अतिथि सम्पादकीय - अर्चना वर्मा सिंह

पन्नों में कुछ शब्द उकेर देना मात्र ही साहित्य नहीं है। साहित्य एक साधना है, एक परंपरा है जो सतत चलती आ रही है। पाठकों के लिए यह एक मानसिक खुराक है, माँ शारदे का आशीष है, समाज का दर्पण है। 

वेब पोर्टल साहित्यम के इस अद्यतन में साहित्य की विभिन्न विधाओं, विभिन्न पहलुओं को स्पर्श करने का प्रयास किया गया है ताकि आप साहित्य के विभिन्न विधाओं का रसास्वादन कर सकें। कहीं प्रेम की ख़ुशबू है तो कहीं त्योहारों की उमंग, तो कहीं समाज की व्यवस्था पर चिंता व्यक्त की गई है। गीत, ग़ज़लों, छंद, कहानी, व्यंग्य एवं साहित्य की अन्य विधाओं से सुसज्जित यह वेब पोर्टल अद्यतन केवल शब्दों का संयोजन नहीं बल्कि साहित्य की विभिन्न विधाओं का रसास्वादन कराने का प्रयास है। 

इस अंक में सम्मिलित सभी रचनाकारों ने अपनी संवेदनाओं और अनुभव को अत्यंत सुंदर रूप से अभिव्यक्त किया है। कहीं प्रेम, भक्ति की मृदुलता है, कहीं संघर्ष की तीव्रता है, कहीं विरह का गहरा विषाद, कहीं जीवन दर्शन का शांत स्पर्श है जोकि पाठकों के मन में उतरकर आत्मा को आलोकित कर देते है। पाठक जब इस वेब पोर्टल के पन्नों में प्रवेश करेगा तो पाएगा कि यह उसी की तो दुनिया है जिसमें वह भ्रमण कर रहा है।

यह वेब पोर्टल अद्यतन उन पाठकों के लिए विशेष रूप से मूल्यवान होगा जो रचनाओं के माध्यम से जीवन के गुण सत्य तलाशते हैं, ऐसी कविताएं जो पढ़ने के बाद मन में ठहर जाती है और जीवन को थोड़ा और सुंदर, थोड़ा और अर्थ पूर्ण बना जाती है।

इस अद्यतन की विशेषता यह भी है कि इसमें सिर्फ़ महिला रचनाकारों की रचनाएं ही सम्मिलित की गई हैं। मेरे लिए यह बिल्कुल नया अनुभव रहा और इसके लिए मैं आदरणीय नवीन सी. चतुर्वेदी जी का विशेष आभार व्यक्त करती हूॅं जिन्होंने मुझ पर विश्वास कर यह कार्य मुझे सौंपा और मार्गदर्शन करते रहे। अगले महीने 8 मार्यच को महिला दिवस है, इस बात को ध्यान में रखते हुए यदि हमें पर्याप्त और स्वीकार्य रचनाएँ प्राप्त हुईं तो हम अगला अद्यतन भी महिला विशेषांक के रूप में ही रखना चाहेंगे

साहित्य के अथाह सागर से रचनाओं के कुछ मोती चुनकर आपके समक्ष लेकर आई हूँ। आइए इन शब्दों की महफ़िल में, भाव के खट्टे-मीठे अनुभव में खो जाएँ। उम्मीद है आप सभी को यह अद्यतन पसंद आएगा और आपका अच्छा प्रतिसाद मिलेगा।

अर्चना वर्मा सिंह

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