ब्रजभाषा के तुक्तक - भाड़ में जान्दै, हमै का परी – रेणु शर्मा

 

 

ढिकाने कौ छोरा, फलाने की छोरी,

छत पै रोज मिलें चुपके-चुपके, चोरी-चोरी

पढ़ाई-लिखाई तौ उनके बस बहाने एं ,

उन्नैं तौ दुछत्ती पै जाकैं नैना लड़ाने ऐं

फलानी कूँ बताई हती, खूब समझाई हती,

अबहि तौ बाय दिख रहि ऐ सब हरी-हरी

पर भाड़ में जान्दै, हमैं का परी

 

बगल बारे बाबा की तनक आवाज ना आवै,

अब तौ वो अपने बहू-बेटा ते हू सकुचावै

जाकी बैठक में रोज जमौ करैहि चौपाल,

आज कोई पूछन वारौ नायें बाकौ हाल

बाबा के टैम पै हमने हूं खूब मौज करी,

उनकौ सूनौंपन करेजा पै चलावै छुरी

पर भाड़ में जान्दै, हमै का परी

 

चुनाव आए तौ नेताजी वोट मांगन आए,

पिछली बेर के बोल-वचन फिर तै दोहराए

दस साल पुराने गड्ढा में गिरते-गिरते बचे,

हमनै ऊं हंस के पूछ लई, का हाल हैं चचे

बे समझ गए व्यंग की भासा हमारी,

मन तौ हतो, नेताजी ते करूँ नैंक और मसखरी

पर भाड़ में जान्दै, हमैं का परी

 

मैं रोडवेज की बस ते जाय रही परकम्मा,

ज्वान छोरी के संग बस में बैठी एक बूढ़ी अम्मा

दो छोरा चढ़े हट्टे-कट्टे, मुछैले-मुस्टंडे,

उनकी हरकत’न ते छोरी के हाथ-पाम परि गए ठंडे

काहू नै नाय करी चूं,पर नस फरकन लगी मेरी,

मईया बोली, वैसे कछू करिवे कौ धरम तौ हमरौ हू है री

पर भाड़ में जान्दै, हमैं का परी

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