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पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - श्री रूप चंद्र शास्त्री 'मयंक' जी [१०] और पिताजी का आशीर्वाद [११]





अंतरजाल पर आज कौन नहीं जानता आदरणीय श्री रूप चंद्र शास्त्री 'मयंक' जी को| चर्चा मंच, उच्चारण, शब्दों का दंगल, बच्चों की दुनिया जैसे कई सारे ब्लॉग्स के अलावा उन का ब्लॉग अग्रिगेटर ब्लाग मंच भी काफ़ी लोक प्रिय है| शुभेच्छा स्वरूप भेजी गयी आपकी चौपाइयों का रसास्वादन करते हैं हम:-

भुवन भास्कर बहुत दुलारा।
मुख मंडल है प्यारा-प्यारा।।
सुबह-सुबह जब जगते हो तुम|
कितने अच्छे लगते हो तुम|१|

श्याम-सलोनी निर्मल काया।
बहुत निराली प्रभु की माया।।
जब भी दर्श तुम्हारा पाते।
कली सुमन बनकर मुस्काते|२|

कोकिल इसी लिए है गाता।
स्वर भरकर आवाज लगाता।।
जल्दी नीलगगन पर आओ।
जग को मोहक छवि दिखलाओ|३|


पूज्य पिताजी श्री छोटू भाई चतुर्वेदी जी इस आयोजन के बारे में जान कर बहुत ही प्रसन्न हुए| आशीर्वाद स्वरूप उन्होने भी चार चौपाइयाँ भेजी हैं:-


हर युग के इतिहास ने कहा|
भारत का ध्वज उच्च ही रहा|

सोने की चिड़िया कहलाया|

सदा लुटेरों के मन भाया|१|


पर, सपूत भारत के सच्चे|

माता शाकुन्तल के बच्चे|

कभी शिवा, राणा, सावरकर|

साथ लिए नेताजी लश्कर|२|


बिस्मिल अब्दुल नैरोजी सँग|

वीर भगत, आज़ाद रँगे रँग|

खूब लडी थी लक्ष्मी बाई|

अँग्रेज़ों ने मुँह की खाई|३|


सदा सदा ही चमके हो तुम|

कितने अच्छे लगते हो तुम|

रस बन कर भव-सर में बहना|

आपस में हिल मिल कर रहना|४|

पूज्य पिताजी की इन चौपाइयों के साथ समापन करते हैं पहली समस्या पूर्ति का|

जल्द ही बतियाना शुरू करेंगे दूसरी समस्या पूर्ति के बारे में|

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेखर चतुर्वेदी जी [८] और मृत्युंजय जी [९]

समस्त सम्माननीय साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

पहली समस्या पूर्ति 'चौपाई' के अगले पड़ाव में इस बार दो रचनाधर्मियों को पढ़ते हैं|

श्री शेखर चतुर्वेदी जी:-

साहित्य वारिधि स्व. डॉ शंकरलाल चतुर्वेदी "सुधाकर" जी के पौत्र, भाई शेखर जी युवा कवि हैं| वर्तमान में अहमदाबाद में कार्य रत हैं| संस्कारों से सुसज्जित उनकी रचना पढ़ते हैं पहले:-

मुझको जग में लाने वाले |
दुनिया अजब दिखने वाले |
उँगली थाम चलाने वाले |
अच्छा बुरा बताने वाले |१|

मेरी दुनिया है तुमसे ही |
प्यारी बगिया हैं तुमसे ही |
इस मूरत को गढ़ा है तुमने|
अनुग्रह किया बड़ा है तुमने|२|

मुझसे प्यार छुपाते हो तुम |
दिल में मुझे बसाते हो तुम |
सर पर कर जब रखते हो तुम|
कितने अच्छे लगते हो तुम|३|

भाई श्री मृत्युंजय जी:-

भाई मृत्युंजय जी ने ब्रज से जुड़ी चौपाइयाँ भेजी हैं| उन से संपर्क न हो पाने के कारण, उन के बारे में विवरण देना सम्‍भव नहीं हो पा रहा| आप लोग उन के ब्लॉग http://mrityubodh.blogspot.com/ पर उन से मिल सकते हैं| तो आइए पढ़ते हैं उनकी चौपाइयाँ|

