संस्कृत गीत – होली – डॉ नवलता


राजते रङ्गमयी होली।
शोभते रङ्गमयी होली।।
                                     
व्रजवीथीषु गोपिकाबालाः।
करधृतधारायन्त्रगुलालाः।
अञ्जितरागा कृष्णराधिका-
सङ्गमयी होली।।1।।
 
परिरम्भते पादपो लतिकाम्।
गायन्तीह सहृदयाः रसिकाम्।
मदनयशः प्रतनोति शिवप्रिय-
भङ्गमयी होली।।2।।
 
चुम्बति कलिं रसज्ञो भृङ्गः।
कण्डूयते प्रियां मातङ्गः।
गृहोद्यानविपिनेषु राजतेऽ-
नङ्गमयी होली।।3।।
 
हासविलासविनोदितचित्तान्।
अनुरञ्जयति वसन्ते मत्तान्।
ढक्काढोलवेणुमञ्जीरमृ
दङ्गमयी होली।।4।।
 
युगपदेव वासन्तीं सुषमाम्।
पत्रक्षरावस्थितिं विषमाम्
दिशत्यहो लोकाय द्विपथो-
त्सङ्गमयी होली।।5।।
 
अपनोद्यतां समेषां तोदः।
हृदि हृदि लसतु केशरामोदः।
लोके भूयो भातु प्रेम-
तरङ्गमयी होली।।6।। 

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