संस्कृत गीति – अयि शातनाहतपादपाः – डॉ. नवलता

 


 अयि शातनाहतपादपा विपिनेद्य दूयध्वे कथम्
शाखासु नूतनपल्लवानां हास आगन्ता पुनः

अन्धन्तमोविस्तारिणी संत्रासदा व्येष्यति निशा
प्राणप्रदो भास्वत्करो दिग्भास आगन्ता पुनः
 
नत्युन्नती जगति प्रवर्तितकालचक्रमयीगती
ह्रासोऽस्ति चेदस्मिन् क्षणे सुविकास आगन्ता पुनः
 
प्राणान्तके समुपस्थिते चेदुत्कटास्ति जिजीविषा
दिष्ट्या कदाचिद्गतः प्रत्याश्वास आगन्ता पुनः
 
चेज्जीर्णपत्राणि क्षरन्ति न मन्यतामिति जीवनम्
नवचेतना नवजीवनस्योद्भास आगन्ता पुनः
 
पुष्पोद्गमैः भरिताञ्चला भूयः समृद्धिरिहेष्यति
भ्रमरावलीनां गुञ्जितेन विलास आगन्ता पुनः
 
शीतलसुगन्धसमीरणो नोदिष्यते तरुपल्लवान्
नृत्यल्लतावनसङ्कुले ह्युल्लास आगन्ता पुनः
 
सर्वासु दिक्षु यशःश्रुतिं पवनोदितं सम्प्रेषयन्
पृथिवीतलञ्चोन्मादयन् शुचिवास आगन्ता पुनः
 
येऽकिञ्चनत्वमवेक्ष्य यौष्माकीनमद्य पतत्रिणो
याताश्चिरेण तदुन्मदानां रास आगन्ता पुनः
 
भूयो रविष्यति कोकिलोऽस्मिन् कानने मदनिर्भरः
सर्वत्र महिमानं किरन् मधुमास आगन्ता पुनः

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