संस्कृत गीति – मधुमासः – डॉ. रेखा शुक्ला

 


विलसति आलि ! मधुरवसन्तः
प्रवहति शीतलमन्दसमीरःगुञ्जति भृङ्गः पुष्पे पुष्पे
गायति कलमव्यक्तं गीतम्
वेल्लति कुसुमावलिरुद्याने
प्रसरन् वायुमण्डले गन्धम्
विलसति आलि ! मधुरवसन्तः
 
पीतवर्णपरिधानशोभिता
हर्षितविकसितकु‌सुमराजिता
प्रकृतिकामिनीसर्षपक्षेत्रे
मन्ये अभिनन्दति मधुमासम्
विलसति आलि! मधुरवसन्तः
 
राजति रम्यरसालमन्जरी
मधुरसगन्धवेष्टितवृक्षे
कूजति मन्दरवेन पिकालिः
प्रतिनन्दयति च लोकमनांसि
विलसति आलि! मधुरवसन्तः
 
विहरति धोऽयम् कन्दर्पः
मधुऋतुमित्रं शरसमन्वितः
पीताम्बरनरनारीवृन्दः
राजति नन्दितस्यन्दितचित्तम्
विलसति आलि ! मधुरवसन्तः

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी करने के लिए 3 विकल्प हैं.
1. गूगल खाते के साथ - इसके लिए आप को इस विकल्प को चुनने के बाद अपने लॉग इन आय डी पास वर्ड के साथ लॉग इन कर के टिप्पणी करने पर टिप्पणी के साथ आप का नाम और फोटो भी दिखाई पड़ेगा.
2. अनाम (एनोनिमस) - इस विकल्प का चयन करने पर आप की टिप्पणी बिना नाम और फोटो के साथ प्रकाशित हो जायेगी. आप चाहें तो टिप्पणी के अन्त में अपना नाम लिख सकते हैं.
3. नाम / URL - इस विकल्प के चयन करने पर आप से आप का नाम पूछा जायेगा. आप अपना नाम लिख दें (URL अनिवार्य नहीं है) उस के बाद टिप्पणी लिख कर पोस्ट (प्रकाशित) कर दें. आपका लिखा हुआ आपके नाम के साथ दिखाई पड़ेगा.

विविध भारतीय भाषाओं / बोलियों की विभिन्न विधाओं की सेवा के लिए हो रहे इस उपक्रम में आपका सहयोग वांछित है. सादर.