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SP2/3/6 शेखर चतुर्वेदी और ऋता शेखर मधु जी के छन्द

नमस्कार

हर साल, गर्मी की तरह सर्दी भी बढ़ती जा रही है। इस सर्दी का असर हमारे आयोजन पर भी पड़ा है। उत्तर के अधिकतर साथी इस ठिठुरती ठण्ड में चाह कर भी की बोर्ड पर उँगलियाँ नहीं चला पा रहे। ख़ैर, हम आयोजन को आगे बढ़ाते हुये आज की पोस्ट में शेखर चतुर्वेदी और ऋता शेखर मधु जी के छंद पढ़ते हैं। पहले शेखर चतुर्वेदी जी के छन्द  :-

हम को वैसे तो सनम, लगते हैं सब नेक
मगर ढूँढने जायँ तो, मिलता सौ में एक
मिलता सौ में एक, नहीं टिकता है वो भी
चल देता मुँह फेर स्वार्थ पूरा होते ही
कह ‘शेखर’ कविराय भला ये कैसा जीवन
हृदय हुये संकीर्ण खो गया है अपनापन

तुम से मैं क्यूँ बोल दूँ, अपने दिल का हाल
हो सकता है ज़िन्दगी, भूले अपनी चाल
भूले अपनी चाल और इक रिश्ता टूटे
क्यूँ ऐसा बोलूँ जो कोई अपना रूठे
कह शेखर कविराय बड़े नाज़ुक हैं रिश्ते
अब इन की रक्षा करनी है हँसते-हँसते

मैं ही मैं दिखता जिसे और दिखे ना कोय
देर सवेरे ही भले निपट अकेला होय
निपट अकेला होय हुआ ज्यों वीर दशानन
कुछ भी रहा न शेष एक इस मैं के कारन
कह शेखर कविराय बुरा है दम्भ सदा ही
सब के हित की सोच भला होगा तेरा भी


मैं हर बार कहता हूँ, इस बार भी कहूँगा कि आज के दौर में जब नई पीढ़ी चुटकुलों को ही कविता समझ बैठी है तो ऐसे में शेखर जैसे नौजवानों को अपने पूर्वजों की राह पर चलता हुआ देखना बहुत हिम्मत देता है। शेखर को पढ़ने वालों ने नोट किया होगा कि वह लगातार ख़ुद से, अपनों से और समाज से संवाद बनाये हुये हैं। बिना लाग-लपेट के बात कहने में यक़ीन रखते हैं और इन के छंदों में अधिकांश वाक्य बहुत प्रभावशाली हो गये हैं। “क्यूँ ऐसा बोलूँ जो कोई अपना रूठे”, “कुछ भी रहा न शेष एक इस मैं के कारन “ या “सब के हित की सोच भला होगा तेरा भी” ऐसे वाक्य / मिसरे हैं जो पाठक / श्रोता को बरबस ही बाँध लेते हैं।

साथियो हर आयोजन में हम कुछ न कुछ विषय विशेष पर फोकस करते हैं। वर्तमान आयोजन में हम साथियों से परफेक्ट वाक्य बनाने के लिये निवेदन कर रहे हैं। पाद-संयोजन से सुसज्जित, लयबद्ध, सहज, सरस, सार्थक और एक सम्पूर्ण वाक्य एक्स्ट्रा एक्स्प्लेनेशन की सारी संभावनाओं को समाप्त कर देता है। ऐसा वाक्य  पाठक / श्रोता तक अपनी बात एक झटके में पहुँचा देने में सक्षम होता है।

इस पोस्ट में आगे बढ़ते हुये हम पढ़ेंगे ऋता दीदी के छन्द :-

मैं मैं मैं करते रहे, रखकर अहमी क्षोभ
स्वार्थ सिद्धि की कामना , भरती मन में लोभ
भरती मन में लोभ, शोध कर लीजे मन का
मिले ज्ञान सा रत्न, मान कर लें इस धन का
करम बने जब भाव, धरम बन जाता है मैं
जग की माया जान, परम बन जाता है मैं

तुम ही मेरे राम हो, तुम ही हो घनश्याम
ओ मेरे अंतःकरण, तुम ही तीरथ धाम
तुम ही तीरथ धाम, भक्ति की राह दिखाते
बुझे अगर मन-ज्योत, हृदय में दीप जलाते
थक जाते जब पाँव, समीर बहाते हो तुम
पथ जाऊँ गर भूल, राह दिखलाते हो तुम

हम की महती भावना, मानव की पहचान
हम ही विमल वितान है, तज दें यदि अभिमान
तज दें यदि अभिमान, बने यह पर उपकारी
दीन दुखी सब लोग सहज होवें बलिहारी
कड़ुवाहट को त्याग, मृदुल आलोकित है हम
अपनाकर बन्धुत्व, वृहद परिभाषित है हम

