कथय कैकयि! साम्प्रतं किमु दुष्करं विहितं त्वया।
राज्याऽभिषेकविधिः कथं विफलीकृतःपरिशङ्कया।।१ ।।
अयि! त्वमसि स्नेहशरीरिणी अनुराग- स्रोतोवाहिनी।
भरतप्रसूःत्वमसि स्वयंकृत-त्यागविग्रहधारिणी।।२।।
अयि चक्रवर्तिप्रिये! अयेअनवद्य-सुन्दरि !सुस्मिते!
समराङ्णे वीराङ्गने!ग्रसतात् क्वचिद् नहि राज्यलोभविभावना न प्रवञ्चना।।
रामेऽभिरामे त्वं सदा वात्सल्य झङ्कृति-झङ्कृते!।३।।
त्यक्तं त्वया सौभाग्यमथ वैधव्यमप्यङ्गीकृतम्।
भर्त्सनां घृणां निन्दामहो लोकेऽञ्चलीकुरुषे सदा ।
दुहिता न कैकेयीति नाम्नाऽऽहूयते ह्यद्यावधि।
तव नाम लोके दूषितं बहु कुत्सितं बहू थूत्कृतम्।
एतादृशी विपरीतता कःकर्तुमुत्सहते तथा।
किमु दुष्करं विहितं त्वया।।४।।
हे दशरथस्य परं प्रिये! हे शूरताया विग्रहे!
विद्रूपमवगुण्ठन-विलुण्ठनमेव स्वीकुरुषे सदा।
कथय कैकयि! साम्प्रतं किमु दुष्करं विहितं त्वया।।५।।
त्वमुपस्नुषे रामे शुभे! प्रतिभासि गौरिव वत्सला।
तं प्रेषितुं विपिनं हहा! कुरुषे यदा खलु निश्चयम्।
ते हन्त!कर्तितमन्तरं हृत्कुड्मलं भुवि लुण्ठितम्
किमु दुष्करं विहितं त्वया।।६।।
राज्यं त्यजतु ,गच्छतु वनम् इति कथनमासीद् दुर्वहम्।
क्षत्राणि! धैर्यं कम्पितं कामं मनोऽतिविकम्पितम्
हे रामरञ्जितमानसे! कथमिदं विहितं त्वया।।७।।
निर्मितवती रामं विजयिनं विहित-रक्षोन्मूलनम्।
जित-लोकरावणरावणं राज्येऽभिषिक्त- विभीषणम् ।
अपि कपिकुलानां सौहृदम् इष्टं परं च हनूमतः।।८।।
राज्याऽभिषेकविधिः कथं विफलीकृतःपरिशङ्कया।।१ ।।
भरतप्रसूःत्वमसि स्वयंकृत-त्यागविग्रहधारिणी।।२।।
समराङ्णे वीराङ्गने!ग्रसतात् क्वचिद् नहि राज्यलोभविभावना न प्रवञ्चना।।
रामेऽभिरामे त्वं सदा वात्सल्य झङ्कृति-झङ्कृते!।३।।
भर्त्सनां घृणां निन्दामहो लोकेऽञ्चलीकुरुषे सदा ।
दुहिता न कैकेयीति नाम्नाऽऽहूयते ह्यद्यावधि।
तव नाम लोके दूषितं बहु कुत्सितं बहू थूत्कृतम्।
एतादृशी विपरीतता कःकर्तुमुत्सहते तथा।
किमु दुष्करं विहितं त्वया।।४।।
विद्रूपमवगुण्ठन-विलुण्ठनमेव स्वीकुरुषे सदा।
कथय कैकयि! साम्प्रतं किमु दुष्करं विहितं त्वया।।५।।
तं प्रेषितुं विपिनं हहा! कुरुषे यदा खलु निश्चयम्।
ते हन्त!कर्तितमन्तरं हृत्कुड्मलं भुवि लुण्ठितम्
किमु दुष्करं विहितं त्वया।।६।।
हे रामरञ्जितमानसे! कथमिदं विहितं त्वया।।७।।
जित-लोकरावणरावणं राज्येऽभिषिक्त- विभीषणम् ।
अपि कपिकुलानां सौहृदम् इष्टं परं च हनूमतः।।८।।
मुक्तिप्रदातारं शबर्यै सर्वलोकमनोहरम्।
रामं सरोरुहलोचनं ब्रह्माण्डनायकमुत्तमं कर्तुं त्वमेव समीहसे।
अवतारसाफल्यं भवेदिति भावयन्ती संततम्।
अति दुष्करं विहितं त्वया सुर-मनुज-दुःख-निवृत्तये।।९।।
ईदृक्कठोरतमं व्रतं कर्तुं त्वमेव समीहसे।
अयि चिन्मयेन विभाविते! आत्मप्रबोधप्रकाशिते!
सदसद्विवेकविकासिते हे भरतमातः! ते नमः।।१०।।

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