भीतर कहीं खटकने लगते हैं
सही समय पर बात न हो
तो सम्बन्ध चटकने कहते हैं
इतना युद्धरत क्यों है
असहज करने वाले नियम
हमारी आदतों में क्यों हैं
अशिक्षा, गैरबराबरी
लैंगिक असमानताएँ
क्यों पहचान से चिपक गईं,
दलित स्वाभिमान लेकर
स्त्रियां पितृसत्ता की
पोषक बनकर सिकुड़ गईं
बेटी को पढ़ा लिखा कर
लड़की वालों ने क्यों नहीं किया
दहेज प्रथा का विरोध,
पति से कद में लंबा और
अधिक होनहार होना
बना पत्नी का अपराधबोध
सृष्टि के आरंभ से कहानियां
अकेले पुरुषों ने क्यों बनाई
स्त्रियों के हिस्से केवल
त्याग बलिदान की प्रशंसा क्यों आई
ईश्वर दाढ़ी वाला
माताएं अबला
आकाश पिता और
धरती सहनशील हो गई
विज्ञापनों में सजी धजी,
घर संभालती, बच्चे पालती
ऑल राउंडर संस्कारी
थकी हुई महिला
सुशील हो गई
सत्ता के गलियारों में
सौम्य मृदुल स्त्रियां दिखाई गईं दुर्बल
गंभीर उद्यमी होने की दौड़ में
पुरुष जैसी स्त्रियां सशक्त बताई गईं
विस्थापितों सा जीवन जीते हुए
समय की कसौटी पर परखी गई
उसकी कोमलता है कमज़ोरी नहीं
वो प्रेम निभाते हुए
श्रम की चोरी भी चुप चाप सहती गई
यदि समाज की सामूहिक स्मृति में
माँ, बेटी, पत्नी,
प्रेमिका होने के इतर
स्त्री एक व्यक्ति भी होती
तो सभ्यता थोड़ी और नर्म होती
स्त्री पुरुष से परे शब्दों का चयन कर देखना कि
"कविता भाषा में मनुष्य होने
की तमीज़ होती"
तो ये दुनिया केवल
आदमी के बारे में नहीं होती

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