मेरे नज़दीक ‘तुम’ वाले छन्द में ऋता जी ने ‘राम’, ‘घनश्याम’, ‘तीरथधाम’ और ‘भक्ति’ को ‘मर्यादा’, ‘लीला’, ‘वानप्रस्थ’ और ‘सस्नेह-समर्पण’ के प्रतीक में लिया हुआ लगता है। मेरी ही तरह ऋता दीदी भी अपनी रचनाओं में हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करतीं। उन का आग्रह रहता है कि हमें कमियाँ बतला दीजिये, सुधार हम ख़ुद करेंगे। दरअसल यही सही तरीक़ा है छन्द या ग़ज़ल सीखने का। शिल्प और कमियों की जानकारी हो जाये बस। बात कहना आ जाये, इतना ही ज़रूरी है और यह तभी हो सकता है जब हम उधार की कविता से परहेज़ करेंगे। इसे मैराथन दौड़ कहें या कुछ और पर इस मञ्च के कई साथी इसी तरह मश्क़ कर रहे हैं। ऋता जी के छंदों में तीनों शब्द अपने शास्वत अभिप्राय को ले कर हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं। ‘हम’ को ‘विमल-वितान’ कहने की बात हो या ‘बंधुत्व से वृहद’ की कल्पना, ऐसे विचार इन छंदों को भीड़ में अलग खड़ा कर दे रहे हैं।

साथियो आप आनन्द लीजियेगा इन छंदों का, नवाज़ियेगा अपनी टिप्पणियों से और हमें आज्ञा दीजिये अगली पोस्ट की तैयारी के लिये।


नमस्कार.....  

SP2/2/9 चंदा चंचल चाँदनी, तारे गाएँ गीत - ऋता शेखर मधु

नमस्कार

हाइकु के बारे में तो जानते थे पर हाइगा के बारे में जिन्हों ने बताया उन का नाम है ऋता शेखर मधु। आज ऋता दीदी का हेप्पी-हेप्पी वाला डे है, जी हाँ आज [3 जुलाई] यह बच्ची एक साल और बड़ी हो गयी :) आइये पढ़ते हैं ऋता दीदी के दोहे :-

सदगुणियों के संग से, मनुआ बने मयंक
ज्यों नीरज का संग पा, शोभित होते पंक

चंदा चंचल चाँदनी, तारे गाएँ गीत
पावस की हर बूँद पर, नर्तन करती प्रीत

शुभ्र नील आकाश में, नीरद के दो रंग
श्वेत करें अठखेलियाँ, श्याम भिगावे अंग

हिल जाना भू-खंड का, नहीं महज संजोग
पर्वत भी कितना सहे, कटन-छँटन का रोग

नीलम पन्ना लाजव्रत, लाते बारम्बार
बिना यत्न सजता नहीं, सपनों का संसार

महँगाई के राज में, बढ़े इस तरह दाम
लँगड़ा हो या मालदा, रहे नहीं अब आम

ऋता दीदी आप को जन्म दिन की बहुत-बहुत शुभ-कामनाएँ। ऋता दी के साथ जो लोग साहित्यिक प्रयासों में संलग्न हैं, तसदीक़ करेंगे कि ऋता जी काम को जुनून के साथ पूरा करती हैं और इन्हें चुनौतीपूर्ण कार्य करना अच्छा लगता है। देखते ही देखते आप ने छन्दों पर जिस तरह प्रगति की है, आश्चर्यचकित करती है। ऋता जी को जन्म दिन की शुभ-कामनाएँ देने के साथ ही साथ उन के दोहों पर भी ज़रूर बतियाएँ। जल्द हाज़िर होता हूँ अगली पोस्ट के साथ। चलते-चलते ऋता जी द्वारा कल्पना रामानी जी और अरुण निगम जी के दोहों पर बनाया गया छन्द-चित्र:- 



इस आयोजन की घोषणा सम्बन्धित पोस्ट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
आप के दोहे navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें  

SP/2/1/11 धिया जँवाई ले गये, वह उन की सौगात - ऋता शेखर मधु

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

औरतें अपनी उम्र नहीं बतातीं पर आ. ऋता जी ने इतना तो बता ही दिया है कि मैं उनसे थोड़ा सा छोटा हूँ यानि वे मेरी 'दीदी सा' हैं - बस इतना काफ़ी है यार:)!

अंतर्जालीय संसार में एक दूसरे से कभी न मिले हम सभी लोग एक-दूसरे के कितने क़रीब आ जाते हैं, फिर दूर भी हो जाते हैं और फिर से कुम्भ के मेले में खोये भाई-बहनों की तरह से मिल भी जाते हैं  - है न मज़े की बात - तो ये मान लिया जाये कि वर्च्युअल संसार मुकम्मल होने लगा है !!!!!!!!!!!!!

संभवत: हरिगीतिका छंद वाले समस्या-पूर्ति आयोजन के दौरान ऋता जी से कम्यूनिकेशन शुरू हुआ था। तब से इन का छंदों के प्रति लगाव देख कर मैं हतप्रभ हूँ। सदैव कुछ करने को तत्पर और हाँ एक बात और कह दूँ कि इन्हें लगता है कि ये वक्रोक्ति वाला दोहा नहीं कह सकतीं - पर इन के ईमेल वार्तालाप पर ग़ौर करूँ तो ये वक्रोक्ति का श्रेष्ठ दोहा लिख सकती हैं। इन के साथ काम करना सुखद अनुभव रहा है, अब तक। ये अपनी तरफ़ से सभी सम्भव प्रयास करती हैं और बेहतर परिणामों के लिये समर्पित भी रहती हैं। हेट्स ऑफ टू हर। आइये अब पढ़ते हैं वर्तमान आयोजन की ग्यारहवीं यानि समापन पोस्ट में मंच की 40 वीं पार्टिसिपेंट यानि ऋता शेखर मधु [दीदी] के दोहे

ऋता शेखर मधु

ठेस-टीस 
धिया, जँवाई ले गये, वह, उन की सौगात
बेटे, बहुओं के हुये, चुप देखें पित-मात