हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
कवनो कोसिस बढ़ि जाये के
रुकल त नइखे
मनवा भलहीं
लसरल लउकल
झुकल त नइखे
गइल भँइसिया पानी में अब
कइल-धइल सब
बंटाधार !