मैथिली कविता - तीलक तार – अम्बिका झा

 


"हे यौ भइया आँहाँ कोना दुबरा गेल छि ?
बहिन हाथक भोजन बिन कुम्हला गेल छि।
 
हे यौ कि कहलौं ?
 
आँहाँ के कपाड़ में हम सटी गेल छि ।
हे यो हमरे कारण आँहाँ लटि गेल छि ।
हे यौ आब ने आँहाँ कने दम धरू
साउस बनबाक प्रयास कने कम करू ।
 
साउस हमर सब मनोरथ पुरौने छथी
चालनी में पाइन भरौने छथी ।
अपन फरमाइश कने कम करू ।
साउस बनबाक प्रयास कने कम करू ।
 
बचपन में माय बाप बियाहि देलक
बाली उमर में बुढबा के खुट्टा में बान्हीं देलक ।
आँहाँ क घर में सबहक फटकार सुनैत रहलौ
जवानी कखन बितल बुझबो ने केलौ ।
आब नै अपन तामस पर दम धरू
साउस बनबाक प्रयास कने कम करू ।
 
आब आँहाँ क माय विदा भेली संसार स
आब आहूं बड़प्पन देखाबू विचार स
बड़ बर्दाश्त केलौ आब ने करब।
आँहाँ क अत्याचार आब ने सहब।
आत्मा के आब ने आँहाँ खंड खंड करू ।
साउस बनबाक प्रयास कनै कम करू ।
 
सुनु आँहाँ के लगैया आँहाँ बुड़हा गेलौ
बच्चो सब कहैया आँहाँ सठिया गेलौ ।
घरबला बन के बेर में त मुंह सिब लेने रहि
सर्बन कुमारक घुट्टी पिव लेने रहि ।
आब नै अपन आवाज कने नम करू
साउस बनबाक प्रयास कने कम करू ।
 
जबानी में आंँहक परिवारक नउरी रहलौ
अपन देह के रूई जं क धुनलौं
आंँहांँ चाहैत छि पहिने जका सब काज करि
हमर मोन पर आंँहांँ राज करि ?
 
एक एक मिनट के ने आब हिसाब करू ।
अपन पोथी पतरा के किताब करू‌ ।
नाक में आब ने हमरा आंँहांँ दम करू ।
साउस बनबाक प्रयास कने कम करू ।।"

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