राजस्थानी गजल – हुयो म्हैं बावळो ; था'रै ई जादू रौ असर लागै – राजेन्द्र स्वर्णकार

 

 
हुयो म्हैं बावळो ; था'रै ई जादू रौ असर लागै !
कुवां में भांग रळगी ज्यूं, नशै में स्सौ शहर लागै !
 
छपी छिब थारली लाधै, जिको ई काळजो शोधूं,
बसै किण-किण रै घट में तूं, भगत था'रा ज़बर लागै !
 
लड़ालूमीजियोड़ो तन, कळ्यां-फूलां-रसालां सूं,
भरमिया रंग-सौरम सूं, केई तितल्यां-भ्रमर लागै !
 
मुळकती चांदणी ! काची कळी ! ए जोत दिवलै री !
कदै तूं राधका-रुकमण, कदै सीता-गवर लागै !
 
सुरग-धरती-पताळां में, न थारै जोड़ रूपाळी,
थनैं लागै उमर म्हारी, किणी री नीं निजर लागै !
 
नीं था'रै रूप जोबन रै समुंदर सूं बुझै तिषणा,
समुंदर बूक सूं पील्यूं, तिरसड़ी इण कदर लागै !
 
जपूं ‘राजिंद’ आठूं पौर था'रै नाम री माळा,
कठै म्हैं जोग नीं ले ल्यूं, जगत आळां नैं डर लागै !
 
बावळो   बावला/मतिभ्रमित
भांग रळगी   भांग, बूटी मिला दी गई
जिको ई  जो भी, जिस किसी का भी
काळजो शोधूं   हृदय टटोलूं, दिल में झांकूं
लड़ालूमीजियोड़ो  लड़ालूम होना, लकदक होना, यौवन से भरपूर
मुळकती चांदणी  मुस्कुराती हुई चांदनी
काची कळी  कच्ची कली, नवयौवना

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