कविता - वक्त की अहमियत – शशि दीप

 

 

वक्त किसी का पहले या बाद में नहीं होता,

वह किसी से कोई फरक नहीं बरतता;

 अमीर को कब सड़क पर ला दे,

गरीब को कब महलों में बसा दे;

कब बंजर में बहार ला दे

कब बहारों को पूरा उजाड़ दे;

परवरदिगार की मर्जी है,

वक्त की अपनी अपनी मजबूरी है;

 

कोई सवाल नहीं कर सकता,

कोई बवाल नहीं कर सकता;

जन्म व मरण के बीच,

बस एक पल का फ़ासला;

 

न कोई वक्त खरीद सकता,

और न कोई  बेच सकता;

न कोई वक्त को रोक सकता,

न कोई आगे ढकेल सकता;

फिर भी तो इंसान इस जहां में

वक्त की अहमियत नहीं समझता;

और जिंदगी का सफ़र

कब खत्म हो जाये कोई नहीं जानता!

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