एक अनोखी बात हुई है पत्थर
पर
देखो देखो! दूब उगी है पत्थर पर
ग़ैर के दर्द का भान है ही
नहीं
दर हक़ीक़त वो इनसान है ही
नहीं
जोश खाता हुआ खून है ही नहीं
ये जवानों की प्लाटून है ही
नहीं
काँटों से ज़रूरी है फूलों
पे नज़र रखना
अपनों ही से ख़तरा है, अपनों पे नज़र रखना
दूसरों का भला सोचते क्यों
नहीं
लोग अच्छा बुरा सोचते क्यों
नहीं
राजमूर्ति जी के यहाँ मशवरे
देने का अंदाज़ भी बड़ा ही निराला है :-
भले ही रात को दिन, दिन
को रात कहते रहो
घुमा फिरा के मगर अपनी बात
कहते रहो
जागती आँखों में सपना डाल
देना चाहिए
झील में पत्थर का टुकड़ा डाल
देना चाहिए
इसे चलने भी दो पाँवों पे
अपने
अब अपनी गोद से बच्चा उतारो
राजमूर्ति सौरभ जी नारेबाज़ी
से बचते हुए बहुधा परिवार के किसी वरिष्ठ की तरह बात करते हुए प्रतीत होते हैं. वे
सीधे सीधे जुमलेबाज़ी तो नहीं करते मगर इशारों इशारों में अपना काम कर जाते हैं. तंज़
कसने में ज़रा भी नहीं चूकते. ज़बान के शेर कहने में भी राजमूर्ति जी कमाल करते
हैं. कुछ नमूने देखिए :-
यहाँ तो धूप के लाले पड़े
हैं
ये किस सूरज के हम पाले पड़े
हैं
सियासत की दुनिया फ़रेबों की
है
सियासत में ईमान क्या देखना
सूरज न सफल होगा इस बार
परीक्षा में
इस बार अँधेरे की तस्वीर
बनानी है
मालिक बैठा है धरती पर
गद्दी पर नौकर बैठा है
अपनी पगड़ी ख़ुद रक्खी है
गिरवी जिसने
सुनते हैं वो घर घर टोपी
बाँट रहा है
ओढकर शेर की खाल बैठे थे जो
आ गया शेर तो दुम हिलाने लगे
भले हो जाय दिल बेटे का
पत्थर
मगर माँ बाप रस्ता देखते हैं
दिखते तो असली हैं लेकिन
नकली होते हैं
दुनिया में कुछ लोग बड़े
मायवी होते हैं
मैं ने अनेक एंगल से इन्हें
पढ़ा और हर पन्ने पर शेरियत के दर्शन हुए. इनके यहाँ की कुछ कलात्मकता देखिए
एक झोंका हवा का उसे छू गया
शर्म से पानी पानी हुई झील
है
कितना सुन्दर रिश्ता अपना
तुम आँखें हो, मैं
चश्मा हूँ
मेघ सन्देश लेकर उड़े
भावना यक्षिणी हो गयी
स्त्री को लेकर इनकी सोच
देखिए:-
संगे-बुनियाद तो पहले भी रही
है लेकिन
वक़्त बदला है तो मीनार हुई
है औरत
गिरते संसदीय मूल्यों पर भी
इन्होंने अपनी राय रखी है :-
कभी सोचा न था संसद की भाषा
किसी दिन इस क़दर अश्लील
होगी
शायरी में जिस रूमानियत को
अक्सर देखा जाता है उसे लेकर राजमूर्ति जी तनिक संकोची दिखते हैं हालाँकि उन्होंने
अपनी श्रीमती जी का उल्लेख करते हुए कुछ शेर अवश्य कहे हैं. पत्नी मेकअप में समय
लगा रही हो और पति तैयार होकर उसका वेट कर रहा हो, उस मंज़र पर इस शेर
को देखिए :-
तुम्हारा अभी तक पता ही नहीं
है
कोई कब से बैठा है तैयार
होकर
इनके यहाँ दिखावटी दर्द बहुत
कम मिलता है उसके स्थान पर जीवन की वास्तविकताएँ अधिक दिखती हैं जैसे कि
हर खिलोने पर मचल उठता है
बच्चा
आ के मेले में पिता पछता रहा
है
इनका हाफ़ ग्लास इज फुल ऑफ
वाटर वाला अंदाज़ भी कमाल का लगा, देखिए :-
अभी एहसास ज़िन्दा हैं, अभी
सपने सलामत हैं
सुनो, तक़दीर
अच्छी है, हमारी भी,
तुम्हारी भी
अपेक्षाओं के पूरा न होने पर
होने वाली निराशा को भी कितनी सहजता से स्वीकार कर लेते हैं :-
चाहे जितनी दौड़ लगा लो हाथ
नहीं आते
सपने भी तो सचमुच जैसे तितली
होते हैं
एक तो ऐसी ग़ज़ल है जिसमें
केवल मत्ले ही मत्ले हैं. कुछ एक स्थान पर इन्होंने उस हिन्दी का भी प्रयोग किया
है जिसका हिन्दी में अनुवाद नहीं हो सकता यानी जिसे आजकल शुद्ध हिन्दी कहा जा रहा
है. ऐसी स्थिति में लोगों से पूछने का मन होता है कि “यदि विवेच्य शैली शुद्ध हिन्दी है तो बाकी सब क्या अशुद्ध हिन्दी में काम
कर रहे हैं”? मगर यह एक अलग विषय है. सब समय की बात है. समय
अपना काम अपने समय के अनुसार ही करता है.
कुल मिलाकर एनी बुक द्वारा
प्रकाशित, 172 ग़ज़लों से सुसज्जित, 228 पृष्ठों की पुस्तक "लमहा लमहा
सोच रहा हूँ" राजमूर्ति सौरभ जी की एक ऐसी भेंट है जिसमें सर्व समावेशी दर्शन
पग पग पर मिलता है. कपोल कल्पनाएं लगभग ना के बराबर हैं. अच्छी और फ़िक्रमंद शायरी
के शौक़ीन पाठकों के लिए यह ग़ज़ल संग्रह एक अच्छा विकल्प है. एनी बुक और
राजमूर्ति सौरभ जी को अनंत शुभकामनाएँ..
पुस्तक सम्बन्धित विवरण:-
पुस्तक का नाम - लमहा लमहा
सोच रहा हूँ
शायर का नाम - राजमूर्ति
सौरभ
शायर का नंबर - 9956021495
प्रकाशक - एनीबुक
प्रकाशक का नंबर -
9971698930
मूल्य - रुपए 250.00 मात्र
नवीन सी. चतुर्वेदी
ब्रजगजल प्रवर्तक एवं बहुभाषी शायर
मुंबई
9967024593

प्रभावकारी ग़ज़लें 🙏🏻
जवाब देंहटाएंबेहद ख़ूबसूरत शायर श्रद्ध्येय श्री राजमूर्ति सौरभ जी दादा जी ♥️🙏
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