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3 छप्पय छन्द - कुमार गौरव अजीतेन्दु

[1]
मीठे-मीठे बोल, सभी के मन को भाते,
कड़वी सच्ची बात, लोग सुनकर चिढ़ जाते।
अपनी गलती भूल, सभी पर दोष लगाना,
है दुनिया की रीत, दुष्ट को साधु बताना॥
अब जिसको अपना जानिए, चल देता मुँह फेर के।
धनवालों के होने लगे, नाटक सौ-सौ सेर के॥


[2]

आहत, खाकर बाण, मृत्यु शय्या पर लेटे,
पूछ रहा है देश, कहाँ हैं मेरे बेटे।
बचा रहे हैं प्राण, कहीं छुप के वारों से?
या वो नीच कपूत, मिल गये गद्दारों से॥
मुझको देते उपहार ये, मेरे निश्छल प्यार का।
क्या बढ़िया कर्ज चुका रहे, माटी के उपकार का॥

[3]
कितने-कितने ख्वाब, अभी से मन में पाले,
रहे गुलाटी मार, सेक्युलर टोपीवाले।
अपने मन से रोज, बदलते परिभाषाएँ
कल तक कहते चोर, आज खुद गले लगाएँ॥
लेकिन बेचारे क्या करें, आदत से लाचार हैं।
वो बरसाती मेढक सभी, मतलब के ही यार हैं॥




छप्पय छन्द

कुल छह चरण, पहले चार चरण [13+11] रोला के अन्तिम दो [15+13] उल्लाला के

:- कुमार गौरव अजीतेन्दु

जग जीता, जगजीत, ग़ज़ल सम्राट कहाये

Jagjit Singh

बूढ़े या कि ज़वान, सभी के मन को भाये|
गीत-ग़ज़ल के रंग, अलग हट कर दिखलाये||
सात समंदर पार, अमन के दीप जलाये|
जग जीता, जगजीत, ग़ज़ल सम्राट कहाये||
तुमने तो सहसा कहा था, मुझको अब तक याद है|
गीत-ग़ज़ल से ही जगत ये, शाद और आबाद है||

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छप्पय छंद

कुल छह चरण
पहले चार चरण रोला के - 11+13=24 मात्रा
अंत के दो चरण उल्लाला छंद के

उल्लाला छंद भी कई प्रकार के होते हैं
इस ऊपर वाले छंद में 15+13=28 मात्रा वाले उल्लाला छंद के दो चरण लिए गए हैं