श्याम वर्ण, माथे पर टोपी|
नाचत रुन-झुन रुन-झुन गोपी|
हरित वस्त्र आभूषण पूरा|
ज्यों लड्डू पर छिटका बूरा|१|

स्नेह मिलत छन-कती कड़ाही|
भाजा आस लार टपकाही|
नासा रसना मिटत पियासी|
रस भीगी ज्यों होत कपासी|२|

बेगुन कहें बेगि नहीं आवो|
मिलत नित्यही बाद बढावो|
घंटी बजे टड़क टुम टुम टम|
कितने अच्छे लागत हौ तुम|३|

अगली किश्त में २ प्रस्तुतियों के साथ इस पहली समस्या पूर्ति का समापन करेंगे और साथ ही घोषणा करेंगे अगली समस्या पूर्ति की| आप सभी के सहयोग के लिए बहुत बहुत आभार|

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - मयंक अवस्थी जी [६] और रवि कांत पाण्डेजी [७]

सम्माननीय साहित्य रसिको

पहली समस्या पूर्ति 'चौपाई' के अगले पड़ाव में इस बार दो रचनाधर्मियों को पढ़ते हैं|


भाई श्री मयंक अवस्थी जी:-

श्री मयंक अवस्थी जी रिजर्व बॅंक, नागपुर में कार्यरत हैं| शे'रो शायरी का बहुत ही जबरदस्त ज्ञान है आपको| और अब देखिए उन की अनुभवी लेखनी ने चौपाइयों के माध्यम से क्या जलवे बिखेरे हैं:-

निर्निमेष तुमको निहारती|
विरह –निशा तुमको पुकारती|
मेरी प्रणय –कथा है कोरी|
तुम चन्दा, मैं एक चकोरी|१|

खत भी तुमको भिजवाया पर|
शलभ, वर्तिका तक आया पर|
कब सुनते हो शून्य कथायें|
महाअशन में ये समिधायें|२|

तुम बादल मैं प्यासी धरती|
तुम बिन मैं सिँगार क्या करती|
बन जाते माथे पर कुमकुम|
कितने अच्छे लगते हो तुम|३|
शलभ=पतंगा, वर्तिका=शम्मा, महाअशन=यज्ञ की विकराल अग्नि



भाई श्री रविकान्त पाण्डे जी:-

भाई रवि कांत पाण्डे जी हम से पहली बार जुड़े हैं| उन के बारे में मुझे विशेष जानकारी नहीं है, परंतु उनकी लेखनी स्वयँ ही उनका परिचय दे रही है:-

मौसम के हाथों दुत्कारे|पतझड़ के कष्टों के मारे|सुमन हृदय के जब मुरझाये|
तुम वसंत बनकर प्रिय आये|१|


नूतन किसलय तुमसे पाकर|
जीर्ण-शीर्ण सब पात हटाकर|

मस्ती में होकर मतवाली|

झूम रही उपवन की डाली|२|


लोग कहें घर दूर तुम्हारा|

किंतु नहीं मैने स्वीकारा|

दिल में मेरे बसते हो तुम|

कितने अच्छे लगते हो तुम|३|


भाई श्री मयंक जी और भाई श्री रवि कांत जी को बहुत बहुत बधाई इतने सुंदर्र और स-रस चौपाइयों को पढ़ने का सु-अवसर प्रदान करने के लिए|

इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहले समस्या पूर्ति के बार में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:- समस्या पूर्ति: पहली समस्या पूर्ति - चौपाई

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - राणा प्रताप सिंह जी [5]

