वक्त किसी का पहले या बाद
में नहीं होता,
वह किसी से कोई फरक नहीं बरतता;
गरीब को कब महलों में बसा दे;
कब बंजर में बहार ला दे
कब बहारों को पूरा उजाड़ दे;
परवरदिगार की मर्जी है,
वक्त की अपनी अपनी मजबूरी है;
कोई सवाल नहीं कर सकता,
कोई बवाल नहीं कर सकता;
जन्म व मरण के बीच,
बस एक पल का फ़ासला;
न कोई वक्त खरीद सकता,
और न कोई
बेच सकता;
न कोई वक्त को रोक सकता,
न कोई आगे ढकेल सकता;
फिर भी तो इंसान इस जहां में
वक्त की अहमियत नहीं समझता;
और जिंदगी का सफ़र
कब खत्म हो जाये कोई नहीं जानता!

सच है।
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