हिना छोड जाती है अपना रंग-
जैसे पीछे छूट गई
पुरानी पगडंडियाँ
यादों के साथ-साथ दौड़
लगाती हैं-
जैसे मुँडेर पर बैठी धूप
अम्मा को झपकी
लेने का
न्यौता देती है-
जैसे अंतस में सोई किसी
अपने की याद
झन्न से जाग कर
बीते पलों को बटोरती
बैचेन हो जाती है-
जैसे आँखो को
सपनों का भुलावा देकर
छल लेती है नींद-
जैसे अर्थ के खो जाने पर
प्रश्नों की भीड़
घेर लेती है
सारे ख़ाली स्थान-
वैसे ही, नज़दीकियाँ बढ़
दुश्वार लगती हैं दुरियां-
अधरों से
कह देने पर
महत्व खो देता है प्रेम
क्योंकि मन ही मन की
लिपि को पढ़ पाता है—

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी करने के लिए 3 विकल्प हैं.
1. गूगल खाते के साथ - इसके लिए आप को इस विकल्प को चुनने के बाद अपने लॉग इन आय डी पास वर्ड के साथ लॉग इन कर के टिप्पणी करने पर टिप्पणी के साथ आप का नाम और फोटो भी दिखाई पड़ेगा.
2. अनाम (एनोनिमस) - इस विकल्प का चयन करने पर आप की टिप्पणी बिना नाम और फोटो के साथ प्रकाशित हो जायेगी. आप चाहें तो टिप्पणी के अन्त में अपना नाम लिख सकते हैं.
3. नाम / URL - इस विकल्प के चयन करने पर आप से आप का नाम पूछा जायेगा. आप अपना नाम लिख दें (URL अनिवार्य नहीं है) उस के बाद टिप्पणी लिख कर पोस्ट (प्रकाशित) कर दें. आपका लिखा हुआ आपके नाम के साथ दिखाई पड़ेगा.
विविध भारतीय भाषाओं / बोलियों की विभिन्न विधाओं की सेवा के लिए हो रहे इस उपक्रम में आपका सहयोग वांछित है. सादर.