सम्माननीय साहित्य रसिको

आइए इस बार पढ़ते हैं आज के दौर के नौजवान रचनाधर्मी बन्धु राणा प्रताप सिंह जी को| इलाहाबाद में जन्मे राणा प्रताप जी वायु सेना में कार्य रत हैं| आप अपना एक ब्लॉग [http://www.rp-sara.blogspot.com] भी चलाते हैं| शे'रोशायरी के जबरदस्त शौकीन राणा प्रताप जी ने हिन्दुस्तानी छंद साहित्य सेवा के उद्देश्य से इस समस्या-पूर्ति में भाग लेते हुए अपनी प्रस्तुति भेजी है|

मुझसे कटे कटे रहते हो|
औरों संग अविरल बहते हो|
सबके नाज उठाते हो तुम|
पर मुझको तरसाते हो तुम|१|

जितना मुझको तरसाओगे|
उतना निकट मुझे पाओगे|
तुम में 'मैं', मुझमें 'तुम', जानो|
मुझसे 'तुम', तुमसे 'मैं', मानो|२|

मिट जायेगा भेद हमारा|
जैसे गंग जमुन जल धारा|
हो मेरी स्मृतियों में गुम|
कितने अच्छे लगते हो तुम|३|


देर से आने वाले साहित्य रसिकों को फिर से बताना चाहूँगा कि:-

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
हर चरण में १६ मात्रा

अधिक जानकरी इसी ब्लॉग पर उपलब्ध है|इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहले समस्या पूर्ति के बार में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:- समस्या पूर्ति: पहली समस्या पूर्ति - चौपाई

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेष धर तिवारी जी [4]

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेष धर तिवारी जी

सम्माननीय साहित्य रसिको

पहली और फिर पहली से दूसरी रचना आते आते काफ़ी वक्त लगा| अब साहित्य रसिकों को जैसे जैसे पता चल रहा है, वो अपनी अपनी रचनाएँ भेजने लगे हैं| इस शुभ कार्य में अपना अमूल्य योगदान देने के लिए आप सभी का पुन: पुन: आभार|

पहली समस्या पूर्ति 'चौपाई' की चौथी रचना हाजिर है आपके सामने| इस बार हम पढ़ते हैं एक ऐसे व्यक्ति को जो कि व्यवसाय से जुड़े होने के बावजूद साहित्य सेवा में लगे हुए हैं| इलाहाबाद की मिट्टी से जुड़े भाई श्री शेष धर तिवारी जी और मंचों से भी साहित्य की सेवा कर रहे हैं| आप अपना एक ब्लॉग [http://sheshdt.blogspot.com] भी चलाते हैं| प्रस्तुत रचना में आप के अनुभव की झलक स्पष्ट रूप से दृष्टि गोचर होती है|

एक दिवस आँगन में मेरे |
उतरे दो कलहंस सबेरे|
कितने सुन्दर कितने भोले |
सारे आंगन में वो डोले |१|

मैंने उनको खूब रिझाया |
दाना दुनका खूब खिलाया|
पर जब छूना चाहा मैंने |
फैलाए दोनों ने डैने |२|

उड़े गगन को छूना चाहें |
पायीं जैसे अपनी राहें|
अच्छी है यह प्रीत जगत की |
जैसे भगवन और भगत की |३|

दिल को मेरे तुम भाते हो |
जब भी मेरे घर आते हो|
दिल में मेरे रहते हो तुम |
कितने अच्छे लगते हो तुम|४|


सप्ताहांत में हम पढ़ेंगे एक नौजवान शायर की चौपाइयाँ|


देर से आने वाले साहित्य रसिकों को फिर से बताना चाहूँगा कि:-

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
हर चरण में १६ मात्रा

अधिक जानकरी इसी ब्लॉग पर उपलब्ध है|


सभी साहित्य रसिकों का पुन: ध्यनाकर्षण करना चाहूँगा कि मैं स्वयँ यहाँ एक विद्यार्थी हूँ, और इस ब्लॉग पर सभी स्थापित विद्वतजन का सहर्ष स्वागत है उनके अपने-अपने 'ज्ञान और अनुभवों' को हम विद्यार्थियों के बीच बाँटने हेतु| इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहले समस्या पूर्ति के बार में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:- समस्या पूर्ति: पहली समस्या पूर्ति - चौपाई

