहद आलेख भी प्रस्तुत किया था।
बहुत बार कुछ घटित हो रहा होता है, हम उस के अंतर्निहित कारणों से अनभिज्ञ रहते हैं - बाद में पता चलता है कि वैसा क्यूँ हुआ था| संभव है आदरणीय प्राण शर्मा जी द्वारा दिये गए मिसरे पर कहा गया तथा ५ अगस्त को ही इसी ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया ये शेर भी शायद इस क्रम की एक कड़ी हो :-
आने वाली पीढ़ी की खातिर मिल जुल कर|
आओ भरें सारा लिटरेचर कम्प्युटर में||
आओ भरें सारा लिटरेचर कम्प्युटर में||
पूज्य काकाजी हमेशा हमारी स्मृतियों में रहेंगे। उन के द्वारा स्थापित किए गए मानकों का एक अंश भी यदि हम हासिल कर सके तो यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन के प्रति|
जय श्री कृष्ण ............................
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