कविता - अंहकार क्या है - डॉ. शबनम आलम


अपने आप को सबसे अलग मानना

अंहकार है

या, खुद को सर्वश्रेष्ठ समझना

अंहकार है

सहजता या सरलता का अभाव

अंहकार है

या, दृढ़ता के साथ अकड़ना

अंहकार है

स्वार्थी बन संवेदनहीन हो जाना

अंहकार है

अपने धन व ऐश्वर्य पर इठलाना

अंहकार है

 

अंहकार

थोड़ा-बहुत आपमें, हममें

इनमें, उनमें; सबमें होता है

अंहकार बुरा तब हो जाता है

जब वो नकारात्मक हो जाता है

खुद को भी कष्ट देता है

और दूसरों को आहत करता है

 

अहंकार

तोड़ने के बजाय रहने दें अंदर

पर, खुद को देखें-परखें-समझें

क्या, अहंकार करने से आपको खुशी मिलती है?

क्या, आप सरल, सहज और आत्मीय महसूस करते हैं?

क्या, आपके इस रूप से लोग दूर भागते हैं?

जिस दिन यह समझ आ जाएगा

उसी दिन वही अहंकार अपना रूप बदल लेगा

नकारात्मक से सकारात्मक, संवेदनहीन से संवेदनशील

 

अंहकार

जब सकारात्मक और संवेदनशील होता है, तब

स्वाभिमानी बन, अपने आत्मसम्मान की रक्षा करता है

शक्ति और हिम्मत देकर, वीरता पैदा करता है

धैर्यशील और चुनौतिपूर्ण बनाता है

सात्विक रूप में रचनात्मक बनाता है

आत्मविश्वासी बनाता है, कि वो सबकुछ कर सकता है

अन्याय के खिलाफ झुकने नहीं देता

'हॉं' के साथ 'ना' कहना सीखाता है

क्योंकि अहंकार तो अहंकार है

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