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन' जी [3]

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन' जी

सम्माननीय साहित्य रसिको

आइए आज पढ़ते हैं मित्र धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन' जी को| आप की 'सज्जन की मधुशाला' [http://sajjankimadhushala.blogspot.com] ने काफ़ी प्रभावित किया है| आपका कल्पना लोक {http://dkspoet.blogspot.com] भी काफ़ी रुचिकर है| आइए पढ़ते हैं कि समस्या पूर्ति की पंक्ति 'कितने अच्छे लगते हो तुम' को कितने प्रभावशाली और रोचक ढँग से पिरोया है आपने अपने कथ्य में|

नन्हें मुन्हें हाथों से जब ।
छूते हो मेरा तन मन तब॥
मुझको बेसुध करते हो तुम।
कितने अच्छे लगते हो तुम |१|

रोम रोम पुलकित करते हो।
जीवन में अमृत भरते हो॥
जब जब खुलकर हँसते हो तुम।
कितने अच्छे लगते हो तुम |२|

पकड़ उँगलियाँ धीरे धीरे।
जब जीवन यमुना के तीरे|
'बाल-कृष्ण' से चलते हो तुम।
कितने अच्छे लगते हो तुम।३|

देर से आने वाले साहित्य रसिकों को फिर से बताना चाहूँगा कि:-

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
हर चरण में १६ मात्रा

अधिक जानकरी इसी ब्लॉग पर उपलब्ध है|


सभी साहित्य रसिकों का पुन: ध्यनाकर्षण करना चाहूँगा कि मैं स्वयँ यहाँ एक विद्यार्थी हूँ, और इस ब्लॉग पर सभी स्थापित विद्वतजन का सहर्ष स्वागत है उनके अपने-अपने 'ज्ञान और अनुभवों' को हम विद्यार्थियों के बीच बाँटने हेतु| इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलील' जी [2]

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी

सम्माननीय साहित्य रसिको

आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी ने इस समस्या पूर्ति 'कितने अच्छे लगते हो तुम' को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए, अपनी रचना भेजी है| विस्मय की बात है कि आचार्य जी ने 'चूहे' जैसे विषय पर समस्या की पूर्ति की है, जो कि सहज प्रशंसनीय है| आप लोग भी इस अद्भुत कृति का आनंद लीजिएगा:-

कितने अच्छे लगते हो तुम |
बिना जगाये जगते हो तुम ||

नहीं किसी को ठगते हो तुम |

सदा प्रेम में पगते हो तुम ||

दाना-चुग्गा मंगते हो तुम |

चूँ-चूँ-चूँ-चूँ चुगते हो तुम ||

आलस कैसे तजते हो तुम?

क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?

चिड़िया माँ पा नचते हो तुम |

बिल्ली से डर बचते हो तुम ||

क्या माला भी जपते हो तुम?

शीत लगे तो कँपते हो तुम?

सुना न मैंने हंसते हो तुम |

चूजे भाई! रुचते हो तुम |



आचार्य जी स्वयं भी एक ब्लॉग चलाते हैं| उन के ब्लॉग का पता है:- http://divyanarmada.blogspot.com

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
हर चरण में १६ मात्रा

अधिक जानकरी इसी ब्लॉग पर उपलब्ध है|



सभी साहित्य रसिकों का पुन: ध्यनाकर्षण करना चाहूँगा कि मैं स्वयँ यहाँ एक विद्यार्थी हूँ, और इस ब्लॉग पर सभी स्थापित विद्वतजन का सहर्ष स्वागत है उनके अपने-अपने 'ज्ञान और अनुभवों' को हम विद्यार्थियों के बीच बाँटने हेतु| इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें|

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - श्री कंचन बनारसी जी [1]

