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बजारन में दिखबे लगे चन्द्रमा - नवीन

बजारन में दिखबे लगे चन्द्रमा
सितारे ऊ बनिबे लगे चन्द्रमा

ह्रिदे में हुलसिबे लगे चन्द्रमा
अटारिन पे चढिबे लगे चन्द्रमा

समझ ल्यो नई रौसनी मिल गई
किताबन कूँ पढ़िबे लगे चन्द्रमा

पढ़्यौ जब सूँ दुस्यंत-साकुन्तलम
फरिस्तन सूँ डरिबे लगे चन्द्रमा

खुदइ तन सूँ बदरन कूँ लिपटाय कें
अँधेरेन सूँ मिलबे लगे चन्द्रमा

: नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़उल

122 122 122 12

बाज़ारों में दिखने लगे चन्द्रमा
सितारे भी बनने लगे चन्द्रमा

हृदय में हुलसने [ख़ुश होना] लगे चन्द्रमा
अटारिन [अटारियों] पे चढ़ने लगे चन्द्रमा

समझ लो नयी रौशनी मिल गई
किताबात पढ़ने लगे चन्द्रमा

पढ़ा जब से दुष्यन्त-शाकुंतलम
फ़रिश्तों से डरने लगे चन्द्रमा

ख़ुद ई तन से अब्रों को लिपटाय के
अँधेरों से मिलने लगे चन्द्रमा

हवा के सिवा है जो रफ़्तार में - नवीन

हवा के सिवा है जो रफ़्तार में
असर उसका डाल अपने किरदार में

हदें हम पे हँसती रहीं और हम
तलाशा किये तर्क तकरार में
भला हो भरम का जो भरमा लिया
वगरना धरा क्या है संसार में

हमें यूँ अज़ल ही से मालूम था
है किस-किस का इसरार इस रार में
मगर क्या करें हम भी फँस ही गये
ख़ला की बलाओं की गुफ़्तार में
अज़ल - आदि / पहले से, इसरार - हठ, जिद, रार - लड़ाई, ख़ला - अन्तरिक्ष, गुफ़्तार - बातचीत 

चला चाक अपना ख़ला के कुम्हार
कई अक़्स हैं अनगढ़े, ग़ार में
मुहब्बत की रंगत में वहशत भी घोल 
उजाला तो हो कूचा-ए-यार में
ग़ार - गड्ढा, सूरज जहाँ डूबता है उस के संदर्भ में, वहशत - पागलपन / दीवानगी

वो लावा जो दुनिया बनाता भी है
न कुहसार पे है न कुहसार में
नया नूर जिस का ढिंढोरा पिटा
न रुख़सार पे है न रुख़सार में
कुहसार - पहाड़, रुख़्सार - गाल 

कहाँ सब ज़हीनों को दिखती है खाद
जी हाँ! ज़र्द पत्तों के अम्बार में
तेरी बातें हैं “शुद्ध-कूड़ा” ‘नवीन’
इन्हें कौन पूछेगा बाज़ार में
ज़हीन - बुद्धिमान , ज़र्द पत्ते - सूखे पत्ते 

बहरे मुतकारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल 
122 122 122 12 

इस ग़ज़ल को पूरी तरह से प्रयोग के तौर पर कहने की कोशिश की है। यह एक क़ताबन्द ग़ज़ल है। इस में वृत्यानुप्रास, लाटानुप्रास और अंत्यनुप्रास अलङ्कार का प्रयोग किया गया है। ग़ज़ल में अलङ्कारों का प्रयोग पहले के शायर भी करते रहे हैं। 

कभी जंगलों को जला कर चले - नवीन

जनाब मीर तक़ी मीर साहब की ग़ज़ल ‘फ़क़ीराना आये सदा कर चले” की ज़मीन को दुगुन करते हुये

कभी जंगलों को जला कर चले, कभी आशियाने गिरा कर चले
हवा से कहो है जो इतना गुमाँ, तो बारेमुहब्बत उठा कर चले
बारेमुहब्बत - मुहब्बत का बोझ

निभाता है इस से तो छूटे है वो, मनाता है इस को तो रूठे है वो
बशर की भी अपनी हदें हैं जनाब, कहाँ तक सभी से निभा कर चले
 बशर-मनुष्य

ये जीवन है काँटों भरा इक सफ़र, हरिक मोड़ पर हैं अगर या मगर
वही क़ामयाबी का लेता है लुत्फ़, जो दामन को अपने बचा कर चले

अजल से यही एक दस्तूर है, जो कमज़ोर है वो ही मज़बूर है
उसे ये ज़माना डरायेगा क्या, जो आँखें क़ज़ा से मिला कर चले
 अजल - आदिकाल, क़ज़ा - मौत

नवीन सी. चतुर्वेदी 

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊ
१२२ १२२ १२२ १२

हो पूरब की या पश्चिमी रौशनी - नवीन

हो पूरब की या पश्चिमी रौशनी
अँधेरों से लड़ती रही रौशनी

क़तारों से क़तरे उलझते रहे
ज़मानों को मिलती रही रौशनी

इबादत की किश्तें चुकाते रहो
किराये पे है रूह की रौशनी

किसी नूर की छूट है हर चमक
ज़मीं पर भला कब उगी रौशनी

अँधेरों पे दुनिया का दिल आ गया
फ़ना हो गई बावली रौशनी

सितारों पे जा कर करोगे भी क्या
जो हासिल नहीं पास की रौशनी

उजालों में भी सूझता कुछ नहीं
तू रुख़सत हुआ, छिन गई रौशनी

गमकती-चमकती रही राह भर
परी थी वो या संदली रौशनी

वो घर, घर नहीं; वो तो है कहकशाँ
जहाँ तन धरे लाड़ली रौशनी

ये चर्चा बहुत चाँद-तारों में है
मुनव्वर को किस से मिली रौशनी

बहुत जा रहे हो वहाँ आजकल
तो क्या तुम पे भी मर मिटी रौशनी

नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल

122 122 122 12