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देशभक्ति की कविताएँ / मुक्तक

मेरा हिन्दोसताँ सब से अलग सब से निराला है।
ये ख़ुशबूओं का गहवर है बहारों का दुशाला है।
अँधेरो तुम मेरे हिन्दोसताँ का क्या बिगाड़ोगे।
मेरा हिन्दोसताँ तो ख़ुद उजालों का उजाला है॥

ये ऋषियों का तपोवन है फ़क़ीरों की विरासत है।
ये श्रद्धाओं का संगम है दुआओं की इबारत है।
भले ही हर तरफ़ नफ़रत का कारोबार है लेकिन। 
ये इक ऐसा क़बीला है जिसे सब से मुहब्बत है॥

बुजुर्गों से वसीयत में मिले संस्कार उगलती है।
समन्वय से सुशोभित सभ्यता का सार उगलती है।
ज़माने भर के सारे तोपखाने कुछ नहीं प्यारे।
हमारे पास ऐसी तोप है जो प्यार उगलती है॥

हमारा दिल दुखा कर जाने क्या मिलता है लोगों को।
हमें यों आज़मा कर जाने क्या मिलता है लोगों को।
ये ऐसा प्रश्न है जिस का कोई उत्तर नहीं मिलता।
तिरंगे को जला कर जाने क्या मिलता है लोगों को॥

हम आपस में लड़ेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी।
अगर झगड़े बढेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी।
अगर अब भी नहीं समझे तो फिर किस रोज़ समझेंगे।
सियासत में पड़ेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी॥

जो मंजिल तक पहुँचते हैं वे रस्ते कैसे देखेंगे।
जो घर को घर बनाते हैं वे रिश्ते कैसे देखेंगे।
अगर झूठी शहादत में फ़ना होती रही नस्लें।
तो फिर हम लोग पोती और पोते कैसे देखेंगे॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

स्वाधीनता दिवस गीत - तब आयी ये पन्द्रह अगस्त

 
जो सदियों से था क्षोभ ग्रस्त । 
अत्याचारों से दुखी, त्रस्त । 
वह आम आदमी हुआ व्यस्त । 
तब आयी यह पन्द्रह अगस्त ।। 

जब जुड़े जलद सम वरदहस्त । 
तारे अनिष्ट के हुये अस्त । 
चल पड़े साथ मिल सर परस्त । 
तब आयी यह पन्द्रह अगस्त ।। 

मतभेदों को कर के निरस्त । 
घातक मनसूबे किये ध्वस्त । 
जब हुआ क्रान्ति का पथ प्रशस्त । 
तब आयी यह पन्द्रह अगस्त ।। 

 सब चेहरे दिखने लगे मस्त । 
 परचम लहराने लगे हस्त । 
 जब जुड़े वीर बाँके समस्त । 
 तब आयी यह पन्द्रह अगस्त ।। 

घर घर से होने लगी गश्त । 
चुन चुन मारे फिरका परस्त । 
जब अंग्रेजों को दी शिकस्त । 
तब आयी यह पन्द्रह अगस्त ।। 

है प्रगतिशील हर एक दस्त । 
 है हिन्द विश्व से फिर वबस्त । 
 हैं नीति हमारी सुविश्वस्त । 
 बस याद रहे पन्द्रह अगस्त ।। 

 बस याद रहे पन्द्रह अगस्त ।। 
 बस याद रहे पन्द्रह अगस्त ।। 

नवीन सी. चतुर्वेदी