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राजस्थानी गजल – हुयो म्हैं बावळो ; था'रै ई जादू रौ असर लागै – राजेन्द्र स्वर्णकार

 

 
हुयो म्हैं बावळो ; था'रै ई जादू रौ असर लागै !
कुवां में भांग रळगी ज्यूं, नशै में स्सौ शहर लागै !
 
छपी छिब थारली लाधै, जिको ई काळजो शोधूं,
बसै किण-किण रै घट में तूं, भगत था'रा ज़बर लागै !

राजस्थानी गजल - राजेन्द्र स्वर्णकार


हवा में ज़ैर रळग्यो , सून सगळां गांव घर लागै
अठीनैं कीं कसर लागै , बठीनैं कीं कसर लागै

शकल सूं नीं पिछाणीजै इणां री घात मनड़ै री
किंयां अळगां री ठा' जद कै , न नैड़ां री ख़बर लागै

कठै ऐ पूंछ हिलकावै , कठै चरणां में लुट जावै
ऐ मुतळब सूं इंयां डोलै , कॅ ऐ डुलता चंवर लागै

किचर न्हाखै मिनख - ढांढा ;  चलावै कार इण तरियां
सड़क ज्यूं बाप री इणरै ; ऐ नेतां रा कुंवर लागै

निकळ' टीवी सूं घुसगी नेट में आ , आज री पीढ़ी
बिसरगी संस्कृती अर सभ्यता , जद श्राप वर लागै

अठै रै सूर सूं मिलतो जगत नैं चांनणो पैलां
अबै इण देश , चौतरफै धुंवो कळमष धंवर लागै

जगत सूं जूझसी राजिंद , कलम ! सागो निभा दीजे
कथां रळ' साच , आपांनैं किस्यो किण सूं ई डर लागै

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* राजस्थानी ग़ज़ल में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ *

ज़ैर रळग्यो = ज़हर घुल गया /, सून = सुनसान /, सगळां = समस्त् /, लागै = लगता है – लगती है - लगते हैं /, अठीनैं = इधर /, बठीनैं = उधर /, कीं = कुछ, नीं पिछाणीजै = नहीं पहचानी जाती है /, इणां री = इनकी /, घात मनड़ै री = मन की घात /, किंयां = कैसे /, अळगां री = दूरस्थ की /, ठा' = मा'लूम - जानकारी होना /, नैड़ां री = समीपस्थ की /, कठै = कहीं - कहां /, ऐ = ये /, डुलता चंवर = गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथसाहिब तथा मंदिर में ठाकुरजी के आगे डुलाया जाने वाला चंवर, किचर न्हाखै = कुचल देते हैं /, मिनख - ढांढा = मनुष्य - पशु /, जद = तब /, अठै रै सूर सूं = यहां के सूर्य से /, चांनणो = प्रकाश /, पैलां = पहले /, चौतरफै = चारों तरफ़ /, धुंवो कळमष धंवर = धुआं कल्मष धुंध /, सागो निभा दीजे = साथ निभा देना /, कथां रळ' साच = मिल कर सत्य - सृजन करें /, आपांनैं = हमको - हमें /, किस्यो किण सूं ई = कौनसा किसी से भी /


राजेन्द्र स्वर्णकार
9414682626


बहरे हजज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222


राजस्थानी गजल - है दसूं दिश अमूझो घणो श्हैर में - राजेन्द्र स्वर्णकार

है दसूं दिश अमूझो घणो श्हैर में
म्हैं  रैवूं बैवतो आपरी लै’र में
दसों दिशाओं में दमघोटू गुम्फन है इस शहर में
(लेकिन) मैं अपनी ही मौज में (इन सबसे अछूता) घूमता रहता हूं

भीड़ मांहीं मुळकता म्हनैं बै मिळ्या
ले लियो म्हैं अमी रौ मज़ो ज्हैर में
भीड़ में मुझे मुस्कुराती हुई वे मिल गईं
मैंने ज़हर में भी अमृत का आनंद पा लिया

कोई अणजाण बाथां में जद आयग्यो
भेद रैयो कठै आपणै-गैर में
जब कोई अपरिचित बाहों में समा गया तो
अपने-पराये का भेद कहां रहा

भाव कंवळा सवाया हुया प्रीत में
ज्यूं कै बिरखा रौ पाणी मिळ्यो न्हैर में
प्यार में कोमल भावों में श्रीवृद्धि हुई
मानो नहर में वर्षा का शुद्ध जल मिल गया

रीस रै मिस लड़ण’ बै घरै आयग्या
नीं इंयां धन कियो बै म्हनैं म्हैर में
गुस्से के बहाने झगड़ने वे घर आ गईं
मेहरबां हो'कर कभी उन्होंने ऐसे धन्य नहीं किया

आवो बैठो , करो बात मीठी कोई
कैवै राजिंद कांईं पड़्यो बैर में
आओ बैठो , कुछ मीठी बातें करें
राजेन्द्र कहता है कि बैर-विरोध में पड़ा क्या है 

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212

:- राजेन्द्र स्वर्णकार