मित्रो इस साहित्यिक प्रयास के पहले प्रतिभागी बनने का गौरव प्राप्त हुआ है भाई उमा शंकर चतुर्वेदी उर्फ कंचन बनारसी जी को| आप स्वयँ देखिएगा कितनी सहज-सरस-सुंदर-सुमधुर चौपाइयाँ प्रस्तुत की हैं आपने| भारतीय छंद शास्त्र विधा के क्षेत्र में एक नया प्रयास रूप आरम्भ हुए इस प्रायोजन में अपनी सहभागिता दर्ज करा कर आपने सहज वन्दनीय कार्य किया है| आपको बहुत बहुत आभार| आशा है अन्य साहित्य रसिक भी इस दिशा में अपना अमूल्य योगदान अवश्य प्रदान करेंगे|

खुद अपनेंपन से भगते हो ।
पता नहीं किसको ठगते हो ॥
रात - रात भर जब जगते हो ।
अंतर मन से तब भजते हो ॥
प्रीत पाग में पगते हो तुम ।
कितने अच्छे लगते हो तुम ॥
प्रस्तुतिकर्त्ता: श्री उमा शंकर चतुर्वेदी उर्फ कंचन बनारसी
आपका ब्लॉग:- http://kanchanbanarshi.blogspot.com/

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई

हम में से कई ने अपने बचपन की पाठ्य पुस्तकों में यह कविता पढ़ी होगी:

उठो लाल अब आँखें खोलो|
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो|
बीती रात, कमल दल फूले|
उन के ऊपर भँवरे झूले|

हम में से ज़्यादातर ने रामायण और हनुमान चालीसा भी ज़रूर पढ़ी है| आइए देखें कुछ पंक्तियाँ:-

मंगल भवन अमंगल हारी|
द्रवहु सू दसरथ अजर बिहारी||

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर|
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर||

ऊपर की पंक्तियों को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो आप पाएँगे ये चौपाई 'छंद' हैं|

चौपाई छंद

सबसे सरल छंद है ये| चार चरणों में बँटा होता है ये| प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ होती हैं| पहले-दूसरे चरणों के अंत में समान शब्द आते हैं, और तीसरे-चौथे चरणों के अंत में समान शब्द आते हैं| यदि कवि चारों के चारों चरणों में समान शब्द लेना चाहे, तो सुंदरता और भी बढ़ जाती है| चरणांत में तगण और जगण वर्जित|

उदाहरण देखिए:-

उठो लाल अब आँखें खोलो
१२ २१ ११ २२ २२ = १६ मात्राएँ

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर
११ ११२१ २१ ११ २११ = १६ मात्राएँ


देखा आपने कितना आसान है ये छंद| तो चलो इस मंच पर की सबसे पहली 'समस्या पूर्ति' शुरू करते हैं| यह समस्या पूर्ति लोगों में रुझान जागने तक जारी रहेगी| उस के बाद सदस्यों / रचनाकारों के उत्साह को देखते हुए दूसरी पॅक्ति की घोषणा की जाएगी|


पहली समस्या पूर्ति की पंक्ति है:-

"कितने अच्छे लगते हो तुम|"

आपको ऊपर दी गयी पंक्ति को ध्यान में रखते हुए कम से कम चार चरणों वाली ३ चौपाई लिख कर navincchaturvedi@gmailcom पर भेजनी हैं, जिन्हें समय समय पर यहाँ मंच पर प्रकाशित किया जाएगा| रचनाकारों के समझने हेतु एक प्रस्तुति यहाँ दी जा रही है?:-

सब के सब अपने लगते हैं| पर जब तब हम को ठगते हैं|
सबकी बातें मोहित करतीं| आँखों में आँसू भी भरतीं|१|

अपने अपने कारण सबके| कोई न रहना चाहे दब के|
विजय पताका लहराते हैं| अपना दम खम दिखलाते हैं|२|

इन सब में तुम अलग थलग हो| उच्च गगन के मुक्त विहग हो|
सचमुच सच्चे लगते हो तुम| कितने अच्छे लगते हो तुम|३|

'कितने अच्छे लगते हो तुम', ये हिस्सा प्रस्तुति के किसी भी चरण में लेने के लिए स्वतंत्र हैं सभी रचनाकार|

आप सभी अपनी अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें