हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
च्यों करै गिल्ला-गुजर, जम आइ कें लै जात है
जे भलौ आयौ जमानों, नैन नीचै है रहे
प्हैर कें फाटे घुटन्ना, ना कोई सकुचात है
लिखूँ मनमीत कूँ पाती
करूँ का, लाज हू आती
करेजा चीरि लिख देती
पते बिनु, कौन घर जाती