संस्कृत गीत - भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते - डॉ.प्रीतिः पुजारा


(स्रग्विणी छन्दाधारित संस्कृत गीतिका)
 
कोमलानां लतानां  वृथा छेदनं
हे प्रभो यद्दिने रोत्स्यते यत्नतः  |
प्रेङ्खमाणा यदा  वायुसङ्गेन ताः
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  |||| 

ईप्सिताकाशमध्ये विना चिन्तया
डीयमाना यदा पक्षिणी द्रक्ष्यते |
छिन्नपक्षा न कारिष्यते मानिनी
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते   ||||
 
राजसिंहासने केसरीणां  दृढं
नूतनं  शासनं मूलिता यद्दिने    |
ध्वंसिता रासभानां सुदीर्घा सभा
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||||
 
पुष्पकाले पुनः  कोकिलानां रवैः
कामनालोलितं  मोदिताऽस्मन्मनः |
वायसा मूर्छिताः हा ! वसन्ते यदा
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते   ||||
 
युद्धभूमिं प्रति त्रोटयित्वा भयं
शिक्षकाः कृष्णवत् विक्लवानर्जुना-
नेलयिष्यन्त्यदा लक्ष्यहीनान् तथा
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||||
 
अर्जितारो यदा सुन्दराऽऽजीविकां
यत्र साधारणा मानवा भारते  |
रामभद्रायते मे नरेन्द्रः सदा
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||||
 
रौरवीति क्षितौ मानवो दुःखितो
रोगदंष्ट्रागतो यन्त्रणा दण्डितः |
वैद्यराजा  स्वयं देवता भावितो
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||||
 
सत्यसंबोधितो वेदपुष्टादृतो
नः समानो यदा देवमन्त्रस्वरो-
मन्दिरे मस्जिदे गुञ्जिता तद्दिने
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||||
  
यद्दिने  भारते भारती सादरं
वन्दिता  मानवैः केतने केतने  |
देवभाषाऽमृतं वर्षिता सर्वतः
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||||
 
पण्डितानां न वा  संप्रतिः संस्कृतं
शासकानां तथा याज्ञिकानां न स्यात्   |
लोकभाषास्वरूपे यदा राजिता
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||१०||
 
औषधं नूतनं वैर-ईर्ष्यादिना-
मप्रयासेन विक्रीष्यते यद्दिने
पण्यवीथ्यां सखे ! ग्रामके वा पुरे
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||११||
 
रक्षितो यो व्रणो हृत्तले यौवने
क्लिद्यमानः पुनः  शूलति श्रावणे
यद्दिने पुष्पकाले पलाशायते
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||१२||
  
माधवप्रेमवह्निर्यदा धिक्षिता
हृत्तले हृत्तले चेतने वा जडे
यत्र मीरायते कायवीणाऽखिला
भूतले स्वर्गभूमिर्विनिर्मिष्यते  ||१३||
 
स्रग्विणी छन्द विधान
चार चरणों का छन्द
प्रत्येक चरण में 3 रगण यानि 12 वर्ण
राजभा चार बार
ला ल ला चार बार
212 चार बार
यहाँ 2 का अभिप्राय दीर्घ यानि गुरू वर्ण से ही है
 
 
 
 

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