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ग़ज़लें - रामबाबू रस्तोगी

हम उनको प्यार करते हैं उन्हें अपना समझते हैं।
हमारा दर्द ये है वो हमें झूठा समझते हैं॥

सियासी गुफ़्तगू मत कीजिये तकलीफ़ होती है।
ज़ुबाँ चुप है मगर हम आपका लहजा समझते हैं॥

कहा कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने आगे बढ़ो अर्जुन।
ये सारे दुष्ट केवल युद्ध की भाषा समझते हैं॥

ये कैसा दौर है बेटे नसीहत भी नहीं सुनते।
इधर हम आज भी माँ- बाप का चेहरा समझते हैं॥

हम अपने ख़ून से जिस सरज़मीं को सींचते आये।
सियासतदाँ उसे चौपाल का हुक्का समझते है॥

 * 

समंदर के जिगर में आजकल सहरा निकलता है।
जिसे भी मोम कहता हूँ वही शीशा निकलता है॥

र'वादारी , मोहब्बत , दोस्ती , एहसान , कुर्बानी।
हमारे दौर में हर रंग क्यों कच्चा निकलता है॥

सियासत फूल में , पत्तों में ,काँटों में , हवाओं में।
जिसे सच्चा समझता हूँ , वही झूठा निकलता है॥

सियासत में कई अनहोनियाँ होती ही रहती हैं।
यहाँ अमरूद के पौधे से चिलगोज़ा निकलता है॥

इसी जम्हूरियत के ख़्वाब ने जी भर हमें लूटा।
मैं जो सिक्का उठाता हूँ वही खोटा निकलता है॥

बदलते मौसमों में हाल है ऐसा गुलाबों का।
जहाँ से इत्र मिलता था वहाँ सिरका निकलता है॥

* 

घर में बैठे रहें तो भीगें कब।
बारिशों से बचें तो भीगें कब॥

पत्थरों का मिज़ाज रख के हम।
यूँ ही ऐंठे रहें तो भीगें कब॥

आँसुओं का लिबास आँखों पर।
ये भी सूखी रहें तो भीगें कब॥

जिस्म कपडें का जान पत्तों की।
हम भी काग़ज़ बनें तो भीगें कब॥

उनके बालों से गिर रही बूँदें।
हम ये शबनम पियें तो भीगें कब॥

तेरे हाथों में हाथ साहिल पर।
अब न आगे बढ़ें तो भीगें कब॥

दूर तक बादलों का गीलापन।
और हम घर चलें तो भीगें कब॥


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बदली नज़र जो उसने तो मंज़र बदल गये।
क़ातिल वही हैं हाथ के खंज़र बदल गये॥

किसका करें यक़ीन करें किस पे एतबार।
दरिया की प्यास देख समंदर बदल गये॥

गाँधी निराश हो के यही देखते रहे।
आबो- हवा के साथ ही बंदर बदल गये॥

दुनिया को जीतने की हवस दिल में रह गयी।
होके कफ़न में क़ैद सिकन्दर बदल गये॥

अरसे के बाद लौटा हूँ मैं अपने गाँव में।
हैरान हूँ कि राह के पत्थर बदल गये॥

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जफ़ायें साथ चलती हैं ख़तायें साथ चलती हैं।
मैं मुजरिम हूँ मेरी सारी सज़ायें साथ चलती हैं॥

चरागों को तभी इस युद्ध का एहसास होता है।
खुले मैदान में जब भी हवायें साथ चलती हैं॥

हमारी ज़िंदगी इस दौर की है इक महाभारत।
यहाँ सच- झूठ की सारी कथायें साथ चलती हैं॥

यहाँ भगवान भी हर एक को ख़ुश रख नहीं सकते।
ये दुनिया है यहाँ आलोचनायें साथ चलती हैं॥

मुझे मायूसियाँ अक्सर डराती हैं मगर लोगो।
हर इक मुश्किल में मेरी आस्थायें साथ चलती हैं॥

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रामबाबू रस्तोगी 

दोहे - रामबाबू रस्तोगी

हंस रेत चुगने लगे, बिना नीर का ताल।
मछुआरे खाने लगे , काट- काट कर जाल॥

जिसकी जैसी साधना , उसके वैसे भाग।
तितली कड़वी नीम पर , बैठी पिये पराग॥

सपनों के बाज़ार में , आँसू का क्या मोल।
यह पत्थर दिल गाँव है , यहाँ ज़ख़्म मत खोल॥

हरसिंगार की चाह में , हम हो गये बबूल।
शापित हाथों में हुआ , मोती आकर धूल॥

अलग-अलग हर ख़्वाब का, अलग- अलग महसूल।
एक भाव बिकते नहीं सेमल और बबूल॥

राजपथों पर रौशनी , बाकी नगर उदास।
उम्र क़ैद है चाँद को , सूरज को वनवास॥

घर का कचरा हो गये , अब बूढ़े माँ- बाप।
बेटे इंचीटेप से उम्र रहे हैं नाप॥


सच आँखों में झाँक कर, करता है ऐलान - रामबाबू रस्तोगी

विज्ञापन के देश में, आँखों पर प्रतिबन्ध 
"गरमी से नुकसान" पर, सूरज लिखे निबन्ध 

हारेगा अभिमन्यु ही, लाख सीख ले दाँव 
क़दम-क़दम पर बस गये, चक्रव्यूह के गाँव 

अम्मा की साड़ी घिसे, बाबूजी के पाँव 
पेड़ पुराने हैं मगर, देते ठण्डी छाँव 

बहुएँ - बेटे - बेटियाँ, बहन और दामाद 
शब्द-कोश अम्मा हुई,  रखती याद 

जब से पण्डों को मिला, लहरों का अधिकार 
एक-एक मछली हुई, मरने को लाचार 

कौवों को शाबाशियाँ, गिद्धों को जागीर 
उल्लू ज़िन्दाबाद हैं, जंगल की तक़दीर 

मुकुट बिकें बाज़ार में, अलग-अलग हैं दाम 
रावण के लाखों टके, बिना मोल श्री राम 

शाख-शाख पर तान दीं, पहले तो बन्दूक 
फिर कोयल से यूँ कहा, "चल मृदुबैनी कूक"

अन्तराल के बाद जब, लौटे मन का मीत 
गर्मी लगे गुलाब सी, बेले जैसी शीत 

मन में चौमासा घिरे, भर-भर आएँ नैन 
दिन तोला-तोला कटे, माशा-माशा रैन 

बादल आये दे गये, आश्वासन के थाल 
सावन भी कंगाल था, भादौं भी कंगाल 

सच आँखों में झाँक कर, करता है ऐलान 
मैं भी ख़ुशबू की तरह, बेघर बिना मकान 
:- रामबाबू रस्तोगी